भगवान शिव के कई नामों में से एक नाम पशुपति या पशुपतिनाथ भी है। आज हम शिव के इस नाम के रहस्य के बारे में जानेंगे।
Shiv Puran Katha: भगवान शिव को कई नामों से जाना जाता है। उन्हें भोले भंडारी, महादेव, देवाधिदेव, भोलेनाथ, शंकर, गंगाधर, आदिदेव, नीलकंठ आदि कई नामों से जाना जाता है। शिव के हर नाम के साथ कोई न कोई कहानी या रहस्य जुड़ा हुआ है।
जैसे समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को पीने के कारण शिव का कंठ नीला पड़ गया था, जिसके कारण उनका नाम नीलकंठ पड़ा। इसी तरह उनके अन्य नामों के साथ भी ऐसी ही कहानियां और रहस्य जुड़े हुए हैं। भगवान शिव के कई नामों में से एक नाम पशुपति या पशुपतिनाथ भी है। आज हम शिव के इस नाम के रहस्य के बारे में जानेंगे।
एक बार ब्रह्मांड की सभी शक्तियों को मिलाकर शिव के लिए एक दिव्य रथ तैयार किया गया। विष्णु जी शिव के बाण बने और अग्नि देव बाण की नोक बने। ऋषि, देवता, गंधर्व, नाग, लोकपाल, ब्रह्मा, विष्णु सभी उनकी स्तुति कर रहे थे। किन्तु जैसे ही शिवजी उस दिव्य रथ पर चढ़ने लगे, घोड़े सिर के बल जमीन पर गिर पड़े। पृथ्वी हिलने लगी। अचानक शेषनाग भी शिवजी का भार सहन न कर सके और चिन्ता से काँपने लगे। तब भगवान धरणीधर ने नन्दीश्वर का रूप धारण कर रथ को उठा लिया। किन्तु वे भी शिवजी के महान तेज को सहन न कर सके और घुटनों के बल गिर पड़े। इसके बाद ब्रह्मा जी ने शिवजी की आज्ञा से हाथ में चाबुक लेकर घोड़ों को उठाया और रथ को खड़ा कर दिया।
तब शिवजी उस महान रथ में बैठ गए और ब्रह्मा जी ने रथ में जुते हुए वेदमय घोड़ों को, जो मन और वायु के समान वेगवान थे, उन तपस्वी दैत्यों के आकाश में स्थित तीन नगरों को लक्ष्य करके आगे बढ़ाया। शिवजी ने पाशुपत व्रत का महत्व बताया तब भगवान शिव सभी देवताओं से कहने लगे कि, यदि आप सभी देवताओं और अन्य प्राणियों में थोड़ी-सी भी पशुता की कल्पना कर लें और उन पशुओं का प्रभुत्व मुझे दे दें, तो मैं उन दैत्यों का नाश कर दूँगा। क्योंकि तभी उन दैत्यों का वध किया जा सकता है, अन्यथा उनका अंत असंभव है।
देवाधिदेव महादेव के इस कथन को सुनकर सभी देवताओं को पशुता का संदेह हो गया, जिससे वे व्याकुल हो गए। शिव ने देवताओं से कहा, पशुता प्राप्त होने पर भी किसी का पतन नहीं होगा। मैं उस पशुता से मुक्ति का उपाय भी तुम्हें बताता हूं, अतः तुम लोग वैसा ही करो।
शिव ने कहा, जो कोई इस दिव्य पाशुपत व्रत का पालन करेगा, वह पशुता से मुक्त हो जाएगा। तुम सबके अलावा अन्य प्राणी जो मेरे पाशुपत व्रत का पालन करेंगे, वे भी पशुता से मुक्त हो जाएंगे और जो कोई ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए 12 वर्ष, 6 वर्ष अथवा 3 वर्ष तक मेरी सेवा करेगा या कराएगा, वह भी पशुता से मुक्त हो जाएगा। ऐसी स्थिति में जब तुम सभी इस दिव्य व्रत का पालन करोगे, उसी क्षण पशुता से मुक्त हो जाओगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।
इसके बाद अनेक देवता और दैत्य भगवान शिव के पशु बन गए और पशुता के बंधन से मुक्त करने वाले शिव पशुपति कहलाए। तभी से शिव का नाम 'पशुपति' संसार में प्रसिद्ध हो गया।