विज्ञापन
Home  mythology  ram katha  ramayana ramayan me kaun tha kevat bhagwan shree ram ko ganga paar karane wale bhakt ki pauranik katha

Ramayana: रामायण में आखिर कौन था केवट? भगवान श्रीराम को गंगा पार कराने वाले भक्त की अद्भुत कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ramayana: केवट निषाद समुदाय का एक नाविक था। उसका जीवन गंगा नदी के किनारे बीतता था और वह लोगों को नाव के माध्यम से नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचाने का कार्य करता था। 

Ramayana
Ramayana: अयोध्या से वनवास के लिए प्रस्थान करने के बाद भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अनेक स्थानों से होते हुए गंगा तट पर पहुंचे। यहीं उनकी भेंट एक ऐसे पात्र से हुई, जिसका उल्लेख रामायण की सबसे भावपूर्ण घटनाओं में किया जाता है। यह पात्र था केवट। केवट का वर्णन रामायण में बहुत लंबे समय तक नहीं मिलता, लेकिन उसकी भक्ति, बुद्धिमत्ता और भगवान श्रीराम के प्रति समर्पण ने उसे अमर बना दिया। रामायण के अयोध्याकांड में वर्णित यह प्रसंग आज भी श्रद्धा के साथ सुनाया जाता है। केवट केवल एक नाविक नहीं था, बल्कि वह ऐसा भक्त था, जिसने भगवान को पहचानकर उनकी सेवा का दुर्लभ अवसर प्राप्त किया। आइए जानते हैं कि रामायण में केवट कौन था और उसकी भूमिका क्या थी।

कौन था केवट?

केवट निषाद समुदाय का एक नाविक था। उसका जीवन गंगा नदी के किनारे बीतता था और वह लोगों को नाव के माध्यम से नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचाने का कार्य करता था। उसका परिवार भी इसी आजीविका पर निर्भर था। रामायण के अनुसार वह अत्यंत सरल, विनम्र और भगवान के प्रति श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति था। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान श्रृंगवेरपुर पहुंचे, तब उन्हें गंगा नदी पार करनी थी। उस समय निषादराज गुह ने उनका आदर-सत्कार किया और नदी पार कराने के लिए केवट को बुलाया। यहीं से वह प्रसंग आरंभ होता है जिसने केवट को रामकथा के सबसे प्रिय पात्रों में स्थान दिलाया।

वनवास के दौरान गंगा तट पर पहुंचे श्रीराम

राजा दशरथ की आज्ञा और कैकेयी के वरदानों के कारण भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला। श्रीराम ने बिना किसी विरोध के पिता के वचन की रक्षा के लिए वन जाने का निर्णय लिया। उनके साथ माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी वनगमन के लिए निकल पड़े। अयोध्या से प्रस्थान करने के बाद वे तमसा नदी होते हुए श्रृंगवेरपुर पहुंचे। यहां निषादराज गुह ने उनका स्वागत किया। गुह भगवान श्रीराम का परम मित्र और भक्त था। उसने उनके विश्राम और भोजन की व्यवस्था की। अगले दिन जब गंगा नदी पार करने का समय आया, तब केवट को नाव लेकर बुलाया गया।

केवट तुरंत नाव क्यों नहीं लाए?

जब केवट को यह सूचना मिली कि श्रीराम को गंगा पार करानी है, तब वह तुरंत नाव लेकर नहीं पहुंचा। उसने पहले भगवान के बारे में सुनी हुई बातों को स्मरण किया। उसने सुना था कि मिथिला में भगवान श्रीराम के चरणों की धूल से अहिल्या का उद्धार हुआ था। गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बनी अहिल्या केवल श्रीराम के चरण स्पर्श से पुनः अपने वास्तविक स्वरूप में आ गई थीं। केवट के मन में यही विचार आया कि यदि भगवान के चरणों की धूल उसकी लकड़ी की नाव पर पड़ गई और नाव भी किसी दिव्य रूप में परिवर्तित हो गई, तो उसके परिवार की आजीविका समाप्त हो जाएगी। इसी कारण उसने एक विनम्र निवेदन किया कि वह पहले भगवान के चरण धोना चाहता है, उसके बाद ही उन्हें नाव में बैठाएगा।

चरण धोने का विनम्र आग्रह

जब भगवान श्रीराम ने केवट से नाव लाने को कहा, तब उसने हाथ जोड़कर कहा कि वह बिना चरण धोए उन्हें नाव में नहीं बैठा सकता। उसने अत्यंत विनोदपूर्ण ढंग से अपनी बात कही। उसने कहा कि प्रभु, आपके चरणों की महिमा मैं जानता हूं। आपके चरणों के स्पर्श से पत्थर भी स्त्री बन गया। मेरी नाव तो लकड़ी की बनी है। यदि यह भी किसी सुंदर स्त्री में बदल गई तो मेरे पास आजीविका का कोई साधन नहीं बचेगा, इसलिए पहले मैं आपके चरण धो लूं, ताकि नाव सुरक्षित रहे। रामचरितमानस में यह संवाद अत्यंत मार्मिक और भक्तिभाव से परिपूर्ण माना जाता है। श्रीराम मुस्कुराए और उन्होंने केवट की प्रार्थना स्वीकार कर ली।

भगवान श्रीराम के चरण पखारने का प्रसंग

केवट एक पात्र में जल लेकर आया। उसने अत्यंत श्रद्धा के साथ भगवान श्रीराम के चरण अपने हाथों से धोए। कहा जाता है कि उसने उस जल को अत्यंत पवित्र मानकर अपने परिवार के सदस्यों को भी दिया। उसने स्वयं भी उस चरणामृत को ग्रहण किया।

गंगा नदी पार कराने की घटना

चरण धोने के बाद केवट ने भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को अपनी नाव में बैठाया। उसने अत्यंत सावधानी और श्रद्धा के साथ गंगा नदी पार कराई। पूरी यात्रा के दौरान उसका मन भगवान के दर्शन और सेवा में ही लगा रहा। गंगा के दूसरे किनारे पहुंचने पर भगवान श्रीराम नाव से उतरे और आगे वन की ओर प्रस्थान करने लगे।

भगवान ने पारिश्रमिक देना चाहा

नदी पार कराने के बाद भगवान श्रीराम ने सोचा कि केवट को उसकी सेवा का उचित पारिश्रमिक दिया जाए। उस समय माता सीता ने अपनी अंगूठी उतारकर भगवान को दी, ताकि उसे केवट को दिया जा सके, लेकिन केवट ने हाथ जोड़कर उस भेंट को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। उसने अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में कहा कि वह भी नाव चलाने वाला है और भगवान भी संसार रूपी भवसागर से जीवों को पार लगाने वाले हैं। उसने कहा कि एक ही व्यवसाय करने वाले लोग एक-दूसरे से पारिश्रमिक नहीं लेते। आज मैंने आपको गंगा पार कराया है, जब मेरा समय आएगा तब आप मुझे भवसागर से पार लगा दीजिए। यही मेरे लिए सबसे बड़ा प्रतिफल होगा। केवट के इन शब्दों को सुनकर भगवान श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए।


यह भी पढ़ें:- 

Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 

Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 

Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel