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Shivling Parikrama: शिवलिंग की परिक्रमा पूरी क्यों नहीं की जाती? जानें धार्मिक मान्यता और इसका कारण

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Shivling Parikrama: धार्मिक परंपरा के अनुसार सबसे पहले भगवान शिव का विधिपूर्वक पूजन और अभिषेक किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु शिवलिंग के सामने से परिक्रमा प्रारंभ करते हैं। 

shivling
Shiva Purana: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस दौरान शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और भक्त पूरी श्रद्धा के साथ शिवलिंग का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और पूजन करते हैं। पूजा के बाद अधिकांश लोग शिवलिंग की परिक्रमा भी करते हैं, लेकिन यदि आपने कभी ध्यान दिया हो तो कई श्रद्धालु शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं करते। वे एक निश्चित स्थान तक जाकर वापस लौट आते हैं। ऐसा क्यों किया जाता है? क्या इसके पीछे केवल परंपरा है या कोई धार्मिक कारण भी जुड़ा हुआ है? क्या सभी शिवलिंगों की परिक्रमा अधूरी की जाती है? यदि आपके मन में भी कभी ऐसे प्रश्न आए हैं, तो आइए जानते हैं शिवलिंग की पूरी परिक्रमा न करने के पीछे की धार्मिक मान्यता और इसका कारण।

शिवलिंग की परिक्रमा पूरी क्यों नहीं की जाती?

सनातन धर्म में भगवान शिव के शिवलिंग की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि शिवलिंग की परिक्रमा करते समय भक्त पूर्ण चक्कर लगाने के बजाय जल निकासी वाले भाग यानी जलाधारी या सोमसूत्र तक पहुंचकर वहीं से वापस लौट आते हैं। इसे ही आधी या अपूर्ण परिक्रमा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसा करना भगवान शिव की पूजा की पारंपरिक विधि का हिस्सा माना जाता है, इसलिए अधिकांश शिव मंदिरों में पुजारी भी श्रद्धालुओं को इसी प्रकार परिक्रमा करने की सलाह देते हैं।

 

Shivling Puja

क्या होता है सोमसूत्र?

शिवलिंग के जिस भाग से अभिषेक का जल बाहर निकलता है, उसे सोमसूत्र या जलाधारी का निकास कहा जाता है। पूजा के दौरान शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल, दूध, पंचामृत और अन्य पूजन सामग्री इसी मार्ग से बाहर आती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसी कारण श्रद्धालु इस भाग को लांघते नहीं हैं और वहां तक पहुंचकर वापस उसी दिशा में लौट आते हैं, जिससे इस पवित्र स्थान का सम्मान बना रहे।

धार्मिक मान्यता क्या कहती है?

शैव परंपरा में माना जाता है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया अभिषेक का जल स्वयं भगवान शिव का प्रसाद स्वरूप होता है। जिस मार्ग से यह जल बाहर आता है, उस स्थान को पार करना उचित नहीं माना गया है। इसी कारण परिक्रमा के दौरान भक्त उस स्थान को छोड़ देते हैं। मान्यता यह भी है कि जलाधारी का निकास शिव तत्व और शक्ति के प्रवाह का प्रतीक है। इसलिए उस दिशा को पार करने के बजाय श्रद्धापूर्वक वहीं से वापस लौटना ही पूजा की सही विधि मानी गई है।

 

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परिक्रमा करने की सही विधि क्या है?

धार्मिक परंपरा के अनुसार सबसे पहले भगवान शिव का विधिपूर्वक पूजन और अभिषेक किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु शिवलिंग के सामने से परिक्रमा प्रारंभ करते हैं। धीरे-धीरे दक्षिणावर्त दिशा में चलते हुए वे जलाधारी या सोमसूत्र तक पहुंचते हैं। वहां पहुंचकर उस स्थान को पार किए बिना वापस उसी मार्ग से लौटकर परिक्रमा पूरी करते हैं। इसी प्रक्रिया को शिवलिंग की परंपरागत परिक्रमा माना जाता है। कई प्राचीन शिव मंदिरों में आज भी इसी विधि का पालन कराया जाता है।

शिवलिंग की परिक्रमा का धार्मिक महत्व

शिवलिंग की परिक्रमा भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, समर्पण और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है। मान्यता है कि परिक्रमा के दौरान भक्त अपने मन, वचन और कर्म से भगवान शिव का स्मरण करते हुए उनके चारों ओर घूमता है। शिव पूजा में परिक्रमा को पूजा का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। अभिषेक, बेलपत्र अर्पित करना, धूप-दीप दिखाना और परिक्रमा करना, ये सभी मिलकर भगवान शिव की उपासना को पूर्ण करते हैं। हालांकि परिक्रमा करते समय जलाधारी के निकास को न लांघना इस विधि का प्रमुख नियम माना गया है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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