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Vishnu Purana: योगनिद्रा में क्यों रहते हैं विष्णु जी? जानें क्षीरसागर और प्रलय से जुड़ी पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Vishnu Purana: पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु की योगनिद्रा सामान्य निद्रा नहीं है। यह उनकी दिव्य योगमाया की अवस्था है। इस अवस्था में भी वे संपूर्ण सृष्टि का संचालन करने में समर्थ रहते हैं। 

Vishnu Purana
Vishnu Purana: सनातन धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है। उनके अनेक स्वरूपों और लीलाओं का वर्णन पुराणों में मिलता है। इन्हीं में से एक अत्यंत प्रसिद्ध स्वरूप है क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर योगनिद्रा में स्थित भगवान विष्णु का। मंदिरों की मूर्तियों से लेकर धार्मिक चित्रों तक, भगवान विष्णु को अनंत शेष पर विराजमान, माता लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा करती हुईं और वे योगनिद्रा में लीन दिखाई देते हैं। यह स्वरूप केवल एक चित्रण नहीं, बल्कि इसके पीछे विस्तृत पौराणिक कथा भी वर्णित है। आखिर भगवान विष्णु योगनिद्रा में क्यों रहते हैं, कब वे इस अवस्था में जाते हैं और इसका उल्लेख किन घटनाओं से जुड़ा है? आइए जानते हैं पुराणों में वर्णित यह विस्तृत कथा...

क्या है भगवान विष्णु की योगनिद्रा?

पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु की योगनिद्रा सामान्य निद्रा नहीं है। यह उनकी दिव्य योगमाया की अवस्था है। इस अवस्था में भी वे संपूर्ण सृष्टि का संचालन करने में समर्थ रहते हैं। वे बाहरी दृष्टि से विश्राम करते हुए प्रतीत होते हैं, लेकिन उनकी चेतना सम्पूर्ण ब्रह्मांड पर समान रूप से विद्यमान रहती है। यही कारण है कि देवता भी जब किसी संकट में पड़ते हैं तो भगवान विष्णु की योगनिद्रा भंग होने की प्रतीक्षा करते हैं या उनकी स्तुति कर उन्हें जागृत करते हैं।

सृष्टि की उत्पत्ति और क्षीरसागर में भगवान विष्णु

विष्णु पुराण, भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों के अनुसार प्रत्येक कल्प के अंत में प्रलय होती है। उस समय सम्पूर्ण चराचर जगत जल में विलीन हो जाता है। न पृथ्वी रहती है, न पर्वत, न वन, न जीव-जंतु और न ही देवताओं का अस्तित्व दिखाई देता है। चारों ओर केवल जल ही जल होता है। इसी प्रलयकाल में भगवान विष्णु क्षीरसागर में अनंत शेष पर योगनिद्रा में स्थित रहते हैं। शेषनाग अपनी हजारों फणों से भगवान की शय्या बनाते हैं और माता लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा करती रहती हैं। जब नई सृष्टि के निर्माण का समय आता है, तब भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट होता है। उसी कमल पर ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं और भगवान विष्णु की आज्ञा से नई सृष्टि की रचना आरंभ करते हैं।

योगनिद्रा और देवी योगमाया का संबंध

मार्कण्डेय पुराण तथा देवी महात्म्य में भगवान विष्णु की योगनिद्रा का विशेष उल्लेख मिलता है। वहां बताया गया है कि भगवान विष्णु की योगनिद्रा स्वयं आदिशक्ति योगमाया का स्वरूप है। जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में स्थित होते हैं, तब उनकी यह दिव्य शक्ति उनके भीतर विद्यमान रहती है। आवश्यकता पड़ने पर यही योगमाया भगवान की लीलाओं में सहायक बनती है। इसी योगमाया के कारण भगवान विष्णु अपनी इच्छा से योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और समय आने पर स्वयं जागृत भी हो जाते हैं।

मधु और कैटभ की उत्पत्ति की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार प्रलयकाल के समय भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में स्थित थे। उसी समय उनके कानों के मैल से दो अत्यंत बलशाली दैत्य उत्पन्न हुए। उनका नाम मधु और कैटभ था। दोनों दैत्यों ने चारों ओर दृष्टि डाली तो उन्हें भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल पर बैठे ब्रह्मा जी दिखाई दिए। उन्होंने ब्रह्मा जी पर आक्रमण करने का निश्चय किया। ब्रह्मा जी ने जब उन दोनों दैत्यों को अपनी ओर आते देखा तो वे अत्यंत चिंतित हो उठे। भगवान विष्णु उस समय योगनिद्रा में थे। ऐसे में ब्रह्मा जी ने भगवान की योगनिद्रा स्वरूपिणी देवी की स्तुति की।

ब्रह्मा जी ने की योगनिद्रा देवी की आराधना

ब्रह्मा जी ने देवी योगमाया की स्तुति करते हुए प्रार्थना की कि वे भगवान विष्णु की योगनिद्रा समाप्त करें ताकि वे दैत्यों से रक्षा कर सकें। ब्रह्मा जी की स्तुति से प्रसन्न होकर योगनिद्रा देवी भगवान विष्णु के शरीर से बाहर प्रकट हुईं। उनके बाहर आते ही भगवान विष्णु जागृत हो गए। भगवान विष्णु ने देखा कि मधु और कैटभ ब्रह्मा जी पर आक्रमण करने के लिए तैयार खड़े हैं। तब उन्होंने उन दोनों दैत्यों को युद्ध के लिए ललकारा।

भगवान विष्णु और मधु-कैटभ का युद्ध

मधु और कैटभ अत्यंत पराक्रमी थे। भगवान विष्णु और दोनों दैत्यों के बीच लंबा युद्ध हुआ। कई वर्षों तक यह युद्ध चलता रहा। दोनों दैत्य अपनी शक्ति के कारण बार-बार भगवान के प्रहारों से बच निकलते थे। युद्ध के दौरान दोनों दैत्यों को अपने बल का अत्यधिक अभिमान हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु से ही वर मांगने के लिए कहा। भगवान विष्णु ने अवसर देखकर कहा कि यदि तुम मुझसे प्रसन्न हो तो मुझे यह वर दो कि मैं तुम दोनों का वध कर सकूं।

अपने वचन से बंधे मधु और कैटभ ने कहा कि हमारा वध केवल उस स्थान पर हो सकता है जहां जल न हो, तब भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी जंघा पर उठाया, क्योंकि वह स्थान जल से ऊपर था। वहीं उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से दोनों दैत्यों का वध कर दिया। इस प्रकार ब्रह्मा जी सुरक्षित हुए और आगे चलकर सृष्टि की रचना का कार्य पूर्ण हुआ।

भगवान विष्णु स्वयं योगनिद्रा में क्यों जाते हैं?

पुराणों में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु अपनी इच्छा से योगनिद्रा धारण करते हैं। यह किसी थकान या दुर्बलता का परिणाम नहीं, बल्कि सृष्टि के कालचक्र का एक आवश्यक भाग है। जब एक कल्प समाप्त होकर प्रलय आती है, तब सृष्टि का समस्त कार्य रुक जाता है। उस समय भगवान विष्णु योगनिद्रा में स्थित रहते हैं। जैसे ही नए कल्प का आरंभ होता है, वे जागृत होकर ब्रह्मा जी के माध्यम से पुनः सृष्टि की रचना का क्रम प्रारंभ कराते हैं। इस प्रकार उनकी योगनिद्रा सृष्टि के एक चक्र के पूर्ण होने और दूसरे चक्र के प्रारंभ होने के मध्य की दिव्य अवस्था मानी गई है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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