Vishnu Purana: विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित अजामिल की पौराणिक कथा पढ़ें। जानें कैसे जीवनभर पाप करने वाले अजामिल को मृत्यु के समय 'नारायण' नाम का उच्चारण करने पर विष्णुदूतों ने यमदूतों से बचाकर भगवान विष्णु का धाम दिलाया।
Vishnu Purana: सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में वर्णित अजामिल की कथा भगवान विष्णु के नाम की महिमा का अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग मानी जाती है। यह कथा मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कंध में विस्तार से मिलती है और विष्णु पुराण में भी भगवान विष्णु के नाम तथा उनकी कृपा का महत्व वर्णित है। अजामिल का जीवन इस बात का उदाहरण माना जाता है कि किस प्रकार एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण मोह और अधर्म के कारण पापमय जीवन में डूब गया, लेकिन जीवन के अंतिम क्षणों में उसके मुख से निकला "नारायण" नाम उसके भाग्य का निर्णायक क्षण बन गया। यही वह घटना है, जिसके कारण यमदूत और विष्णुदूत आमने-सामने आए और भगवान विष्णु के नाम की महिमा सम्पूर्ण लोकों में प्रकट हुई। आइए जानते हैं क्या है इसकी पूरी पौराणिक कथा...
धर्मनिष्ठ ब्राह्मण के रूप में हुआ था अजामिल का जन्म
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में कान्यकुब्ज नगरी में अजामिल नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह वेदों का ज्ञाता, सत्यवादी, विनम्र और अत्यंत सदाचारी था। प्रतिदिन संध्या-वंदन, यज्ञ, देवपूजन, अतिथि सेवा तथा अपने माता-पिता की सेवा करना उसका नित्य नियम था। वह शास्त्रों के अनुसार जीवन व्यतीत करता था और समाज में उसका बहुत सम्मान था। अजामिल का विवाह भी एक कुलीन और धर्मपरायण स्त्री से हुआ था। दोनों धर्मानुसार जीवन बिताते थे और किसी प्रकार का अधर्म उनके जीवन में नहीं था।
एक घटना ने बदल दिया पूरा जीवन
एक दिन उसके पिता ने उसे वन में जाकर यज्ञ के लिए फल, फूल और कुश लाने को कहा। अजामिल आज्ञा का पालन करते हुए वन पहुंचा। वहीं उसने एक शूद्र पुरुष को एक वेश्या के साथ मदिरा के नशे में अनुचित आचरण करते देखा। भागवत कथा के अनुसार, उस दृश्य ने उसके मन को विचलित कर दिया। वह उस स्त्री के रूप और आकर्षण में ऐसा बंधा कि बार-बार उसी का स्मरण करने लगा। धीरे-धीरे उसका मन धर्मकर्म से हटने लगा और अंततः वह उस वेश्या के साथ रहने लगा।
धर्म का त्याग कर पापमय जीवन में डूब गया अजामिल
वेश्या के मोह में पड़ने के बाद अजामिल ने अपनी पत्नी, माता-पिता और धार्मिक जीवन को छोड़ दिया। उसके भीतर का संयम समाप्त हो गया। वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए चोरी, छल, कपट, जुआ, झूठ और अन्य अनुचित साधनों का सहारा लेने लगा। समय बीतता गया और अजामिल पूरी तरह अधर्म के मार्ग पर चल पड़ा। जिस व्यक्ति का जीवन कभी वेदों के अध्ययन और भगवान की उपासना में बीतता था, वही अब पापपूर्ण कर्मों में लिप्त रहने लगा। उसने उसी स्त्री के साथ गृहस्थ जीवन शुरू कर दिया और उससे उसके कई पुत्र उत्पन्न हुए।
सबसे छोटे पुत्र का नाम रखा 'नारायण'
समय के साथ अजामिल वृद्ध हो गया। उसके अनेक पुत्रों में सबसे छोटा पुत्र उसे सबसे अधिक प्रिय था। पौराणिक कथा के अनुसार, किसी शुभ संयोग से उसने अपने सबसे छोटे पुत्र का नाम "नारायण" रखा। वृद्धावस्था में उसका अधिकांश समय उसी बालक के साथ बीतता था। वह उसे बार-बार प्रेम से पुकारता- "नारायण इधर आओ", "नारायण मेरे पास बैठो", "नारायण भोजन करो।" यद्यपि वह भगवान विष्णु का स्मरण करने के उद्देश्य से यह नाम नहीं लेता था, लेकिन उसके मुख से दिनभर "नारायण" नाम का उच्चारण होता रहता था।
मृत्यु का समय आया तो पहुंचे यमदूत
