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Krishna Pingala Sankashti Chaturthi: क्यों मनाई जाती है कृष्णापिंगल संकष्टी चतुर्थी? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Krishna Pingala Sankashti Chaturthi: पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने कठोर तप करके ब्रह्माजी से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि देवता, गंधर्व और यक्ष उसका सामना नहीं कर सकेंगे।

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Krishna Pingala Sankashti Chaturthi: सनातन धर्म में प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि भगवान श्रीगणेश को समर्पित मानी जाती है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को कृष्णापिंगल संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान गणेश के कृष्णापिंगल स्वरूप की पूजा का विधान बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्वरूप भक्तों के जीवन से संकटों को दूर करने वाला, विघ्नों का नाश करने वाला और समस्त कष्टों का हरण करने वाला माना जाता है। इसी कारण इस चतुर्थी का विशेष महत्व बताया गया है।

कृष्णापिंगल संकष्टी चतुर्थी के संबंध में प्राचीन ग्रंथों और पुराणों में भगवान गणेश के इस विशेष स्वरूप का उल्लेख मिलता है। इस तिथि पर व्रत रखने और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर भगवान गणेश की पूजा करने का विधान है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है, जिसमें भगवान गणेश के कृष्णापिंगल स्वरूप के प्रकट होने और देवताओं के संकट दूर करने का वर्णन मिलता है।

कौन हैं भगवान गणेश के कृष्णापिंगल स्वरूप?

गणेश पुराण और प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश अनेक स्वरूपों में पूजे जाते हैं। उन्हीं स्वरूपों में एक है कृष्णापिंगल स्वरूप। 'कृष्ण' का अर्थ गहरा श्याम अथवा काला रंग और 'पिंगल' का अर्थ ताम्र अथवा सुनहरे आभायुक्त वर्ण से माना गया है। इस स्वरूप में भगवान गणेश का तेज अत्यंत अद्भुत बताया गया है। उनका शरीर गहरे वर्ण का होता है, जबकि उनके मुख और नेत्रों से सुनहरी आभा निकलती रहती है। यह स्वरूप असुरों के विनाश और भक्तों की रक्षा के लिए विशेष रूप से प्रकट हुआ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब संसार में विघ्न, भय और अधर्म बढ़ने लगता है, तब भगवान गणेश अपने इसी स्वरूप से भक्तों की रक्षा करते हैं। इसी कारण आषाढ़ मास की संकष्टी चतुर्थी को कृष्णापिंगल गणपति की आराधना का विशेष महत्व माना गया है।

पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने कठोर तप करके ब्रह्माजी से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि देवता, गंधर्व और यक्ष उसका सामना नहीं कर सकेंगे। वरदान प्राप्त करने के बाद उस असुर का अहंकार बढ़ गया और उसने तीनों लोकों में उत्पात मचाना शुरू कर दिया। देवताओं के यज्ञ बाधित होने लगे, ऋषियों की तपस्या भंग होने लगी और पृथ्वी पर रहने वाले लोग भी उसके अत्याचारों से भयभीत हो गए।

देवराज इंद्र सहित सभी देवता पहले भगवान शिव और फिर भगवान विष्णु के पास पहुंचे। दोनों देवों ने विचार कर बताया कि इस संकट का समाधान केवल विघ्नहर्ता भगवान गणेश ही कर सकते हैं, क्योंकि प्रत्येक कार्य का आरंभ उन्हीं की कृपा से होता है और विघ्नों का अंत भी उन्हीं के द्वारा संभव है।

इसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर भगवान गणेश की कठोर आराधना आरंभ की। अनेक दिनों तक स्तुति और तप करने के बाद भगवान गणेश उनके सामने एक अद्भुत स्वरूप में प्रकट हुए। उनका शरीर श्यामवर्ण का था, नेत्र अग्नि के समान तेजस्वी थे और उनके मुखमंडल से ताम्रवर्णी आभा निकल रही थी। देवताओं ने उनके इस दिव्य स्वरूप को कृष्णापिंगल नाम से संबोधित किया। भगवान गणेश ने देवताओं से उनके कष्ट का कारण पूछा। देवताओं ने उस असुर के अत्याचारों का संपूर्ण वृत्तांत सुनाया। भगवान गणेश ने उन्हें आश्वस्त किया कि शीघ्र ही उनके सभी संकट समाप्त होंगे।

भगवान गणेश और असुर का युद्ध

कथा के अनुसार भगवान गणेश कृष्णापिंगल स्वरूप धारण करके उस असुर के सामने पहुंचे। असुर ने भगवान गणेश को देखकर उनका उपहास किया और युद्ध की चुनौती दे दी। इसके बाद दोनों के बीच भयंकर युद्ध प्रारंभ हुआ। असुर ने अपनी मायावी शक्तियों से अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न किए। कभी उसने पर्वतों के समान विशाल रूप धारण किया, तो कभी अग्नि और तूफान उत्पन्न कर दिए। उसने आकाश में अंधकार फैला दिया और अपनी सेना को चारों दिशाओं में फैला दिया। किंतु भगवान गणेश अपने दिव्य स्वरूप में शांत भाव से उसके प्रत्येक प्रहार का उत्तर देते रहे।

युद्ध कई दिनों तक चलता रहा। अंततः भगवान गणेश ने अपने दिव्य अस्त्रों और अद्भुत शक्ति से उस असुर की समस्त मायाओं का नाश कर दिया। इसके बाद उन्होंने अपने परशु और दिव्य तेज के प्रभाव से उसका अंत कर दिया। असुर के वध के साथ ही तीनों लोकों में फैला भय समाप्त हो गया।

देवताओं ने भगवान गणेश की स्तुति की

असुर के वध के बाद सभी देवता, ऋषि और मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा की और उनके कृष्णापिंगल स्वरूप की स्तुति की। देवताओं ने कहा कि जिस प्रकार आपने तीनों लोकों के संकट दूर किए हैं, उसी प्रकार जो भी भक्त इस स्वरूप का स्मरण करेगा और श्रद्धापूर्वक आपकी पूजा करेगा, उसके जीवन के विघ्न भी दूर होंगे।

भगवान गणेश ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार करते हुए कहा कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक मेरा व्रत करेगा तथा रात्रि में चंद्रदर्शन के बाद विधिपूर्वक पूजा करेगा, उसकी प्रार्थना मैं अवश्य स्वीकार करूंगा। तभी से इस चतुर्थी को कृष्णापिंगल संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।

कृष्णापिंगल संकष्टी चतुर्थी पर कथा श्रवण का महत्व

धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने के साथ भगवान गणेश की कथा सुनने या पढ़ने का विधान बताया गया है। मान्यता है कि रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद भगवान गणेश की आरती कर कृष्णापिंगल स्वरूप की कथा का श्रवण किया जाता है। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है। अनेक स्थानों पर भक्त गणेश मंदिरों में एकत्र होकर इस कथा का सामूहिक श्रवण भी करते हैं।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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