देवताओं ने ली भगवान शिव और विष्णु की शरण
जब जालंधर का अत्याचार बढ़ने लगा तो इंद्र सहित सभी देवता भगवान शिव और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान शिव ने जालंधर से कई बार युद्ध किया, लेकिन हर बार वृंदा के सतीत्व के प्रभाव से जालंधर सुरक्षित बच निकलता था। देवताओं को समझ में आ गया कि जब तक वृंदा का पतिव्रत भंग नहीं होगा, तब तक जालंधर का वध संभव नहीं है।
भगवान विष्णु ने क्यों धारण किया जालंधर का रूप?
देवताओं की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने एक योजना बनाई। जब जालंधर भगवान शिव से युद्ध करने गया, उसी समय भगवान विष्णु ने उसका रूप धारण कर वृंदा के सामने उपस्थित हुए। वृंदा ने उन्हें अपना पति समझकर उनका स्वागत किया। जैसे ही उनका भ्रम टूटा और उन्हें ज्ञात हुआ कि सामने उनके पति नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं, उसी क्षण उनका पतिव्रत भंग हो गया। उधर युद्धभूमि में वृंदा के सतीत्व का प्रभाव समाप्त होते ही भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया।
वृंदा ने भगवान विष्णु को दिया श्राप
जब वृंदा को पूरी घटना का पता चला तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुईं। उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि जिनकी वे जीवनभर आराधना करती रहीं, उन्हीं ने छलपूर्वक उनके पतिव्रत को भंग कर दिया। क्रोध में आकर वृंदा ने भगवान विष्णु को शिला यानी पत्थर बनने का श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से भगवान विष्णु शालिग्राम स्वरूप में प्रतिष्ठित हुए।
कैसे मिली श्राप से मुक्ति?
जब भगवान विष्णु श्राप के प्रभाव से तुरंत पत्थर (शिला) बन गए तो पूरे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया, तब माता लक्ष्मी ने अत्यंत व्याकुल होकर वृंदा से प्रार्थना की और अपने सुहाग की रक्षा की भीख मांगी। देवताओं और लक्ष्मी जी के करुण निवेदन को देखकर वृंदा का हृदय पिघल गया और उन्होंने अपना श्राप वापस ले लिया।
भगवान विष्णु का शालिग्राम रूप
भले ही वृंदा ने श्राप वापस ले लिया था, लेकिन उनके सतीत्व की शक्ति और श्राप के सम्मान के लिए भगवान विष्णु ने अपने एक अंश को हमेशा के लिए पत्थर के रूप में ही रहने दिया, जिसे शालिग्राम कहा जाता है। यह शिला नेपाल की गंडकी नदी के तट पर पाई जाती है।
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