देवों में विष्णु, वैष्णवों में शिव और महीनों में वैशाख को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। वैशाख अमावस्या आत्मा की शुद्धि और पितरों की कृपा प्राप्त करने का दिव्य अवसर है। इस दिन किए गए दान-कर्म विशेष फलदायी होते हैं।
Vaishakh Amavasya 2025: धर्मग्रंथों के अनुसार, वैशाख मास शेषशायी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और ब्रह्मा जी ने इसे सभी मासों में उत्तम सिद्ध किया है। यह पुण्यदायी माह माता की भांति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करने वाला है और संपूर्ण देवताओं द्वारा पूजित धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्या का सार है। जैसे विद्याओं में वेदविद्या, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगा जी, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में सुवर्ण, वैष्णवों में शिव और रत्नों में कौस्तुभमणि है, उसी प्रकार धर्म के साधनभूत महीनों में वैशाख मास सबसे श्रेष्ठ है।
पुण्यकारी तिथि की महिमा
मान्यता है कि वैशाख के महीने में भगवान विष्णु की आज्ञा से जनकल्याण के लिए जल में समस्त देवी-देवता निवास करते हैं। इस मास की सभी तिथियां पुण्यदायिनी मानी गई हैं। एक-एक तिथि में किया हुआ पुण्य कोटि-कोटि गुना अधिक होता है। उनमें भी जो वैशाख अमावस्या तिथि है, वह मनुष्यों को मोक्ष देने वाली है। स्कंद पुराण के अनुसार, परम पवित्र वैशाख मास में जब सूर्य मेष राशि में स्थित हों, तब पापनाशिनी अमावस्या कोटि गया के समान फल देने वाली मानी गई है। जो प्राणी इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करके पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक जल से भरा कलश, तिल, पिंड और वस्त्र दान करता है, उसे अक्षय फल की प्राप्ति होती है और उसके पितरों को मोक्ष मिलता है। यदि कोई व्यक्ति पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करता है तो न केवल उसके पितर तृप्त होते हैं, बल्कि उसे स्वयं भी मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए वैशाख अमावस्या आत्मा की शुद्धि और पितरों की कृपा प्राप्त करने का दिव्य अवसर है। यह तिथि देवताओं की भी अत्यंत प्रिय मानी गई है और इसी कारण इस दिन किए गए कर्म, साधना और दान विशेष फलदायी होते हैं। इस दिन प्याऊ लगाना, पशु-पक्षियों के खानपान की व्यवस्था करना आदि सत्कर्म समृद्धि के पथ पर ले जाते हैं।
धर्मवर्ण ने पितरों को दिलाई मुक्ति
वैशाख अमावस्या के महत्व से जुड़ी एक पौरणिक कथा के अनुसार, 30वें कलयुग के अंत में जब सभी धर्मों का लोप हो चुका था। उसी समय आनर्त देश में धर्मवर्ण नाम के एक विख्यात ब्राह्मण थे। वे बेहद ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नियमित व्रत-उपवास करते थे। एक बार उन्होंने महर्षियों के मुख से सुना कि कलयुग में भगवान विष्णु के नाम स्मरण से ज्यादा पुण्य किसी भी कार्य में नहीं है। अन्य युगों में जो पुण्य यज्ञ करने से प्राप्त होता था, उससे कहीं अधिक पुण्य फल इस घोर कलयुग में भगवान विष्णु के नाम सुमिरन करने से मिल जाता है। धर्मवर्ण ने इस बात को आत्मसात कर लिया और संन्यास लेकर भ्रमण करने लगे। एक दिन घूमते-घूमते वह पितृलोक जा पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि उनके पितर बहुत कष्ट में हैं। पितरों ने धर्मवर्ण को बताया कि उनकी ऐसी हालत तुम्हारे संन्यास के कारण हुई है, क्योंकि अब उनके लिए पिंडदान करने वाला कोई शेष नहीं है। अगर तुम वापस गृहस्थ जीवन अपना कर विधि-विधान से पिंडदान करो तो हमें इस कष्ट से मुक्ति मिल सकती है। पितरों की बात सुनने के बाद धर्मवर्ण ने उन्हें वचन दिया कि वे उनकी आज्ञा का अवश्य पालन करेंगे। भूलोक आकर धर्मवर्ण ने संन्यासी जीवन त्यागाकर गृहस्थ धर्म को अपना लिया। उसके बाद कुंभदान सहित पाप विनाशक श्राद्ध किया। तब उनके पितरों को पुनरावृत्ति रहित मुक्ति प्राप्त हुई। फिर उन्होंने स्वयं विवाह करके उत्तम संतान को जन्म दिया और लोक में उस पापनाशिनी अमावस्या तिथि को प्रसिद्ध किया। इसलिए वैशाख मास की अमावस्या तिथि परम पवित्र मानी गई है।