Vishnu Purana: गरुड़ का नाम सनातन धर्म में अद्भुत शक्ति, अदम्य साहस और मातृभक्ति का प्रतीक माना जाता है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार गरुड़ ने देवताओं के लिए सुरक्षित रखे गए अमृत कलश को प्राप्त कर ऐसा कार्य किया, जिसकी कल्पना भी देवता और दानव नहीं कर सके थे। यह कथा मुख्य रूप से महाभारत के आदिपर्व, भागवत पुराण और अन्य पुराणों में वर्णित है। इसमें गरुड़ के जन्म से लेकर अमृत कलश प्राप्त करने तक की पूरी घटना विस्तार से मिलती है। यह केवल युद्ध और पराक्रम की कथा नहीं, बल्कि अपनी माता को दासता से मुक्त कराने के लिए किए गए महान प्रयास की पौराणिक गाथा भी है। गरुड़ के अमृत कलश प्राप्त करने की कथा का आरंभ महर्षि कश्यप की दो पत्नियों विनता और कद्रू से होता है। इन्हीं दोनों के बीच हुए एक विवाद ने आगे चलकर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं कि गरुड़ को स्वयं स्वर्ग जाकर अमृत कलश लाना पड़ा।
गरुड़ के जन्म की पृष्ठभूमि
महर्षि कश्यप की अनेक पत्नियां थीं, जिनमें विनता और कद्रू का विशेष स्थान था। कद्रू ने महर्षि कश्यप से एक हजार तेजस्वी नाग पुत्रों का वरदान मांगा, जबकि विनता ने केवल दो ऐसे पुत्रों का वर मांगा जो हजारों नागों से भी अधिक पराक्रमी हों। समय आने पर कद्रू के एक हजार अंडों से नाग उत्पन्न हो गए, लेकिन विनता के दोनों अंडे लंबे समय तक नहीं फूटे। अधीर होकर विनता ने एक अंडा समय से पहले ही तोड़ दिया। उससे अरुण का जन्म हुआ, जो पूर्ण विकसित नहीं थे।
अरुण ने माता से कहा कि समय से पहले अंडा तोड़ने के कारण उनका शरीर पूर्ण नहीं बन पाया। उन्होंने विनता को दूसरे अंडे को न तोड़ने की सलाह दी और कहा कि उचित समय आने पर उससे एक महान तेजस्वी पुत्र जन्म लेगा। समय पूरा होने पर दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म हुआ। जन्म लेते ही उनके तेज से तीनों लोक प्रकाशित हो उठे। उनका शरीर पर्वत के समान विशाल और अग्नि के समान तेजस्वी था।
विनता कैसे बनीं कद्रू की दासी
गरुड़ के जन्म से पहले ही एक ऐसी घटना घट चुकी थी जिसने विनता का जीवन बदल दिया था। एक दिन देवताओं के दिव्य अश्व उच्चैःश्रवा को देखकर कद्रू और विनता के बीच उसके रंग को लेकर विवाद हो गया। विनता ने कहा कि घोड़ा पूर्णतः श्वेत है, जबकि कद्रू ने कहा कि उसकी पूंछ काली है। दोनों ने शर्त रखी कि जिसकी बात गलत निकलेगी, वह दूसरी की दासी बनेगी। कद्रू ने छल का सहारा लिया। उसने अपने नाग पुत्रों को आदेश दिया कि वे सूक्ष्म रूप धारण कर उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपट जाएं ताकि वह काली दिखाई दे। अगले दिन जब दोनों ने घोड़े को देखा तो उसकी पूंछ काली दिखाई दी। विनता शर्त हार गईं और उन्हें कद्रू की दासी बनना पड़ा। इसके बाद विनता को नागों की सेवा करनी पड़ी और वे अत्यंत दुखी जीवन बिताने लगीं।
