Shiv Puran: चंद्रदेव को नवग्रहों में विशेष स्थान प्राप्त है। वे शीतलता, सौंदर्य, मन, औषधियों और वनस्पतियों के अधिष्ठाता देवता माने जाते हैं। पौराणिक ग्रंथों में चंद्रदेव से जुड़ी अनेक कथाओं का उल्लेख मिलता है, लेकिन उनमें सबसे प्रसिद्ध कथा है उनके ससुर प्रजापति दक्ष द्वारा दिए गए क्षय रोग के श्राप की। यह कथा केवल चंद्रदेव के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना ही नहीं, बल्कि चंद्रमा के घटने और बढ़ने के रहस्य से भी जुड़ी हुई मानी जाती है। पुराणों के अनुसार, यह श्राप चंद्रदेव के पक्षपातपूर्ण व्यवहार के कारण मिला था, जिसके बाद उन्हें कठोर तपस्या करनी पड़ी और भगवान शिव की कृपा से उन्हें आंशिक रूप से श्राप से मुक्ति प्राप्त हुई।
चंद्रदेव का दक्ष की कन्याओं से विवाह
पुराणों के अनुसार, प्रजापति दक्ष ब्रह्माजी के मानस पुत्रों में से एक थे। उनकी 27 कन्याएं थीं, जो 27 नक्षत्रों का स्वरूप मानी जाती हैं। इन सभी कन्याओं का विवाह चंद्रदेव के साथ विधिपूर्वक संपन्न कराया गया। दक्ष की इच्छा थी कि चंद्रदेव सभी पुत्रियों के साथ समान व्यवहार करें और प्रत्येक को समान स्नेह तथा सम्मान दें।
इन 27 पत्नियों के नाम भी 27 नक्षत्रों के अनुरूप बताए गए हैं। इनमें अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती प्रमुख हैं।
रोहिणी के प्रति प्रेम बढ़ने लगा
विवाह के कुछ समय बाद चंद्रदेव का मन अपनी पत्नी रोहिणी में विशेष रूप से रच-बस गया। वे अधिकांश समय रोहिणी के साथ ही व्यतीत करने लगे। अन्य पत्नियों के पास वे बहुत कम जाते थे। इससे शेष 26 कन्याएं स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगीं। समय बीतने के साथ यह असंतोष बढ़ता गया। सभी बहनों ने कई बार चंद्रदेव से आग्रह किया कि वे सभी के साथ समान व्यवहार करें, लेकिन चंद्रदेव का झुकाव लगातार रोहिणी की ओर ही बना रहा। रोहिणी के प्रति उनका प्रेम इतना अधिक था कि वे अन्य पत्नियों की भावनाओं पर ध्यान ही नहीं दे पाए।
दक्ष के समक्ष पुत्रियों ने रखी अपनी पीड़ा
जब स्थिति असहनीय हो गई तो दक्ष की अन्य पुत्रियां अपने पिता के पास पहुंचीं। उन्होंने प्रजापति दक्ष को बताया कि चंद्रदेव केवल रोहिणी को ही महत्व देते हैं और बाकी सभी पत्नियों की उपेक्षा करते हैं। उन्होंने अपने पिता से न्याय की प्रार्थना की। अपनी पुत्रियों की व्यथा सुनकर दक्ष अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने पहले किसी कठोर निर्णय के बजाय चंद्रदेव को समझाने का निश्चय किया।
दक्ष ने चंद्रदेव को दी पहली चेतावनी
दक्ष ने चंद्रदेव को अपने पास बुलाया और शांत भाव से समझाया कि सभी पुत्रियां उनके लिए समान हैं। उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन का धर्म यही है कि पति अपनी सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करे। किसी एक के प्रति अत्यधिक मोह और दूसरों की उपेक्षा उचित नहीं है। दक्ष ने चंद्रदेव को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि उन्होंने अपना व्यवहार नहीं बदला तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। चंद्रदेव ने उस समय दक्ष की बात सुन तो ली, लेकिन व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं किया। वे पुनः रोहिणी के साथ ही रहने लगे और अन्य पत्नियां पहले की तरह उपेक्षित रहीं।
दूसरी बार शिकायत लेकर पहुंचीं दक्ष की कन्याएं
कुछ समय बाद जब स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो दक्ष की पुत्रियां फिर अपने पिता के पास पहुंचीं। उन्होंने बताया कि चंद्रदेव ने पहली चेतावनी के बाद भी अपना व्यवहार नहीं बदला। अब उनका पक्षपात पहले से भी अधिक बढ़ गया है। अपनी पुत्रियों का दुख देखकर इस बार दक्ष अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्हें लगा कि चंद्रदेव ने न केवल उनकी पुत्रियों का अपमान किया है, बल्कि उनके समझाने की भी अवहेलना की है।
