Sawan 2026: सावन में विवाह न होने का सबसे प्रमुख कारण चातुर्मास माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं।
Sawan 2026: भगवान शिव का सबसे प्रिय महीना सावन माना जाता है। इस पूरे मास में शिवालयों में विशेष पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक, जलाभिषेक और सोमवार व्रत का विशेष महत्व रहता है। मान्यता है कि सावन में भगवान शिव अपने भक्तों की आराधना से शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि कांवड़ यात्रा से लेकर शिव पूजन तक, पूरे देश में धार्मिक उत्साह देखने को मिलता है, लेकिन एक रोचक बात यह है कि जिस सावन मास को भगवान शिव का सबसे प्रिय समय माना जाता है, उसी दौरान हिंदू धर्म में विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। विवाह मुहूर्त इस पूरे महीने लगभग नहीं निकलते और अधिकांश परिवार इस अवधि में शादी-विवाह से बचते हैं। इसका कारण केवल ज्योतिषीय गणना नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे धार्मिक और पौराणिक आधार भी बताए गए हैं।
सावन में क्यों नहीं होते विवाह?
सनातन परंपरा के अनुसार सावन मास भगवान शिव की विशेष आराधना और तप का समय माना गया है। इस महीने में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक संस्कारों की अपेक्षा व्रत, जप, तप, दान और शिव भक्ति को अधिक महत्व दिया जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार सावन का अधिकांश समय चातुर्मास के अंतर्गत आता है। चातुर्मास शुरू होने के बाद विवाह जैसे शुभ कार्यों पर विराम लग जाता है। इसलिए सावन में विवाह न करने की परंपरा केवल एक सामाजिक नियम नहीं, बल्कि धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है।
चातुर्मास से जुड़ा है इसका सबसे बड़ा कारण
सावन में विवाह न होने का सबसे प्रमुख कारण चातुर्मास माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद चार महीने तक देवताओं के प्रमुख पालनकर्ता भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। यह अवधि देवउठनी एकादशी तक रहती है। सनातन धर्म में विवाह सहित अनेक मांगलिक कार्यों में भगवान विष्णु का विशेष महत्व माना गया है। जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, तब विवाह जैसे संस्कार नहीं किए जाते। इसी कारण सावन मास में भी विवाह के शुभ मुहूर्त नहीं निकलते।
भगवान शिव और सावन का विशेष संबंध
शिव पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में सावन मास को भगवान शिव का अत्यंत प्रिय बताया गया है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष निकला तो उसके प्रभाव से समस्त सृष्टि संकट में पड़ गई। देवताओं और ऋषियों के अनुरोध पर भगवान शिव ने समस्त विष का पान कर लिया। विष के प्रभाव से उनका शरीर अत्यंत तप्त हो गया। तब देवताओं ने उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए निरंतर जल अर्पित किया। कहा जाता है कि वर्षा ऋतु के दौरान जलाभिषेक का यही स्वरूप आगे चलकर सावन में शिव पूजन की प्रमुख परंपरा बना। इसी कारण सावन में शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भांग अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। यह पूरा महीना शिव आराधना के लिए समर्पित माना जाता है, इसलिए विवाह जैसे सांसारिक उत्सवों की अपेक्षा भगवान शिव की भक्ति को प्रधानता दी जाती है।
सावन से जुड़ी माता पार्वती के तप की कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। अनेक वर्षों तक कठिन व्रत और साधना करने के बाद भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। कई धार्मिक परंपराओं में सावन मास को माता पार्वती की उसी तपस्या और शिव आराधना से भी जोड़ा जाता है, इसलिए इस महीने में विशेष रूप से कुंवारी कन्याएं और सुहागिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। हालांकि, भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह अत्यंत शुभ माना जाता है, लेकिन जिस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, उस समय नए विवाह संस्कार संपन्न नहीं किए जाते।
क्या केवल सावन ही नहीं, पूरे चातुर्मास में नहीं होते विवाह?
धार्मिक परंपरा के अनुसार विवाह केवल सावन में ही नहीं रुकते, बल्कि देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक पूरे चातुर्मास में विवाह नहीं किए जाते। इस अवधि में आषाढ़ के अंतिम दिन, पूरा सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक के आरंभिक दिनों तक विवाह के मुहूर्त नहीं माने जाते। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने के बाद पुनः विवाह और अन्य मांगलिक कार्य शुरू होते हैं। इसी कारण अधिकांश पंचांगों में सावन मास के दौरान विवाह के शुभ मुहूर्त नहीं दिए जाते।
धर्मशास्त्रों में मांगलिक कार्यों के लिए मुहूर्त का महत्व
सनातन धर्म में प्रत्येक संस्कार के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व बताया गया है। विवाह को सोलह संस्कारों में अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है, इसलिए विवाह की तिथि निर्धारित करते समय केवल परिवार की सुविधा नहीं, बल्कि पंचांग, ग्रह-नक्षत्र, तिथि, वार, योग और देवकाल का भी विचार किया जाता है। जब देवशयनी एकादशी के बाद चातुर्मास प्रारंभ हो जाता है, तब धर्मशास्त्रों के अनुसार विवाह संस्कार स्थगित कर दिए जाते हैं। यही कारण है कि सावन में भगवान शिव की विशेष कृपा का समय होने के बावजूद विवाह आयोजित नहीं किए जाते।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।