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Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ramayana Mythological Story: रामायण के अयोध्या कांड में ऋषि जाबालि दशरथ के याजक और मंत्री थे, जो भरत के साथ चित्रकूट पहुंचकर श्रीराम को अयोध्या लौटने के लिए तर्क देते हैं।

Ramayana Mythological Story
Ramayana Mythological Story: वाल्मीकि रामायण की पौराणिक कथा में ऐसे अनेक ऋषि-मुनि आए हैं, जिन्होंने श्रीराम के जीवन के विभिन्न प्रसंगों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इन्हीं में से एक हैं ऋषि जाबालि। वे राजा दशरथ की सभा में विद्वान ब्राह्मण, याजक और मंत्री के रूप में जाने जाते थे। रामायण के बालकांड में उनका नाम दशरथ के प्रमुख मंत्रियों में आता है। अयोध्या कांड में उनका सबसे प्रमुख और विस्तृत वर्णन मिलता है, जबकि युद्ध कांड में श्रीराम के राज्याभिषेक के समय वे आठ प्रमुख ऋषियों में शामिल दिखाई देते हैं। आइए जानते हैं उनसे जुड़ी पौराणिक कथा...

रामायण की कथा

रामायण की कथा के अनुसार, जब राजा दशरथ का स्वर्गवास हो गया और भरत ने राज्याभिषेक से इनकार कर दिया, तब भरत अपनी माता कैकेयी, गुरु वशिष्ठ, अन्य ऋषि-मुनियों और मंत्रियों के साथ चित्रकूट पहुंचे। वहां श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वनवास का जीवन व्यतीत कर रहे थे। भरत का उद्देश्य था कि श्रीराम को मनाकर अयोध्या लौटाएं और उन्हें राज्य सौंप दें। भरत ने श्रीराम के चरणों में पड़कर विनती की, किंतु श्रीराम पिता दशरथ के दिए वचन का पालन करने पर अडिग थे। वे बोले कि पिता की आज्ञा का उल्लंघन करना उनके लिए अधर्म होगा।

इस परिस्थिति में जब अन्य ऋषि और भरत की बातें श्रीराम पर प्रभाव नहीं डाल सकीं, तब ऋषि जाबालि ने बोलना शुरू किया। वे दशरथ के याजक थे और ब्राह्मण कुल में उत्पन्न विद्वान थे। रामायण में उनका परिचय ब्राह्मणोत्तम के रूप में दिया गया है। उन्होंने श्रीराम से कहा कि आप बुद्धिमान हैं, फिर भी सामान्य जन की भांति व्यर्थ की धारणाओं में फंसे हुए हैं। किसका किससे संबंध है? प्रत्येक प्राणी अकेला जन्म लेता है और अकेला ही मरता है। जो व्यक्ति कहता है कि यह मेरा पिता है, यह मेरी माता है, वह अपनी बुद्धि खो बैठा है। कोई किसी का नहीं होता।

 

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ऋषि जाबालि का तर्क

जाबालि ने आगे तर्क दिया कि माता-पिता, घर और संपत्ति मात्र विश्राम स्थल की भांति हैं। जैसे कोई यात्री अजनबी गांव में रात बिताकर अगले दिन आगे बढ़ जाता है, वैसे ही ये सब क्षणिक हैं। आप इनमें आसक्त न हों। अयोध्या का राज्य आपके लिए प्रतीक्षा कर रहा है। आप वहां अपना अभिषेक करवाएं और इंद्र की भांति राज्य सुख का उपभोग करें। दशरथ आपसे संबंधित नहीं हैं और न आप उनसे। वे चले गए जहां जाना था। यह सब प्राणियों का स्वाभाविक अंत है। व्यर्थ उन पर शोक क्यों?

उन्होंने श्राद्ध और पितर पूजा पर भी प्रश्न उठाया। कहा कि लोग अष्टक श्राद्ध करते हैं, किंतु मृत व्यक्ति अन्न कैसे खा सकता है? यदि यहां खाया अन्न दूसरे शरीर तक पहुंच सकता है तो दूर यात्रा पर गए व्यक्ति के लिए भी श्राद्ध कर दो, वह रास्ते में भोजन पा जाएगा। यज्ञ, दान, तप और त्याग की बातें विद्वानों ने केवल दूसरों को देने के लिए लिखी हैं। कोई परलोक नहीं है। जो सामने दिखता है, उसी को महत्व दो। जाबालि का कहना था कि श्रीराम को व्यावहारिक दृष्टि से सोचना चाहिए। राज्य की समृद्धि को स्वीकार करें और प्रजा का हित करें। उनके अनुसार, पिता का वचन अब मृत्यु के बाद बंधन नहीं रह गया है।

 

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श्रीराम का ऋषि जाबालि को उत्तर

श्रीराम ने जाबालि के इन वचनों को सुनकर अपना उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि विप्रवर, आपने मेरा हित चाहते हुए जो बात कही है, वह कर्तव्य-सी प्रतीत होती है किंतु वास्तव में अनुचित है। जो पुरुष वेद और धर्म की मर्यादा त्याग देता है, वह पाप में पड़ जाता है। आपकी बुद्धि विषम मार्ग पर है। आप वेद-विरुद्ध विचार रखते हैं। घोर नास्तिकता का प्रचार करने वाले आपको मेरे पिता ने अपना याजक बनाया, इसके लिए मैं उनकी निंदा करता हूं।

श्रीराम ने स्पष्ट कहा कि मैं सत्य की प्रतिज्ञा लेकर वन आया हूं। लोभ, मोह या अज्ञान से मैं पिता के वचन नहीं तोड़ूंगा। मैं वन में रहकर पवित्र फल-मूल से देवताओं और पितरों को तृप्त करूंगा। आपका आचार अनार्य है, चाहे बाहर से पवित्र दिखे। जाबालि के वचन सुनकर श्रीराम रुष्ट हो उठे। उन्होंने कहा कि ऐसे विचारों से समाज में अराजकता फैलती है। सत्यपालन ही धर्म है।

जाबालि ने श्रीराम के उत्तर पर कहा कि रघुनंदन, न तो मैं नास्तिक हूं और न नास्तिकों की बात कर रहा हूं। परलोक नहीं है, ऐसा मेरा मत नहीं। मैंने केवल आपको राजी करने के लिए, अयोध्या लौटाने के उद्देश्य से ये बातें कहीं। अवसर देखकर मैं आस्तिक भी हो जाता हूं और आवश्यकता पड़ने पर नास्तिक-सा भी बोल सकता हूं। मेरा उद्देश्य केवल आपका हित था।

इसके बाद गुरु वशिष्ठ ने भी हस्तक्षेप किया और श्रीराम का चित्त शांत किया। उन्होंने सृष्टि की उत्पत्ति और धर्म के सिद्धांतों का वर्णन किया। जाबालि चुप हो गए। इस प्रसंग के बाद जाबालि अयोध्या नहीं लौटे। कुछ कथाओं में कहा गया है कि वे वन में ही रह गए। रामायण के युद्ध कांड में जब श्रीराम का राज्याभिषेक होता है, तब आठ ऋषि अभिषेक करते हैं- वशिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, कात्यायन, सुयज्ञ, गौतम और विजय। जाबालि उनमें शामिल थे।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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