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Shiva Purana: भगवान शिव के माथे पर क्यों है तीसरा नेत्र? जानें इसके पीछे छिपा दिव्य रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Shiva Purana: भगवान शिव के तीसरे नेत्र से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा माता पार्वती से संबंधित है। कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव हिमालय पर एकांत में तपस्या कर रहे थे।

Shiva Purana
Shiva Purana: भगवान शिव के स्वरूप का वर्णन आते ही उनके जटाजूट, मस्तक पर विराजमान चंद्रमा, गले में सर्प और माथे पर बने तीसरे नेत्र का ध्यान आता है। शिव के तीसरे नेत्र को लेकर पुराणों में कई कथाएं मिलती हैं। यह नेत्र सामान्य नेत्रों से अलग माना गया है और भगवान शिव के दिव्य स्वरूप का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के तीन नेत्रों में सूर्य, चंद्रमा और अग्नि का वास माना गया है। लेकिन आखिर उनके माथे पर तीसरा नेत्र कैसे प्रकट हुआ और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी है? आइए जानते हैं भगवान शिव के तीसरे नेत्र से जुड़ी प्रसिद्ध कथा...

भगवान शिव के तीन नेत्रों की धार्मिक मान्यता

पौराणिक परंपरा में भगवान शिव को त्रिनेत्रधारी कहा गया है। उनके दो नेत्र सामान्य रूप से मस्तक के दोनों ओर स्थित हैं, जबकि तीसरा नेत्र उनके माथे के मध्य में माना जाता है। शैव परंपरा में शिव के तीन नेत्रों का संबंध सूर्य, चंद्रमा और अग्नि से बताया गया है। भगवान शिव का दायां नेत्र सूर्य और बायां नेत्र चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है, जबकि उनके मस्तक पर स्थित तीसरा नेत्र अग्नि स्वरूप माना गया है। यही कारण है कि भगवान शिव के तीसरे नेत्र को अत्यंत शक्तिशाली और दिव्य माना गया है। जब यह नेत्र खुलता है तो उससे निकलने वाली अग्नि की शक्ति से संसार में कोई भी वस्तु सुरक्षित नहीं रह सकती।

 

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तीसरे नेत्र से जुड़ी भगवान शिव और माता पार्वती की कथा

भगवान शिव के तीसरे नेत्र से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा माता पार्वती से संबंधित है। कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव हिमालय पर एकांत में तपस्या कर रहे थे। भगवान शिव गहन ध्यान में लीन थे और उनका पूरा मन तप में लगा हुआ था। उस समय माता पार्वती भी भगवान शिव के पास थीं। माता पार्वती ने भगवान शिव के साथ एक विनोद करने का विचार किया। वह धीरे से भगवान शिव के पीछे पहुंचीं और अपने दोनों हाथों से उनके दोनों नेत्रों को ढक दिया। जैसे ही माता पार्वती ने भगवान शिव की आंखें बंद कीं, उसी क्षण पूरे संसार में अंधकार छा गया।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के दोनों नेत्र केवल उनके देखने के साधारण साधन नहीं थे, बल्कि सूर्य और चंद्रमा से संबंधित दिव्य स्वरूप माने जाते थे। इसलिए उनके दोनों नेत्र बंद होते ही सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश भी मानो लुप्त हो गया। तीनों लोकों में अंधकार फैल गया और देवता तथा समस्त प्राणी भयभीत हो उठे।

भगवान शिव के मस्तक पर प्रकट हुआ तीसरा नेत्र

माता पार्वती द्वारा भगवान शिव के दोनों नेत्र ढक दिए जाने से समस्त संसार अंधकार में डूब गया, तब भगवान शिव के मस्तक पर अचानक एक दिव्य नेत्र प्रकट हुआ। यह नेत्र अग्नि के समान तेजस्वी था। उसके प्रकट होते ही चारों ओर प्रकाश फैल गया। इस तीसरे नेत्र से निकलने वाली अग्नि अत्यंत प्रचंड थी। उसके ताप से धरती और आसपास का वातावरण भी प्रभावित होने लगा। माता पार्वती ने जब इस दिव्य अग्नि का प्रभाव देखा तो उन्होंने भगवान शिव के नेत्र खोल दिए। इसके बाद संसार में फिर से प्रकाश स्थापित हुआ। इसी पौराणिक प्रसंग के आधार पर भगवान शिव को त्रिनेत्रधारी कहा जाता है। उनके मस्तक पर स्थित तीसरा नेत्र उनकी दिव्य शक्ति का स्वरूप माना जाता है।

 

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कामदेव के भस्म होने की कथा

भगवान शिव के तीसरे नेत्र की शक्ति से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में कामदेव के भस्म होने का प्रसंग भी आता है। यह कथा भगवान शिव, माता पार्वती और देवताओं से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके ऐसा वर प्राप्त किया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकता था। वरदान प्राप्त करने के बाद तारकासुर अत्यंत शक्तिशाली हो गया और उसने देवताओं सहित तीनों लोकों में उत्पात मचाना शुरू कर दिया।

देवताओं को ज्ञात था कि भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र के जन्म से ही तारकासुर का अंत संभव है, लेकिन उस समय भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे। देवताओं ने भगवान शिव का ध्यान भंग कराने के लिए कामदेव से सहायता मांगी। कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए अपने पुष्पबाण का प्रयोग किया। जैसे ही कामदेव का बाण भगवान शिव तक पहुंचा, उनका ध्यान भंग हुआ। भगवान शिव ने जब अपने सामने कामदेव को देखा तो वे क्रोधित हो उठे। भगवान शिव ने क्रोध में अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। उनके मस्तक से प्रचंड अग्नि प्रकट हुई और उस अग्नि की ज्वाला से कामदेव भस्म हो गए। इसी घटना के कारण भगवान शिव के तीसरे नेत्र को अग्नि और प्रचंड शक्ति से जुड़ा हुआ माना जाता है।

माता पार्वती के तप से जुड़ा प्रसंग

कामदेव के भस्म होने के बाद भी माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अपनी तपस्या जारी रखी। उन्होंने कठोर तप करके भगवान शिव की आराधना की। माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया और दोनों का विवाह हुआ। इस प्रकार भगवान शिव के तीसरे नेत्र से जुड़ी कथा केवल एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके विवाह और आगे भगवान कार्तिकेय के जन्म से जुड़ी पौराणिक घटनाओं में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।

तीसरा नेत्र क्यों माना जाता है इतना दिव्य

धार्मिक मान्यता में भगवान शिव का तीसरा नेत्र उनके मस्तक के मध्य स्थित दिव्य अग्नि का स्वरूप है। यह नेत्र सामान्य दृष्टि से अलग माना जाता है। भगवान शिव के दो नेत्र संसार में प्रकाश और जीवन से जुड़े सूर्य तथा चंद्रमा के स्वरूप माने जाते हैं, जबकि तीसरा नेत्र अग्नि के स्वरूप में वर्णित है। इसी तीसरे नेत्र के कारण भगवान शिव को त्रिलोचन और त्रिनेत्रधारी जैसे नाम प्राप्त हुए। शिव के अनेक चित्रों और मूर्तियों में उनके मस्तक के मध्य तीसरा नेत्र इसी दिव्य स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। जब भगवान शिव का तीसरा नेत्र खुलता है, तब उससे निकलने वाली अग्नि को अत्यंत प्रचंड माना गया है। कामदेव के भस्म होने की कथा इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। इसी कारण भगवान शिव के तीसरे नेत्र को उनकी रौद्र शक्ति और दिव्य तेज से जोड़ा जाता है।





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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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