Ramayana Mythological Story: रामायण में भगवान श्रीराम द्वारा वानर सेना की सहायता लेना केवल एक युद्धनीति नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक अत्यंत प्राचीन पौराणिक प्रसंग भी जुड़ा हुआ है। अनेक पुराणों और रामकथा की परंपराओं में वर्णन मिलता है कि इस घटना का संबंध देवर्षि नारद के एक श्राप से भी माना जाता है। इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु को श्रीराम के रूप में अवतार लेकर ऐसे समय का सामना करना पड़ा, जब उन्हें अपनी पत्नी सीता की खोज और रावण के विरुद्ध युद्ध में वानरों का सहयोग लेना पड़ा। यह कथा रामायण और पौराणिक मान्यताओं में विशेष महत्व रखती है।
नारद मुनि ने कठोर तपस्या से प्राप्त किया था अद्भुत तेज
पौराणिक कथाओं के अनुसार देवर्षि नारद एक समय हिमालय क्षेत्र में कठोर तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि देवराज इंद्र को भय हुआ कि कहीं नारद अपने तप के बल पर स्वर्ग का पद न प्राप्त कर लें। इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने अपनी समस्त शक्तियों का प्रयोग किया। वसंत ऋतु का वातावरण बनाया गया, अप्सराओं ने नृत्य किया, सुगंधित पवन बहने लगी, किंतु नारद मुनि की तपस्या तनिक भी विचलित नहीं हुई। अंततः कामदेव स्वयं पराजित होकर लौट गए। इस विजय के बाद नारद मुनि के मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि उन्होंने कामदेव पर विजय प्राप्त कर ली है। यही भावना आगे चलकर घटनाओं का कारण बनी।
नारद मुनि का अहंकार
कामदेव पर विजय प्राप्त करने के बाद नारद मुनि पहले भगवान शिव के पास पहुंचे और अपनी सफलता का वर्णन किया। भगवान शिव ने उन्हें सावधान किया कि इस विजय का वर्णन भगवान विष्णु से न करें, क्योंकि इससे अहंकार उत्पन्न हो सकता है। किंतु नारद मुनि ने शिव की बात पर ध्यान नहीं दिया और वैकुण्ठ पहुंचकर भगवान विष्णु को भी अपनी विजय का विस्तार से वर्णन सुनाया। भगवान विष्णु अपने परम भक्त के मन में उत्पन्न हुए सूक्ष्म अहंकार को समझ चुके थे। उन्होंने नारद का कल्याण करने के लिए अपनी योगमाया से एक अद्भुत नगर और उसके राजा का निर्माण किया। उस नगर में राजा की एक अत्यंत रूपवती और गुणवान कन्या थी, जिसका स्वयंवर होने वाला था।
नारद मुनि के मन में विवाह की इच्छा हुई उत्पन्न
जब नारद मुनि उस नगर में पहुंचे तो उन्होंने राजकुमारी को देखा। उसका अनुपम सौंदर्य देखकर उनके मन में पहली बार विवाह की इच्छा जागृत हुई। उन्होंने विचार किया कि यदि उन्हें भगवान विष्णु के समान दिव्य रूप प्राप्त हो जाए तो राजकुमारी निश्चित रूप से उनका वरण कर लेगी। इसी उद्देश्य से नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे प्रार्थना की कि वे उन्हें अपना स्वरूप प्रदान करें। भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे वही करेंगे जिसमें उनके भक्त का कल्याण हो। भगवान विष्णु ने अपनी माया से ऐसा किया कि नारद मुनि को तो लगा कि उन्हें अत्यंत सुंदर रूप प्राप्त हो गया है, किंतु वास्तव में उनका मुख वानर जैसा हो गया। स्वयं नारद मुनि को इसका आभास नहीं था।
स्वयंवर सभा में नारद मुनि का हुआ उपहास
स्वयंवर का समय आया। अनेक राजा और राजकुमार वहां उपस्थित हुए। नारद मुनि भी बड़े आत्मविश्वास के साथ सभा में पहुंचे। उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हीं का वरण करेगी, लेकिन सभा में उपस्थित लोग उन्हें देखकर मुस्कुराने लगे। भगवान शिव के गण भी वहां उपस्थित थे और उन्होंने संकेतों में नारद मुनि के वानर मुख का उपहास किया। नारद मुनि इन बातों को समझ नहीं पाए। इसी बीच भगवान विष्णु स्वयं एक राजकुमार का रूप धारण करके सभा में पहुंचे। राजकुमारी ने उनके गले में वरमाला डाल दी और वे उसे लेकर वहां से चले गए। जब नारद मुनि ने जल में अपना प्रतिबिंब देखा तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका मुख वानर जैसा बना हुआ है। तब उन्हें समझ आया कि यह सब भगवान विष्णु की लीला थी।
नारद मुनि ने भगवान विष्णु को दिया श्राप
अपने साथ हुई इस घटना से नारद मुनि अत्यंत क्रोधित हो गए। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें कठोर शब्द कहे। क्रोधावेश में उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि जिस प्रकार उन्हें स्त्री-वियोग का दुख सहना पड़ा है, उसी प्रकार आपको भी मनुष्य रूप में जन्म लेकर अपनी पत्नी के वियोग का कष्ट सहना पड़ेगा। नारद मुनि ने आगे यह भी कहा कि जिस वानर रूप के कारण उनका उपहास हुआ, उसी वानर जाति की सहायता लेने के लिए भी भगवान विष्णु बाध्य होंगे। यही श्राप आगे चलकर श्रीरामावतार से जुड़ा माना जाता है। श्राप देने के कुछ समय बाद नारद मुनि का क्रोध शांत हुआ। तब उन्हें भगवान विष्णु की माया का बोध हुआ और उन्होंने अपने व्यवहार के लिए क्षमा भी मांगी। भगवान विष्णु ने उन्हें स्नेहपूर्वक समझाया कि यह सब उनके अहंकार का नाश करने और भविष्य की दिव्य लीला का भाग था।
श्रीरामावतार में कैसे पूर्ण हुआ नारद मुनि का श्राप
त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने अयोध्या में श्रीराम के रूप में अवतार लिया। जनकनंदिनी सीता से उनका विवाह हुआ, किंतु वनवास के दौरान रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया। सीता की खोज करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे, जहां उनकी भेंट हनुमान से हुई। हनुमान उन्हें सुग्रीव के पास ले गए। इसके बाद श्रीराम और सुग्रीव के बीच मित्रता स्थापित हुई।
सुग्रीव ने अपनी समस्त वानर सेना को चारों दिशाओं में सीता की खोज के लिए भेजा। हनुमान, जाम्बवान, अंगद, नल, नील तथा अन्य वानर वीरों ने इस कार्य का दायित्व संभाला। अंततः हनुमान समुद्र पार करके अशोक वाटिका पहुंचे और माता सीता का पता लगाया। यहीं से वह क्रम प्रारंभ हुआ जिसने रावण के विरुद्ध युद्ध का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार भगवान श्रीराम को सीता की खोज से लेकर लंका विजय तक प्रत्येक चरण में वानर सेना का सहयोग प्राप्त हुआ।
वानर सेना ने निभाई निर्णायक भूमिका