Jagannath Temple Flag: पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के सबसे प्राचीन और चमत्कारिक मंदिरों में गिना जाता है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को समर्पित यह मंदिर अपने धार्मिक महत्व के साथ-साथ अनेक रहस्यों के कारण भी सदियों से श्रद्धालुओं और विद्वानों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इन रहस्यों में सबसे अधिक चर्चित है मंदिर के शिखर पर लगा विशाल ध्वज, जिसके बारे में मान्यता है कि वह हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराता हुआ दिखाई देता है। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि स्वयं भगवान जगन्नाथ की दिव्य शक्ति और महिमा का प्रतीक मानी जाती है। मंदिर की परंपराओं में ध्वज का विशेष महत्व है और इसके पीछे एक प्राचीन पौराणिक कथा भी प्रचलित है। आइए जानते हैं कि जगन्नाथ मंदिर के ध्वज से जुड़ा यह रहस्य क्या है और इसकी पौराणिक कथा क्या है।
ध्वज का धार्मिक महत्व
जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर प्रतिदिन नया ध्वज चढ़ाया जाता है। यह परंपरा सदियों से बिना रुके चली आ रही है। मान्यता है कि यदि किसी दिन ध्वज न बदला जाए तो मंदिर का पूजन-विधान बाधित हो जाएगा और मंदिर 18 वर्ष के लिए बंद हो जाएगा। यही कारण है कि हर दिन विशेष सेवायत मंदिर के लगभग 214 फीट ऊंचे शिखर पर बिना किसी आधुनिक सुरक्षा उपकरण के चढ़कर नया ध्वज स्थापित करते हैं। ध्वज को भगवान जगन्नाथ की उपस्थिति और उनके संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जब तक मंदिर पर यह ध्वज लहराता रहेगा, तब तक भगवान स्वयं अपने भक्तों की रक्षा करते रहेंगे।
ध्वज का पौराणिक महत्व
श्री जगन्नाथ मंदिर का ध्वज भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र है। इसे पतितपावन बाना भी कहा जाता है। ध्वज पर शिव का चंद्र चिह्न अंकित होता है। यह ध्वज मंदिर की ऊंचाई पर इतना भव्य रूप में फहराता है कि दर्शनार्थी दूर से ही इसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं। प्रतिदिन सायंकाल इस ध्वज को बदलने की परंपरा है, जिसमें सेवक ऊपर चढ़कर नया ध्वज लगाते हैं।
हनुमान जी से जुड़ी पौराणिक कथा
इस रहस्य की जड़ पौराणिक कथा में है, जो भगवान जगन्नाथ की आराम और हनुमान जी की भक्ति से संबंधित है। पौराणिक कथा से अनुसार, एक बार देवर्षि नारद जी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पुरी धाम पहुंचे। मंदिर के द्वार पर उन्हें महावीर हनुमान जी मिले। हनुमान जी ने कहा कि इस समय प्रभु विश्राम कर रहे हैं, अतः आपको कुछ समय प्रतीक्षा करनी होगी। नारद जी द्वार के बाहर खड़े होकर प्रतीक्षा करने लगे।
कुछ देर बाद नारद जी ने मंदिर के अंदर झांका तो उन्होंने देखा कि भगवान जगन्नाथ लक्ष्मी जी के साथ उदास बैठे हुए हैं। नारद जी ने विनम्रतापूर्वक कारण पूछा। भगवान ने बताया कि समुद्र की निरंतर तरंगों की ध्वनि उन्हें विश्राम नहीं लेने देती। यह शोर निरंतर उनके कानों में गूंजता रहता है। नारद जी यह बात सुनकर बाहर आए और हनुमान जी को पूरी स्थिति बताई। हनुमान जी भगवान की इस पीड़ा सुनकर क्रोधित हो गए। वे समुद्र तट की ओर गए और समुद्र देव से बोले, “हे समुद्र! तुम अपनी ध्वनि रोक लो। मेरे स्वामी तुम्हारे शोर के कारण विश्राम नहीं कर पा रहे हैं।”
समुद्र देव प्रकट हुए और हनुमान जी से कहा, “हे महावीर! यह मेरे बस की बात नहीं है। जहां तक पवन का वेग चलेगा, वहां तक यह ध्वनि पहुंचेगी। इसके लिए आपको अपने पिता पवन देव से प्रार्थना करनी चाहिए।” हनुमान जी ने तत्काल अपने पिता पवन देव का आह्वान किया। उन्होंने पवन देव से निवेदन किया कि वे मंदिर की दिशा में हवा न बहाएं, ताकि समुद्र की ध्वनि वहां तक न पहुंचे।
पवन देव ने पुत्र को समझाया, “यह संभव नहीं है, क्योंकि हवा का बहना प्रकृति का नियम है। परंतु मैं एक उपाय बताता हूं। तुम्हें मंदिर के आसपास ध्वनिरहित वायुकोशीय वृत अर्थात वायु का चक्र बनाना होगा, जिससे हवा का प्रवाह मंदिर के चारों ओर घूमता रहे और अंदर न जाए।” हनुमान जी ने पिता की बात समझ ली। अपनी अपार शक्ति से उन्होंने स्वयं को दो भागों में विभाजित कर लिया। फिर वे वायु से भी अधिक तेज गति से मंदिर के चारों ओर चक्कर लगाने लगे। उनके इस दिव्य प्रयास से वायु का एक शक्तिशाली चक्र बन गया। इस चक्र के प्रभाव से समुद्र की तरंगों की ध्वनि मंदिर के अंदर नहीं पहुंच पाती। वह ध्वनि मंदिर के आसपास ही घूमती रहती है। फलस्वरूप भगवान जगन्नाथ और लक्ष्मी जी को पूर्ण विश्राम मिलता है।
ध्वज और वायु चक्र का संबंध
इसी दिव्य वायु चक्र के कारण मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज सदैव हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। हनुमान जी द्वारा बनाए गए इस वायु प्रवाह ने ध्वज की दिशा को भी प्रभावित किया है। भक्तों का विश्वास है कि हनुमान जी आज भी इस क्षेत्र की दसों दिशाओं की रक्षा करते हैं और उनके चमत्कार मंदिर परिसर में सर्वत्र व्याप्त हैं।
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