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Mahabharata: आखिर कर्ण को जन्म से कैसे मिले थे कवच-कुंडल? सूर्यपुत्र के पिछले जन्म से जुड़ा है इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata: पौराणिक कथाओं के अनुसार कर्ण का पूर्व जन्म सहस्रकवच नाम के एक अत्यंत शक्तिशाली असुर के रूप में हुआ था। सहस्रकवच का नाम ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति का परिचय देता था। 

Mahabharata Mythological Story: 
Mahabharata Mythological Story: महाभारत में कर्ण का नाम उन महान योद्धाओं में लिया जाता है, जिनके पराक्रम और दानशीलता की चर्चा आज भी होती है। कर्ण की सबसे बड़ी विशेषता उनका जन्मजात कवच और कुंडल थे। यह दिव्य कवच-कुंडल उनके शरीर का हिस्सा थे, जिन्हें कोई भी अस्त्र-शस्त्र भेद नहीं सकता था। यही कारण था कि युद्धभूमि में कर्ण को लगभग अजेय माना जाता था, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कर्ण को यह दिव्य कवच-कुंडल केवल सूर्यदेव के वरदान से ही नहीं मिले थे, बल्कि इसके पीछे उनके पिछले जन्म से जुड़ी एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा भी बताई जाती है। पुराणों के अनुसार कर्ण का पूर्वजन्म एक ऐसे असुर के रूप में हुआ था, जिसने अपनी तपस्या से भगवान सूर्य को प्रसन्न कर सौ दिव्य कवच प्राप्त किए थे। इन्हीं कवचों का संबंध आगे चलकर कर्ण के जन्म से जोड़ा जाता है। आइए जानते हैं क्या है इसकी पौराणिक कथा...

पूर्व जन्म में कर्ण थे सहस्रकवच नामक असुर

पौराणिक कथाओं के अनुसार कर्ण का पूर्व जन्म सहस्रकवच नाम के एक अत्यंत शक्तिशाली असुर के रूप में हुआ था। सहस्रकवच का नाम ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति का परिचय देता था। उसके शरीर पर एक नहीं बल्कि सौ दिव्य कवच थे। इन कवचों के कारण उसे किसी भी प्रकार के अस्त्र या शस्त्र से मारना लगभग असंभव था।

कहा जाता है कि सहस्रकवच ने वर्षों तक कठोर तपस्या करके सूर्यदेव को प्रसन्न किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे सौ अभेद्य कवच प्रदान किए। ये कवच केवल बाहरी कवच नहीं थे, बल्कि उसके शरीर के साथ एकाकार हो चुके थे। जब तक ये कवच उसके शरीर पर रहते, तब तक कोई भी देवता, दानव या मानव उसका वध नहीं कर सकता था।

सौ कवचों का रहस्य क्या था?

सूर्यदेव से वरदान प्राप्त करते समय सहस्रकवच ने अमरत्व की कामना की थी, तब सूर्यदेव ने उसे पूर्ण अमरत्व तो नहीं दिया, लेकिन सौ दिव्य कवच प्रदान किए। साथ ही यह भी वरदान दिया कि प्रत्येक कवच तभी नष्ट होगा, जब कोई योद्धा लगातार एक हजार वर्षों तक तपस्या करे और फिर एक हजार वर्षों तक उससे युद्ध करे। यदि उस युद्ध में वह एक कवच तोड़ने में सफल हो जाता, तभी एक कवच नष्ट होता। इसके बाद अगले कवच को तोड़ने के लिए फिर से उतनी ही तपस्या और युद्ध करना पड़ता। इस प्रकार सभी सौ कवचों को नष्ट करने में असंख्य वर्षों का समय लगना तय था। इसी वरदान के कारण सहस्रकवच स्वयं को लगभग अजेय समझने लगा।

देवताओं के लिए बना सबसे बड़ा संकट

समय बीतने के साथ सहस्रकवच का बल और अहंकार दोनों बढ़ने लगे। उसने देवताओं, ऋषियों और यज्ञों में विघ्न डालना शुरू कर दिया। उसकी शक्ति इतनी अधिक थी कि इंद्र सहित अनेक देवता भी उसका सामना नहीं कर सके। कई बार देवताओं ने युद्ध किया, लेकिन सहस्रकवच के दिव्य कवचों के सामने सभी प्रयास निष्फल सिद्ध हुए, तब देवगण भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे और उनसे इस संकट का समाधान करने की प्रार्थना की।

भगवान विष्णु ने लिया नर-नारायण अवतार

देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने बदरिकाश्रम में नर और नारायण के रूप में अवतार धारण किया। नर और नारायण दोनों तपस्या और धर्म के प्रतीक माने जाते हैं। उन्होंने सहस्रकवच का अंत करने के लिए एक विशेष योजना बनाई। योजना के अनुसार जब एक भाई तपस्या करता, तब दूसरा सहस्रकवच से युद्ध करता। युद्ध समाप्त होने पर दोनों अपनी भूमिकाएं बदल लेते। इस प्रकार तपस्या और युद्ध का क्रम लगातार चलता रहा। इस अद्भुत उपाय के कारण सहस्रकवच के एक-एक करके कवच टूटने लगे।