जब अजामिल की आयु पूरी होने लगी और मृत्यु का समय निकट आया, तब उसने अपने सामने अत्यंत भयानक रूप वाले तीन यमदूतों को देखा। उनके हाथों में पाश थे और वे उसके प्राण हरने के लिए आए थे। यमदूतों को देखकर अजामिल भय से कांप उठा। उसी समय उसका छोटा पुत्र थोड़ी दूरी पर खेल रहा था। भयभीत होकर उसने ऊंचे स्वर में पुकारा- "नारायण नारायण" अजामिल अपने पुत्र को बुला रहा था, लेकिन उसके मुख से भगवान विष्णु का पवित्र नाम निकला।
'नारायण' नाम सुनते ही पहुंचे विष्णुदूत
जैसे ही अजामिल के मुख से "नारायण" नाम निकला, उसी क्षण भगवान विष्णु के दिव्य पार्षद वहां प्रकट हो गए, जिन्हें विष्णुदूत कहा जाता है। उनका तेज सूर्य के समान था। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिन्ह शोभायमान थे। उन्होंने यमदूतों को रोकते हुए कहा कि अजामिल को ले जाने का अधिकार उन्हें नहीं है। यमदूत इस बात से आश्चर्यचकित हो गए। उनके अनुसार अजामिल ने जीवनभर असंख्य पाप किए थे और वह दंड का अधिकारी था।
यमदूत और विष्णुदूत के बीच हुआ संवाद
इसके बाद दोनों पक्षों के बीच धर्म और न्याय को लेकर विस्तृत संवाद हुआ। यमदूतों ने कहा कि अजामिल ने चोरी, छल, पाप और अधर्म से भरा जीवन बिताया है। उसने अपने माता-पिता का त्याग किया, पत्नी को छोड़ दिया और धर्म का परित्याग कर दिया, इसलिए उसे यमलोक ले जाना ही न्याय है, तब विष्णुदूतों ने उत्तर दिया कि मृत्यु के समय जिस व्यक्ति के मुख से भगवान नारायण का नाम निकल जाए, उसके अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान का नाम स्वयं भगवान के समान पवित्र और दिव्य माना गया है, इसलिए अजामिल पर अब यमदूतों का अधिकार नहीं रहा। विष्णुदूतों के तेज और उनके तर्क के सामने यमदूत निरुत्तर हो गए। वे अजामिल को छोड़े बिना यमलोक वापस नहीं जा सकते थे, इसलिए वे अपने स्वामी यमराज के पास लौट गए।
यमराज ने अपने दूतों को क्या बताया?
यमदूतों ने यमराज के समक्ष पूरी घटना सुनाई और पूछा कि वे दिव्य पुरुष कौन थे, जिन्होंने उन्हें रोक दिया, तब यमराज ने बताया कि वे स्वयं भगवान विष्णु के पार्षद थे। उन्होंने अपने दूतों से कहा कि जिन लोगों ने भगवान विष्णु की शरण ग्रहण की हो या जिनके मुख से श्रद्धा अथवा किसी भी प्रकार भगवान का नाम निकले, उनके विषय में अत्यंत सावधानी रखनी चाहिए। यमराज ने यह भी स्पष्ट किया कि भगवान विष्णु के भक्तों पर उनका अधिकार नहीं है। ऐसे जीवों का निर्णय स्वयं भगवान के अधीन होता है।
अजामिल को मिला जीवन का दूसरा अवसर
इस पूरी घटना के दौरान अजामिल की मृत्यु नहीं हुई थी। उसने यमदूतों और विष्णुदूतों के बीच हुए संवाद को सुन लिया। उसे अपने जीवन के सभी पापों का स्मरण हो आया और उसे अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। उसने निश्चय किया कि अब शेष जीवन केवल भगवान विष्णु की आराधना में व्यतीत करेगा। इसके बाद अजामिल ने अपना घर छोड़ दिया और हरिद्वार पहुंचकर गंगा तट पर भगवान विष्णु का भजन, ध्यान और नामस्मरण करने लगा। उसने अपने पूर्व जीवन के सभी अधार्मिक कार्यों का त्याग कर दिया और पूर्ण श्रद्धा से भगवान की उपासना में लग गया।
हरिद्वार में की भगवान विष्णु की आराधना
पौराणिक कथा के अनुसार, हरिद्वार में अजामिल ने लंबे समय तक तप, जप और भगवान विष्णु के नाम का निरंतर स्मरण किया। अब उसका नामस्मरण केवल अपने पुत्र के लिए नहीं, बल्कि स्वयं भगवान के प्रति भक्ति से था। वह निरंतर "ॐ नमो नारायणाय" तथा भगवान विष्णु के नामों का जप करता रहा। धीरे-धीरे उसका मन पूर्ण रूप से भगवान में स्थिर हो गया।
अंत समय में विष्णुदूत फिर पहुंचे
जब अजामिल का अंतिम समय दोबारा आया, तब इस बार कोई यमदूत वहां नहीं पहुंचे। भगवान विष्णु के दिव्य पार्षद पुनः वहां प्रकट हुए। उन्होंने अजामिल का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उसे दिव्य विमान में बैठाकर भगवान विष्णु के धाम ले गए। इस प्रकार वह भगवान के परम धाम को प्राप्त हुआ।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)