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Vishnu Purana: जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से विष्णु जी को कैसे मिली थी मुक्ति, जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

VIshnu Purana: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार एक बार भगवान शिव के क्रोध से निकली अग्नि समुद्र में जाकर गिरी। उसी तेज से एक दिव्य बालक उत्पन्न हुआ। समुद्र ने उसका पालन-पोषण किया और उसका नाम जालंधर रखा गया। 

VIshnu Purana: 
VIshnu Purana: सनातन धर्म के अनेक पुराणों में भगवान विष्णु, असुरराज जालंधर और उनकी पत्नी वृंदा की कथा का विशेष उल्लेख मिलता है। यह कथा केवल जालंधर के वध तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके बाद घटित हुई घटनाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने देवताओं की रक्षा के लिए जालंधर के विनाश में भूमिका निभाई, तब उनकी धर्मपत्नी वृंदा ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दे दिया। इस श्राप के प्रभाव से स्वयं भगवान विष्णु को भी कष्ट सहना पड़ा। बाद में भगवान शिव, देवी लक्ष्मी और देवताओं के प्रयासों से विष्णु जी को इस श्राप से मुक्ति प्राप्त हुई। आइए जानते हैं कि आखिर वृंदा का श्राप क्या था और भगवान विष्णु को इससे मुक्ति कैसे मिली।

वृंदा कौन थीं?

पौराणिक कथाओं के अनुसार वृंदा अत्यंत पतिव्रता, तपस्विनी और भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। उनका विवाह असुरराज जालंधर से हुआ था। यद्यपि जालंधर असुरों का राजा था, लेकिन उसकी पत्नी वृंदा के सतीत्व और तप के प्रभाव से वह अपार शक्ति का स्वामी बन गया था। कहा जाता है कि जब तक वृंदा का पतिव्रत अटूट रहा, तब तक जालंधर को कोई भी देवता या स्वयं भगवान शिव भी युद्ध में पराजित नहीं कर सके। वृंदा प्रतिदिन अपने पति की विजय और दीर्घायु के लिए कठिन तप तथा भगवान विष्णु की आराधना करती थीं।

कैसे उत्पन्न हुआ जालंधर?

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार एक बार भगवान शिव के क्रोध से निकली अग्नि समुद्र में जाकर गिरी। उसी तेज से एक दिव्य बालक उत्पन्न हुआ। समुद्र ने उसका पालन-पोषण किया और उसका नाम जालंधर रखा गया। बड़ा होने पर जालंधर अत्यंत पराक्रमी योद्धा बना। ब्रह्मा जी से वरदान और पत्नी वृंदा के पतिव्रत के प्रभाव से वह लगभग अजेय हो गया। धीरे-धीरे उसने तीनों लोकों पर अधिकार जमाना शुरू कर दिया और देवताओं को परास्त कर स्वर्ग तक अपने अधीन कर लिया।

 

VIshnu Purana: 

देवताओं ने ली भगवान शिव और विष्णु की शरण

जब जालंधर का अत्याचार बढ़ने लगा तो इंद्र सहित सभी देवता भगवान शिव और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान शिव ने जालंधर से कई बार युद्ध किया, लेकिन हर बार वृंदा के सतीत्व के प्रभाव से जालंधर सुरक्षित बच निकलता था। देवताओं को समझ में आ गया कि जब तक वृंदा का पतिव्रत भंग नहीं होगा, तब तक जालंधर का वध संभव नहीं है।

भगवान विष्णु ने क्यों धारण किया जालंधर का रूप?

देवताओं की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने एक योजना बनाई। जब जालंधर भगवान शिव से युद्ध करने गया, उसी समय भगवान विष्णु ने उसका रूप धारण कर वृंदा के सामने उपस्थित हुए। वृंदा ने उन्हें अपना पति समझकर उनका स्वागत किया। जैसे ही उनका भ्रम टूटा और उन्हें ज्ञात हुआ कि सामने उनके पति नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं, उसी क्षण उनका पतिव्रत भंग हो गया। उधर युद्धभूमि में वृंदा के सतीत्व का प्रभाव समाप्त होते ही भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया।

वृंदा ने भगवान विष्णु को दिया श्राप

जब वृंदा को पूरी घटना का पता चला तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुईं। उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि जिनकी वे जीवनभर आराधना करती रहीं, उन्हीं ने छलपूर्वक उनके पतिव्रत को भंग कर दिया। क्रोध में आकर वृंदा ने भगवान विष्णु को शिला यानी पत्थर बनने का श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से भगवान विष्णु शालिग्राम स्वरूप में प्रतिष्ठित हुए।

 

vishnu ji

कैसे मिली श्राप से मुक्ति?

जब भगवान विष्णु श्राप के प्रभाव से तुरंत पत्थर (शिला) बन गए तो पूरे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया, तब माता लक्ष्मी ने अत्यंत व्याकुल होकर वृंदा से प्रार्थना की और अपने सुहाग की रक्षा की भीख मांगी। देवताओं और लक्ष्मी जी के करुण निवेदन को देखकर वृंदा का हृदय पिघल गया और उन्होंने अपना श्राप वापस ले लिया।

भगवान विष्णु का शालिग्राम रूप 

भले ही वृंदा ने श्राप वापस ले लिया था, लेकिन उनके सतीत्व की शक्ति और श्राप के सम्मान के लिए भगवान विष्णु ने अपने एक अंश को हमेशा के लिए पत्थर के रूप में ही रहने दिया, जिसे शालिग्राम कहा जाता है। यह शिला नेपाल की गंडकी नदी के तट पर पाई जाती है।

तुलसी विवाह की अनूठी परंपरा

श्राप के बाद वृंदा स्वयं अग्नि में भस्म (सती) हो गईं और उनकी राख से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। विष्णु जी ने वृंदा की पवित्रता को अमर करने के लिए उन्हें वरदान दिया कि वे उनके शालिग्राम रूप की अर्धांगिनी बनेंगी। इसी कारण हर साल देवोत्थान एकादशी पर शालिग्राम और तुलसी जी का विवाह कराया जाता है, जिससे विष्णु जी पूर्णतः इस दोष से मुक्त माने जाते हैं।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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