Shiva Purana: शिवपुराण में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण किया और उस अग्नि स्तंभ का निचला सिरा खोजने के लिए पाताल की ओर चले गए।
Shiva Purana: भगवान शिव की आराधना का सबसे प्रमुख स्वरूप शिवलिंग माना जाता है। देशभर के मंदिरों से लेकर घरों तक करोड़ों श्रद्धालु शिवलिंग का जलाभिषेक और पूजन करते हैं। सावन के महीने में तो शिवलिंग की पूजा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर सबसे पहले शिवलिंग की पूजा किसने की थी? क्या इसकी शुरुआत किसी ऋषि ने की थी, किसी देवता ने या फिर स्वयं भगवान शिव ने इसकी परंपरा स्थापित की थी? आइए जानते हैं शिवपुराण में वर्णित इसके रहस्य के बारे में...
शिवलिंग की उत्पत्ति का रहस्य क्या है?
शिवपुराण के अनुसार एक समय भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच यह विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्मा स्वयं को सृष्टि का रचयिता होने के कारण सबसे महान मान रहे थे, जबकि भगवान विष्णु स्वयं को सृष्टि का पालनकर्ता होने के कारण श्रेष्ठ बता रहे थे। दोनों के बीच यह विवाद बढ़ता गया। तभी अचानक उनके सामने एक दिव्य, अनंत और तेजस्वी अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ। उसका न तो कोई आरंभ दिखाई दे रहा था और न ही अंत। यह अग्नि स्तंभ इतना विशाल और अलौकिक था कि उसकी सीमा का अनुमान लगाना भी असंभव था। यही अग्नि स्तंभ भगवान शिव का अनादि और अनंत स्वरूप था, जिसे आगे चलकर शिवलिंग के रूप में जाना गया।
ब्रह्मा और विष्णु ने कैसे खोजा अग्नि स्तंभ का अंत?
शिवपुराण में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण किया और उस अग्नि स्तंभ का निचला सिरा खोजने के लिए पाताल की ओर चले गए। वहीं भगवान ब्रह्मा हंस का रूप धारण कर उसके ऊपरी भाग की ओर उड़ चले। दोनों ने लंबे समय तक खोज की, लेकिन किसी को भी उस अग्नि स्तंभ का अंत नहीं मिला। अंततः भगवान विष्णु ने स्वीकार कर लिया कि वे उसकी सीमा तक नहीं पहुंच सके। वहीं ब्रह्मा ने एक केतकी पुष्प को साक्षी बनाकर असत्य कहा कि वे अग्नि स्तंभ के शीर्ष तक पहुंच गए हैं। भगवान शिव उनके इस असत्य से अप्रसन्न हुए।
भगवान शिव का प्रकट होना और सत्य की स्थापना
जब ब्रह्मा और विष्णु उस अग्नि स्तंभ का रहस्य नहीं समझ पाए, तब उसी दिव्य ज्योति से भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने दोनों देवताओं को बताया कि वही सृष्टि के आदि और अनंत स्वरूप हैं। उनका न कोई आरंभ है और न ही अंत। भगवान विष्णु ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए शिव के प्रति श्रद्धा प्रकट की, जबकि ब्रह्मा के असत्य बोलने पर भगवान शिव ने उन्हें शाप दिया कि पृथ्वी पर उनकी पूजा बहुत कम स्थानों पर होगी। साथ ही केतकी के फूल को भी शिव पूजा में निषिद्ध कर दिया गया।
सबसे पहले किसने की थी शिवलिंग की पूजा?
शिवपुराण के अनुसार सबसे पहले भगवान विष्णु ने भगवान शिव के अनंत ज्योतिर्लिंग स्वरूप की श्रद्धापूर्वक पूजा की थी। जब भगवान शिव अग्नि स्तंभ से प्रकट हुए, तब भगवान विष्णु ने उन्हें प्रणाम किया, उनकी महिमा स्वीकार की और उनकी उपासना की। इसी घटना को शिवलिंग पूजा की पहली और सबसे प्राचीन आराधना माना जाता है। इसके बाद देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों में शिवलिंग पूजा की परंपरा का विस्तार हुआ। इस दृष्टि से भगवान विष्णु को शिवलिंग की प्रथम पूजा करने वाला माना जाता है।
शिवलिंग को भगवान शिव का प्रतीक क्यों माना जाता है?
शिवपुराण में शिवलिंग को किसी साधारण पत्थर या मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि भगवान शिव के निराकार, अनंत और अखंड स्वरूप का प्रतीक बताया गया है। 'लिंग' शब्द का अर्थ है- वह चिन्ह जिसके माध्यम से किसी अदृश्य सत्ता का बोध हो, इसलिए शिवलिंग भगवान शिव के उस स्वरूप का प्रतीक है, जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है और जिसे किसी एक आकार में सीमित नहीं किया जा सकता। इसी कारण शिवलिंग की पूजा केवल मूर्ति पूजा नहीं, बल्कि भगवान शिव के अनंत और निराकार स्वरूप की आराधना मानी जाती है।
शिवलिंग पूजा की परंपरा कैसे आगे बढ़ी?
भगवान विष्णु द्वारा शिव की आराधना के बाद देवताओं, सप्तऋषियों और अनेक महर्षियों ने भी शिवलिंग की पूजा शुरू की। समय के साथ यह परंपरा पृथ्वी पर पहुंची और विभिन्न युगों में राजाओं, ऋषियों तथा सामान्य लोगों ने शिवलिंग स्थापना और पूजा को अपनाया। शिवपुराण में कई ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जहां ऋषि-मुनि तपस्या के दौरान शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव की उपासना करते हैं। यही परंपरा आगे चलकर ज्योतिर्लिंगों, प्राचीन शिव मंदिरों और घरों में स्थापित शिवलिंग पूजा के रूप में विकसित हुई।
ज्योतिर्लिंग और शिवलिंग में क्या संबंध है?
शिवपुराण के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु के सामने जो अनंत अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ था, वही ज्योतिर्लिंग का मूल स्वरूप माना जाता है। बाद में भगवान शिव ने अपने दिव्य तेज को विभिन्न स्थानों पर प्रकट किया, जिन्हें आज 12 ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है। इन ज्योतिर्लिंगों की पूजा का आधार भी उसी अनंत ज्योति स्वरूप की आराधना है, जिसका उल्लेख शिवपुराण में मिलता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)