Ramayana Mythological Story: लंका के राजा रावण को रामायण में महापराक्रमी, महान विद्वान और भगवान शिव का अनन्य भक्त बताया गया है। वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता होने के बावजूद उसका अहंकार और कामासक्ति ही उसके पतन का कारण बनी। रामायण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में एक ऐसी महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख मिलता है, जिसने आगे चलकर माता सीता के जीवन और रामायण के घटनाक्रम पर गहरा प्रभाव डाला। यह घटना रावण द्वारा अप्सरा रंभा का अपमान करने और उसके बाद नलकुबेर द्वारा दिए गए कठोर श्राप से जुड़ी है। यही वह श्राप था, जिसके कारण रावण माता सीता का हरण तो कर सका, लेकिन उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध कभी स्पर्श नहीं कर पाया। आइए जानते हैं कि नलकुबेर कौन थे, रावण ने ऐसा कौन-सा अपराध किया था और उसे यह भयंकर श्राप क्यों मिला।
नलकुबेर कौन थे?
नलकुबेर धन के देवता कुबेर के पुत्र थे। कुबेर स्वयं रावण के सौतेले बड़े भाई माने जाते हैं। ऋषि विश्रवा की पहली पत्नी इलविला से कुबेर का जन्म हुआ था, जबकि दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा का जन्म हुआ। इस प्रकार नलकुबेर रावण के भतीजे थे। नलकुबेर देवताओं के समान तेजस्वी, धर्मपरायण और मर्यादा का पालन करने वाले थे। उनका विवाह स्वर्ग की प्रसिद्ध अप्सरा रंभा से होना निश्चित हुआ था। रंभा और नलकुबेर एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार कर चुके थे और शीघ्र ही उनका विवाह होने वाला था।
रंभा कौन थीं?
रंभा देवलोक की सबसे सुंदर और विख्यात अप्सराओं में गिनी जाती थीं। उनका उल्लेख अनेक पुराणों और महाकाव्यों में मिलता है। वे इंद्रसभा की प्रमुख अप्सराओं में थीं और अपने सौंदर्य, नृत्य तथा संगीत के लिए प्रसिद्ध थीं। जब उनका विवाह नलकुबेर से निश्चित हुआ, तब वे उन्हें अपने भावी पति के रूप में स्वीकार कर चुकी थीं। इसी कारण वे रावण के लिए पुत्रवधू के समान थीं।
रावण का कैलाश की यात्रा
एक समय रावण अपनी विजय यात्राओं पर निकला हुआ था। अनेक लोकों और राज्यों को जीतने के बाद वह कैलास पर्वत की ओर पहुंचा। भगवान शिव का भक्त होने के कारण वह समय-समय पर कैलाश जाता था। उसी समय स्वर्ग में अनेक देवताओं और गंधर्वों का आगमन हुआ था। अप्सराएं भी विभिन्न कार्यों के लिए वहां जा रही थीं। इसी दौरान रंभा भी नलकुबेर से मिलने के लिए जा रही थीं। वे अत्यंत सुंदर वस्त्र और आभूषण धारण किए हुए थीं तथा अपने भावी पति के पास पहुंचने की उत्सुकता में थीं।
रावण की दृष्टि रंभा पर पड़ी
जब रावण ने मार्ग में रंभा को देखा तो वह उनके अद्भुत सौंदर्य पर मोहित हो गया। उसका मन कामवासना से भर उठा। उसने रंभा का मार्ग रोक लिया और उनसे अपने साथ रहने का आग्रह किया। रंभा ने अत्यंत विनम्रता से रावण को समझाया कि वे उसके बड़े भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर की होने वाली पत्नी हैं। इस नाते वे उसकी पुत्रवधू के समान हैं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि धर्म और कुलमर्यादा के अनुसार उसे उनका सम्मान करना चाहिए।
रंभा ने बार-बार किया निवेदन