क्रोधित होकर दक्ष ने दिया क्षय रोग का श्राप
पुराणों के अनुसार, क्रोध में भरकर प्रजापति दक्ष ने चंद्रदेव को श्राप दिया कि वे क्षय रोग से पीड़ित हो जाएंगे। इस श्राप का प्रभाव तत्काल दिखाई देने लगा। चंद्रदेव का तेज क्षीण होने लगा। उनका शरीर दिन-प्रतिदिन दुर्बल होता गया। उनकी दिव्य आभा मंद पड़ने लगी। क्षय रोग के प्रभाव से वे अत्यंत कष्ट में रहने लगे। उनका प्रकाश लगातार कम होता गया। चंद्रदेव के तेज के क्षीण होने का प्रभाव केवल उन तक ही सीमित नहीं रहा। संपूर्ण सृष्टि पर इसका असर दिखाई देने लगा।
चंद्रदेव के तेज के क्षीण होने से सृष्टि पर पड़ा प्रभाव
चंद्रमा की शीतल किरणों का महत्व केवल रात्रि के प्रकाश तक सीमित नहीं माना गया है। पुराणों में वर्णित है कि चंद्रदेव के तेज से औषधियों, वनस्पतियों और अनेक जीवों को पोषण प्राप्त होता है। जब चंद्रदेव का तेज कम होने लगा तो औषधियों का विकास प्रभावित हुआ। वनस्पतियां मुरझाने लगीं। देवताओं तथा ऋषियों को भी चिंता होने लगी कि यदि यही स्थिति बनी रही तो समस्त सृष्टि का संतुलन बिगड़ सकता है। देवगणों ने इस संकट का समाधान खोजने का प्रयास आरंभ किया।
देवताओं ने बताया भगवान शिव की आराधना का मार्ग
श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्रदेव अनेक देवताओं और ऋषियों के पास पहुंचे। सभी ने उन्हें एक ही उपाय बताया कि वे भगवान शिव की कठोर तपस्या करें। केवल महादेव ही ऐसे हैं जो इस संकट से उन्हें राहत दिला सकते हैं। देवताओं के परामर्श पर चंद्रदेव पृथ्वी पर एक पवित्र स्थान पर पहुंचे और वहां भगवान शिव का स्मरण करते हुए घोर तपस्या आरंभ कर दी। उन्होंने लंबे समय तक निरंतर शिव मंत्रों का जाप किया और पूर्ण श्रद्धा से महादेव की आराधना की।
कठोर तप से प्रसन्न हुए भगवान शिव
लंबे समय तक चली तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और चंद्रदेव के समक्ष प्रकट हुए। उन्होंने चंद्रदेव से वर मांगने के लिए कहा। चंद्रदेव ने विनम्र होकर अपनी भूल स्वीकार की। उन्होंने कहा कि उन्होंने रोहिणी के प्रति अत्यधिक मोह के कारण अन्य पत्नियों के साथ न्याय नहीं किया। उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की कि उन्हें दक्ष के श्राप से मुक्ति दिलाई जाए।
भगवान शिव ने श्राप को पूर्णतः समाप्त नहीं किया
भगवान शिव ने चंद्रदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि प्रजापति दक्ष का श्राप पूर्ण रूप से निष्फल नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह एक महर्षि और प्रजापति का वचन था। महादेव ने श्राप के प्रभाव को कम करते हुए व्यवस्था की कि एक पक्ष में चंद्रदेव का तेज धीरे-धीरे घटेगा और दूसरे पक्ष में वही तेज पुनः बढ़ेगा। इस प्रकार श्राप भी प्रभावी रहेगा और चंद्रदेव का अस्तित्व भी बना रहेगा। इसी कारण कृष्ण पक्ष में चंद्रमा प्रतिदिन क्षीण होता है और अमावस्या तक उसका प्रकाश समाप्त हो जाता है। इसके बाद शुक्ल पक्ष में चंद्रमा पुनः प्रतिपदा से पूर्णिमा तक क्रमशः बढ़ता हुआ अपने पूर्ण तेज को प्राप्त करता है।
शिव ने चंद्रदेव को अपने मस्तक पर धारण किया
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने चंद्रदेव को अपने मस्तक पर स्थान भी प्रदान किया। इसी कारण भगवान शिव 'चंद्रशेखर' और 'सोमेश्वर' नामों से भी विख्यात हुए। महादेव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा उनकी कृपा और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। शिव के मस्तक पर स्थान मिलने के बाद चंद्रदेव का सम्मान और भी अधिक बढ़ गया। हालांकि, दक्ष का श्राप पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, लेकिन भगवान शिव के वरदान से चंद्रदेव का तेज प्रत्येक मास पुनः पूर्ण रूप में लौटने लगा।
चंद्रमा के घटने-बढ़ने की पौराणिक व्याख्या