गरुड़ को माता की दासता का पता चला
जब गरुड़ बड़े हुए तो उन्होंने देखा कि उनकी माता सदैव नागों की सेवा करती रहती हैं। उन्होंने इसका कारण पूछा। तब विनता ने पूरी घटना सुनाई और बताया कि छल के कारण उन्हें दासत्व स्वीकार करना पड़ा। माता की पीड़ा सुनकर गरुड़ ने प्रण किया कि वे किसी भी प्रकार उन्हें इस बंधन से मुक्त कराएंगे।
नागों ने रखी अमृत कलश लाने की शर्त
गरुड़ नागों के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि उनकी माता को दासता से मुक्त करने के लिए क्या करना होगा। नागों ने कहा कि यदि गरुड़ स्वर्ग से देवताओं का अमृत कलश लाकर उन्हें दे दें, तो वे विनता को मुक्त कर देंगे। गरुड़ ने बिना किसी भय के इस शर्त को स्वीकार कर लिया। उन्हें ज्ञात था कि अमृत की रक्षा स्वयं देवता करते हैं और वहां तक पहुंचना अत्यंत कठिन है, फिर भी उन्होंने माता की मुक्ति के लिए यह चुनौती स्वीकार की।
गरुड़ ने पिता महर्षि कश्यप से लिया मार्गदर्शन
स्वर्ग की यात्रा पर निकलने से पहले गरुड़ अपने पिता महर्षि कश्यप के पास पहुंचे। उन्होंने पूरी बात बताई और यात्रा के लिए मार्गदर्शन मांगा। महर्षि कश्यप ने उन्हें बताया कि यह यात्रा अत्यंत कठिन होगी। मार्ग में अनेक बाधाएं आएंगी और विशाल शक्ति की आवश्यकता होगी। उन्होंने गरुड़ को पर्याप्त भोजन प्राप्त करने और संयम के साथ आगे बढ़ने का निर्देश दिया। कश्यप के निर्देशानुसार गरुड़ ने अपनी भूख शांत की और फिर स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।
स्वर्ग तक पहुंचने के मार्ग में आईं अनेक बाधाएं
पुराणों के अनुसार स्वर्ग तक पहुंचने के मार्ग में गरुड़ को कई भयंकर अवरोधों का सामना करना पड़ा। सबसे पहले उन्हें अग्नि की प्रचंड ज्वालाओं को पार करना पड़ा। उन्होंने अपने विशाल पंखों से अनेक नदियों का जल उठाकर उन ज्वालाओं को शांत किया।
इसके बाद एक विशाल लोहे का चक्र निरंतर घूम रहा था, जिसकी धार इतनी तीक्ष्ण थी कि उसके निकट पहुंचना भी असंभव था। गरुड़ ने उचित अवसर देखकर अत्यंत तीव्र गति से उसके बीच से प्रवेश कर लिया। उसके बाद अमृत की रक्षा कर रहे दो विषैले और अग्नि समान तेजस्वी नाग सामने आए। गरुड़ ने अपने पंखों से धूल उड़ाकर उनकी आंखों की दृष्टि बाधित कर दी और फिर उन्हें परास्त कर आगे बढ़ गए।
देवताओं से हुआ भीषण युद्ध
जब गरुड़ अमृत कलश के समीप पहुंचे तो देवताओं को उनके आगमन का समाचार मिला। देवराज इंद्र सहित अनेक देवताओं ने अमृत की रक्षा के लिए उनका मार्ग रोक लिया। गरुड़ और देवताओं के बीच घोर युद्ध हुआ। गरुड़ के पंखों की गति से आकाश कांप उठा। उन्होंने अनेक दिव्य अस्त्रों का सामना किया। देवताओं के प्रहार उनके अद्भुत बल के सामने निष्फल सिद्ध हुए। कथा में वर्णन मिलता है कि गरुड़ किसी से वैर रखने नहीं आए थे। उनका उद्देश्य केवल अमृत कलश प्राप्त करना था ताकि वे अपनी माता को दासता से मुक्त करा सकें। अंततः उन्होंने देवताओं को परास्त कर अमृत कलश अपने अधिकार में ले लिया।