रंभा ने रावण से कहा कि वे नलकुबेर से मिलने जा रही हैं और उनका विवाह निश्चित हो चुका है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिस स्त्री का संबंध पुत्र से हो, वह पिता के समान पुरुष के लिए पुत्रवधू मानी जाती है। उन्होंने रावण से प्रार्थना की कि वह अपने कुल की मर्यादा का ध्यान रखे और उन्हें जाने दे। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा आचरण उसके कुल और यश दोनों के लिए अनुचित होगा, लेकिन उस समय रावण पर अहंकार और कामवासना का ऐसा प्रभाव था कि उसने किसी भी बात पर ध्यान नहीं दिया।
रावण ने नहीं माना धर्म का बंधन
रंभा के बार-बार समझाने के बाद भी रावण ने उनकी बात स्वीकार नहीं की। उसने यह तर्क दिया कि अप्सराएं किसी एक पुरुष की पत्नी नहीं होतीं और उन पर किसी का अधिकार नहीं माना जाता। इसी तर्क का सहारा लेकर उसने धर्म और मर्यादा की उपेक्षा की। रंभा ने भय और लज्जा से बार-बार स्वयं को छुड़ाने का प्रयास किया, लेकिन रावण ने उनकी एक न सुनी। इस प्रकार उसने उनका अपमान किया। रंभा अत्यंत दुखी और अपमानित अवस्था में वहां से चली गईं।
रंभा पहुंचीं नलकुबेर के पास
घटना के बाद रंभा रोती हुई नलकुबेर के पास पहुंचीं। उन्होंने पूरी घटना का वर्णन किया कि किस प्रकार रावण ने उनके विनयपूर्ण निवेदन को अनसुना कर उनका अपमान किया। नलकुबेर ने जब यह बात सुनी तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने इसे केवल अपनी होने वाली पत्नी का अपमान नहीं माना, बल्कि धर्म, कुल और मर्यादा का भी घोर उल्लंघन समझा। उन्होंने तत्काल जल लेकर संकल्प किया और रावण को श्राप देने का निश्चय किया।
नलकुबेर ने दिया रावण को भयंकर श्राप
नलकुबेर ने जल हाथ में लेकर रावण को श्राप दिया कि आज के बाद यदि वह किसी भी ऐसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श करेगा या उसके साथ बलपूर्वक संबंध बनाने का प्रयास करेगा तो उसी क्षण उसके सिर के सात टुकड़े होकर पृथ्वी पर गिर जाएंगे। यह श्राप अत्यंत प्रभावशाली था, क्योंकि नलकुबेर ने इसे धर्म और सत्य के संकल्प के साथ दिया था। देवता, गंधर्व और ऋषिगण भी इस श्राप के साक्षी बने। श्राप मिलते ही रावण को अपने अपराध की गंभीरता का आभास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
श्राप का प्रभाव
नलकुबेर के श्राप के बाद रावण ने किसी भी स्त्री के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध व्यवहार करने का साहस नहीं किया। उसे सदैव इस श्राप का भय बना रहा। उसका अहंकार कम नहीं हुआ, लेकिन इस श्राप के कारण वह अपनी सीमा जानता था। यही कारण था कि बाद में जब उसने माता सीता का हरण किया, तब भी वह उन्हें बलपूर्वक स्पर्श नहीं कर सका।
अशोक वाटिका में माता सीता
जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले आया, तब उसने उन्हें अपने महल में न रखकर अशोक वाटिका में रखा। वह बार-बार उनसे विवाह का प्रस्ताव रखता रहा, लेकिन कभी उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें स्पर्श करने का साहस नहीं कर पाया। वाल्मीकि रामायण में वर्णन मिलता है कि वह सीता को समय-सीमा देकर उन्हें अपनी रानी बनने के लिए कहता था, परंतु उन्हें बलपूर्वक अपने अधीन नहीं कर सका। इसका प्रमुख कारण नलकुबेर का वही श्राप था, जिसका भय उसे हर समय बना रहता था।
रावण के मन में श्राप का भय