एक-एक करके टूटते गए दिव्य कवच

पौराणिक कथा के अनुसार यह संघर्ष अत्यंत लंबा चला। प्रत्येक कवच को तोड़ने में हजारों वर्षों का समय लगता था। नर और नारायण के धैर्य और तप के सामने सहस्रकवच की शक्ति धीरे-धीरे कम होने लगी। लंबे काल के बाद उसके 99 दिव्य कवच नष्ट हो गए। अब उसके शरीर पर केवल एक अंतिम कवच बचा था। जब सहस्रकवच को यह आभास हुआ कि अब उसका अंतिम कवच भी टूट सकता है, तब वह युद्धभूमि से निकलकर सीधे सूर्यदेव की शरण में पहुंच गया।

सूर्यदेव ने दी अंतिम रक्षा

सहस्रकवच ने सूर्यदेव से अपनी रक्षा की प्रार्थना की। सूर्यदेव ने अपने भक्त को तत्काल अभय प्रदान किया। कथा के अनुसार उसी समय उसका शरीर समाप्त हुआ और उसे अगले जन्म का वर प्राप्त हुआ। सूर्यदेव ने कहा कि अगले जन्म में वह स्वयं उनके अंश से जन्म लेगा और उसके शरीर पर अंतिम दिव्य कवच तथा दिव्य कुंडल जन्म से ही विद्यमान रहेंगे। यही अंतिम कवच उसके अगले जन्म में उसकी पहचान बनेंगे। यहीं से कर्ण के जन्मजात कवच-कुंडल की कथा प्रारंभ होती है।

कुंती को मिला सूर्यदेव का वरदान

महाभारत के अनुसार राजा कुंतिभोज के महल में ऋषि दुर्वासा आए थे। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उन्होंने कुंती को एक दिव्य मंत्र दिया। इस मंत्र के प्रभाव से वह किसी भी देवता का आह्वान कर सकती थीं। जिज्ञासावश कुंती ने एक दिन सूर्यदेव का स्मरण किया। मंत्र के प्रभाव से सूर्यदेव तत्काल प्रकट हुए। उन्होंने कुंती को आश्वस्त किया कि उनका सम्मान अक्षुण्ण रहेगा और उन्हें एक दिव्य पुत्र की प्राप्ति होगी। इसके बाद सूर्यदेव के तेज से एक बालक का जन्म हुआ, जिसके शरीर पर जन्म लेते ही दिव्य कवच और स्वर्णिम कुंडल सुशोभित थे। यही बालक आगे चलकर कर्ण कहलाया।

जन्म से ही शरीर का हिस्सा थे कवच और कुंडल

महाभारत में वर्णन मिलता है कि कर्ण के कवच और कुंडल किसी आभूषण की तरह धारण किए हुए नहीं थे। वे उसके शरीर के साथ जन्मे थे और उसी का अंग थे। इसी कारण उन्हें सामान्य उपायों से अलग नहीं किया जा सकता था। वे कर्ण को हर प्रकार के अस्त्रों से सुरक्षा प्रदान करते थे। युद्ध में उन पर प्रहार होने पर भी उनका शरीर सुरक्षित रहता था। इसी दिव्य रक्षा के कारण कर्ण को महाभारत का सबसे कठिन प्रतिद्वंद्वी माना जाता था।

इंद्र को हुई चिंता

जब महाभारत युद्ध की तैयारी होने लगी, तब देवताओं को ज्ञात था कि यदि कर्ण अपने दिव्य कवच-कुंडलों सहित युद्ध करेगा तो अर्जुन के लिए उसे पराजित करना अत्यंत कठिन होगा। अर्जुन के पिता इंद्र इस बात से चिंतित हुए। उन्हें यह भी पता था कि कर्ण कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाते, तब इंद्र ने एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और कर्ण के पास दान मांगने पहुंचे।

दानवीर कर्ण ने काटकर दे दिए कवच-कुंडल

ब्राह्मण रूप में आए इंद्र ने कर्ण से उनके जन्मजात कवच और कुंडल दान में मांग लिए। सूर्यदेव ने पहले ही कर्ण को स्वप्न में सावधान कर दिया था कि यह ब्राह्मण वास्तव में इंद्र हैं और यदि उन्होंने कवच-कुंडल दान कर दिए तो उनकी सुरक्षा समाप्त हो जाएगी। फिर भी कर्ण ने अपने दान धर्म का पालन किया। उन्होंने अपने शरीर से कवच और कुंडल स्वयं काटकर इंद्र को दान में दे दिए। कहा जाता है कि ऐसा करते समय उनके शरीर से रक्त बहने लगा, क्योंकि वे शरीर का ही अंग थे। कर्ण की इस अनुपम दानशीलता से इंद्र भी अत्यंत प्रभावित हुए।

इंद्र ने दिया अमोघ अस्त्र

कर्ण की उदारता देखकर इंद्र ने उन्हें वासवी शक्ति नामक दिव्य अस्त्र प्रदान किया। यह ऐसा अस्त्र था, जिसका प्रयोग केवल एक बार किया जा सकता था और जिस पर यह छोड़ा जाता, उसका बचना लगभग असंभव माना जाता था। महाभारत युद्ध में कर्ण ने इसी अस्त्र का प्रयोग घटोत्कच के वध के लिए किया। इसके बाद वह दिव्य शक्ति पुनः इंद्र के पास लौट गई। महाभारत के युद्ध के 17वें दिन कर्ण की मृत्यु हुई थी। जब उनके रथ का पहिया जमीन में धंस गया और वे उसे निकालने का प्रयास कर रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने निहत्थे कर्ण का वध कर दिया था।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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