भगवान विष्णु हुए गरुड़ से प्रसन्न
अमृत कलश लेकर लौटते समय भगवान विष्णु स्वयं गरुड़ के सामने प्रकट हुए। उन्होंने गरुड़ के अद्भुत पराक्रम, संयम और मातृभक्ति को देखकर उन्हें वरदान देने की इच्छा व्यक्त की। गरुड़ ने भगवान विष्णु से अमरत्व का वर मांगा, किंतु उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अमृत पिए बिना ही अमर होना चाहते हैं। भगवान विष्णु ने उनकी इच्छा पूरी कर दी और उन्हें अमृत पान किए बिना ही अमर होने का वरदान दिया। इसके बाद भगवान विष्णु ने गरुड़ से पूछा कि क्या वे उनका वाहन बनना स्वीकार करेंगे। गरुड़ ने अत्यंत विनम्रता से यह प्रस्ताव स्वीकार किया। तभी से गरुड़ भगवान विष्णु के दिव्य वाहन माने जाते हैं।
इंद्र और गरुड़ के बीच हुआ समझौता
जब गरुड़ अमृत कलश लेकर आगे बढ़ रहे थे, तब देवराज इंद्र उनके पास पहुंचे। इंद्र जानते थे कि यदि नाग अमृत पी लेंगे तो वे भी अमर हो जाएंगे। इंद्र ने गरुड़ से कहा कि वे अमृत नागों तक पहुंचा दें, लेकिन इस प्रकार कि नाग उसे पी न सकें। गरुड़ ने उत्तर दिया कि उनका उद्देश्य केवल अपनी माता को दासता से मुक्त कराना है, अमृत नागों को पिलाना नहीं। दोनों के बीच सहमति बनी कि गरुड़ अमृत कलश नागों के सामने रख देंगे और जैसे ही वे स्नान करने जाएंगे, उसी समय इंद्र अमृत कलश वापस ले जाएंगे।
गरुड़ ने नागों के सामने रखा अमृत कलश
गरुड़ नागों के पास पहुंचे और अमृत कलश उनके सामने रख दिया। उन्होंने कहा कि अमृत ग्रहण करने से पहले शास्त्रों के अनुसार स्नान और शुद्धि आवश्यक है। नाग स्नान करने चले गए। इसी अवसर का लाभ उठाकर देवराज इंद्र वहां पहुंचे और अमृत कलश पुनः स्वर्ग ले गए। जब नाग लौटे तो वहां अमृत कलश नहीं था। उन्हें केवल कुश घास दिखाई दी, जिस पर अमृत की कुछ बूंदें गिरी थीं। नागों ने अमृत पाने की आशा में कुश घास को चाटना शुरू किया। कुश की धार अत्यंत तीक्ष्ण थी, जिससे उनकी जीभ बीच से कट गई। पौराणिक मान्यता है कि इसी कारण आज भी सर्पों की जीभ दो भागों में विभाजित दिखाई देती है।
विनता हुईं दासता से मुक्त
गरुड़ ने नागों की शर्त पूरी कर दी थी। अमृत कलश उनके सामने पहुंच चुका था। इसलिए नागों को अपना वचन निभाना पड़ा। उन्होंने विनता को दासता से मुक्त कर दिया। इस प्रकार गरुड़ ने अपने अद्वितीय साहस, बुद्धिमत्ता और पराक्रम से अपनी माता को बंधन से मुक्त कराया। यहीं से गरुड़ का स्थान देवताओं में और भी उच्च हो गया। भगवान विष्णु के वाहन बनने के साथ-साथ उन्हें पक्षीराज की उपाधि भी प्राप्त हुई। पुराणों में वर्णित यह कथा गरुड़ के अमृत कलश प्राप्त करने की संपूर्ण पौराणिक गाथा के रूप में प्रसिद्ध है।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)