Shiva Purana: भगवान शिव का दानी और त्यागी स्वरूप समुद्र मंथन की कथा में भी दिखाई देता है। जब समुद्र मंथन से सबसे पहले कालकूट विष निकला तो उसके प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि संकट में आ गई।
Shiva Purana: भगवान शिव को महादेव, भोलेनाथ, नीलकंठ, त्रिपुरारी, पशुपतिनाथ और शंकर जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। इन्हीं नामों में एक नाम है "औघड़दानी"। यह नाम केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि भगवान शिव के उस स्वभाव का प्रतीक है, जिसमें वे बिना किसी भेदभाव के अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। कहा जाता है कि शिव अपने भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें मनचाहा वरदान देने में देर नहीं लगाते। यही कारण है कि देवता हों, दानव हों, ऋषि हों या साधारण मनुष्य, हर कोई भगवान शिव की आराधना करता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव को आखिर "औघड़दानी" क्यों कहा जाता है? इस नाम के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है और इसका वास्तविक अर्थ क्या है? आइए जानते हैं इस नाम के पीछे छिपे धार्मिक रहस्य के बारे में...
औघड़दानी शब्द का क्या अर्थ है?
"औघड़" शब्द का अर्थ होता है ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह सरल, निष्कपट, मोह-माया से दूर और सांसारिक आडंबरों से मुक्त हो। वहीं "दानी" का अर्थ है उदारतापूर्वक दान देने वाला। जब इन दोनों शब्दों को मिलाया जाता है तो "औघड़दानी" का अर्थ होता है ऐसा देव, जो बिना किसी दिखावे, भेदभाव या कठिन शर्तों के अपने भक्तों को इच्छित वरदान प्रदान कर दे। भगवान शिव का यही स्वभाव उन्हें अन्य देवताओं से अलग बनाता है। वे केवल भक्ति देखते हैं, भक्त का पद, धन या जाति नहीं।
शिव पुराण में भगवान शिव के सरल स्वभाव का वर्णन
शिव पुराण में भगवान शिव के स्वभाव को अत्यंत दयालु और सहज बताया गया है। वे कैलाश पर्वत पर साधारण जीवन व्यतीत करते हैं। शरीर पर भस्म धारण करते हैं, गले में सर्प लपेटते हैं, बाघ की खाल पहनते हैं और जटाओं में गंगा को धारण करते हैं। उनका यह रूप बताता है कि उन्हें सांसारिक वैभव और ऐश्वर्य से कोई मोह नहीं है। यही कारण है कि वे अपने भक्तों की तपस्या और श्रद्धा से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। भक्त की सच्ची भावना उनके लिए सबसे बड़ा अर्पण मानी जाती है।
रावण की तपस्या और औघड़दानी शिव
भगवान शिव के औघड़दानी कहलाने के पीछे रावण की कथा सबसे अधिक प्रसिद्ध मानी जाती है। लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। वर्षों तक तप करने के बाद भी जब भगवान शिव प्रकट नहीं हुए, तब रावण ने अपना एक-एक सिर काटकर शिवलिंग पर अर्पित करना शुरू कर दिया। जब वह अपना अंतिम सिर अर्पित करने वाला था, तभी भगवान शिव उसके सामने प्रकट हो गए।
रावण की कठिन तपस्या और अटूट भक्ति देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने रावण को उसके सभी सिर वापस प्रदान किए और साथ ही कई शक्तिशाली वरदान भी दिए। इतना ही नहीं, उन्होंने रावण को दिव्य अस्त्र-शस्त्र और अद्भुत शक्ति का आशीर्वाद भी दिया। भगवान शिव अपने भक्त की भक्ति देखकर बिना अधिक विचार किए वरदान दे देते हैं। इसी उदार स्वभाव के कारण उन्हें औघड़दानी कहा गया।
भस्मासुर की कथा भी बताती है शिव का दानी स्वभाव
भगवान शिव की उदारता का एक और प्रसिद्ध उदाहरण भस्मासुर की कथा में मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, भस्मासुर नामक असुर ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उससे वरदान मांगने को कहा। भस्मासुर ने ऐसा वरदान मांगा कि वह जिसके सिर पर हाथ रख दे, वह तुरंत भस्म हो जाए।
भगवान शिव ने बिना छल-कपट का विचार किए उसे यह वरदान दे दिया। लेकिन वरदान मिलने के बाद भस्मासुर स्वयं भगवान शिव को ही भस्म करने के लिए उनके पीछे दौड़ पड़ा। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर भस्मासुर को नृत्य में उलझाया और उसी से उसके सिर पर हाथ रखवा दिया, जिससे वह स्वयं भस्म हो गया। यह कथा बताती है कि भगवान शिव का हृदय इतना सरल है कि वे भक्त की तपस्या से प्रसन्न होकर तुरंत वरदान दे देते हैं। यही सहजता उन्हें औघड़दानी बनाती है।
देवताओं और दानवों में कभी नहीं किया भेदभाव
भगवान शिव की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि उन्होंने कभी देवता और दानव में भेदभाव नहीं किया। जिसने भी सच्चे मन से उनकी आराधना की, उसे उन्होंने अपनी कृपा प्रदान की। रावण, बाणासुर, गजासुर और अनेक असुरों ने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे वरदान प्राप्त किए। वहीं दूसरी ओर देवताओं, ऋषियों और मुनियों पर भी उन्होंने समान रूप से कृपा बरसाई। यही निष्पक्षता भगवान शिव के औघड़दानी स्वरूप को और अधिक विशेष बनाती है। उनके लिए भक्ति का महत्व सबसे ऊपर माना गया है।
समुद्र मंथन में भी दिखाई दी उनकी करुणा
भगवान शिव का दानी और त्यागी स्वरूप समुद्र मंथन की कथा में भी दिखाई देता है। जब समुद्र मंथन से सबसे पहले कालकूट विष निकला तो उसके प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि संकट में आ गई। उस विष को न देवता ग्रहण कर सके और न ही दानव। तब भगवान शिव ने बिना किसी स्वार्थ के वह विष स्वयं पी लिया, ताकि संसार की रक्षा हो सके। माता पार्वती ने विष को उनके कंठ में ही रोक दिया, जिससे उनका गला नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए।
शिव की भक्ति में कठिन नियमों से अधिक श्रद्धा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव की पूजा के लिए अत्यधिक वैभव की आवश्यकता नहीं होती। जल, बेलपत्र, धतूरा, आक और सच्ची श्रद्धा से भी भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं। इसी कारण सावन, महाशिवरात्रि और सोमवार के दिन लाखों श्रद्धालु केवल जलाभिषेक करके भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव भाव के भूखे हैं, भोग के नहीं, इसलिए उन्हें औघड़दानी और भोलेनाथ दोनों नामों से पुकारा जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)