Shiva Purana: भगवान शिव को त्रिनेत्रधारी, नीलकंठ, जटाधारी और भस्मधारी के रूप में पूजा जाता है। उनके गले में सर्प, सिर पर चंद्रमा और जटाओं में गंगा विराजमान हैं। उनका वाहन नंदी है और उनके आसपास विभिन्न प्रकार के गणों का वर्णन मिलता है।
Shiva Purana: भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। उनका स्वरूप जितना रहस्यमय है, उतना ही उनके गणों का संसार भी अनोखा माना गया है। भगवान शिव के गणों में नंदी, भैरव, वीरभद्र जैसे दिव्य स्वरूपों के साथ भूत, प्रेत, पिशाच और कई तरह के विचित्र माने जाने वाले जीवों का भी उल्लेख मिलता है। यही वजह है कि भगवान शिव को बाकी देवी-देवताओं से अलग माना जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान शिव ने भूत-प्रेत और ऐसे प्राणियों को ही अपने गणों में स्थान क्यों दिया? क्या इसके पीछे कोई खास धार्मिक मान्यता है? आइए जानते हैं भगवान शिव से जुड़े इस रहस्य को...
कौन होते हैं भगवान शिव के गण?
धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव के साथ रहने वाले समूह को शिवगण कहा गया है। इन गणों का स्वरूप सामान्य देवताओं से काफी अलग बताया गया है। इनमें नंदी महाराज जैसे दिव्य गण भी हैं और भूत, प्रेत, पिशाच तथा अन्य विचित्र स्वरूप वाले गण भी बताए गए हैं। शिवगणों का प्रमुख कार्य भगवान शिव की सेवा करना और उनके साथ रहना माना जाता है। भगवान शिव को गणों का स्वामी होने के कारण गणपति या गणाधिपति के रूप में भी जाना जाता है।
भूत-प्रेतों से क्यों घिरे रहते हैं महादेव?
धार्मिक मान्यताओं में भगवान शिव को ऐसे देवता के रूप में देखा जाता है, जो किसी के बाहरी स्वरूप या सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं करते। उनका संबंध उन जीवों और शक्तियों से भी माना जाता है, जिन्हें संसार सामान्य तौर पर भय और अशुभता से जोड़कर देखता है। श्मशान में निवास करने वाले, भस्म धारण करने वाले और नागों को अपने शरीर पर धारण करने वाले भगवान शिव का स्वरूप ही इस बात को दर्शाता है कि महादेव उन चीजों से भी दूर नहीं रहते, जिनसे सामान्य मनुष्य भयभीत होता है। इसी कारण भूत-प्रेत और पिशाच जैसे माने जाने वाले प्राणियों को भी भगवान शिव के गणों में स्थान मिलने की धार्मिक मान्यता है।
भगवान शिव के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं
भगवान शिव की सबसे बड़ी विशेषताओं में उनकी समदृष्टि को माना जाता है। धार्मिक कथाओं में उन्हें देवताओं के साथ-साथ असुरों और अन्य शक्तियों को भी स्वीकार करने वाला बताया गया है। भगवान शिव के गणों को लेकर भी यही मान्यता सामने आती है। उनके लिए किसी प्राणी का रूप या उसकी प्रकृति ही उसके साथ संबंध का आधार नहीं है। जो भी उनकी शरण में आता है, उसे महादेव अपने साथ स्थान दे सकते हैं। यही वजह है कि शिवगणों में ऐसे जीवों का भी वर्णन मिलता है, जिन्हें सामान्य जीवन में भयावह या अशुभ समझा जाता है।
श्मशान और भगवान शिव का संबंध
भगवान शिव के भूत-प्रेतों से संबंध को समझने के लिए उनके श्मशान से जुड़े स्वरूप को भी देखा जाता है। धार्मिक परंपरा में भगवान शिव को श्मशानवासी कहा गया है। वह स्थान, जिसे सामान्य मनुष्य भय और मृत्यु से जोड़कर देखता है, भगवान शिव के लिए साधना और वैराग्य का स्थान माना जाता है। श्मशान में भूत-प्रेत और अन्य अदृश्य शक्तियों की मौजूदगी की धार्मिक मान्यता रही है। ऐसे में भगवान शिव का वहां रहना और उनके गणों में इन शक्तियों का होना उनके स्वरूप से जुड़ा हुआ माना जाता है। महादेव को इसलिए भी विशेष माना जाता है, क्योंकि वह जीवन के साथ मृत्यु को भी स्वीकार करने वाले देवता हैं। उनके लिए श्मशान भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कोई पवित्र स्थान।
भूतनाथ क्यों कहलाते हैं भगवान शिव?
भगवान भगवान शिव के अनेक नामों में एक नाम भूतनाथ भी है। भूतनाथ का अर्थ भूतों के स्वामी या भूतगणों के नाथ के रूप में किया जाता है। यह नाम सीधे तौर पर भगवान शिव के उन गणों से जुड़ा माना जाता है, जिनमें भूत-प्रेत और पिशाच जैसे गणों का वर्णन मिलता है। इसी कारण भगवान शिव के इस स्वरूप को भूतनाथ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भूतनाथ के रूप में भगवान शिव उन सभी शक्तियों के स्वामी हैं, जिन्हें मनुष्य सामान्य तौर पर अपने नियंत्रण से बाहर मानता है।
भूत-प्रेत भी भगवान शिव की शरण में होते हैं
भगवान शिव जी से जुड़ी धार्मिक कथाओं में यह धारणा दिखाई देती है कि महादेव किसी को केवल उसके स्वरूप या कर्म के आधार पर अपने से दूर नहीं करते। उनके गणों में शामिल भूत-प्रेतों को भी उनकी शरण प्राप्त मानी जाती है। इसी वजह से भगवान शिव का स्वरूप अन्य देवताओं से अलग दिखाई देता है। जहां कई देवताओं के स्वरूप को राजसी और दिव्य रूप में दिखाया जाता है, वहीं भगवान शिव अपने आसपास उन शक्तियों को भी स्थान देते हैं, जिनसे संसार डरता है। यही भगवान शिव के औघड़ और करुणामय स्वरूप की एक खास पहचान मानी जाती है।
शिवगणों में नंदी का विशेष स्थान
भगवान शिव के गणों की बात हो और नंदी महाराज का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है। नंदी को शिवजी का परम भक्त और प्रमुख गण माना जाता है। मंदिरों में शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित होने की परंपरा भी इसी संबंध को दर्शाती है। नंदी जहां शिवजी के सबसे प्रमुख और पूजनीय गणों में माने जाते हैं, वहीं दूसरी ओर शिवगणों में भूत, प्रेत और पिशाच जैसे स्वरूपों का भी उल्लेख मिलता है। इससे भगवान शिव के गणों की विविधता का पता चलता है।
भगवान शिव का अनोखा स्वरूप
भगवान शिव को त्रिनेत्रधारी, नीलकंठ, जटाधारी और भस्मधारी के रूप में पूजा जाता है। उनके गले में सर्प, सिर पर चंद्रमा और जटाओं में गंगा विराजमान हैं। उनका वाहन नंदी है और उनके आसपास विभिन्न प्रकार के गणों का वर्णन मिलता है। इन सभी विशेषताओं की वजह से भगवान शिव का स्वरूप अन्य देवताओं से अलग दिखाई देता है। भूत-प्रेतों को गण बनाना भी इसी अनोखे स्वरूप का हिस्सा माना जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)