Shiva Purana: शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव के तीन नेत्र हैं। दो नेत्र सामान्य रूप से संसार को देखने के लिए हैं, जबकि तीसरा नेत्र उनके ललाट पर स्थित है।
Shiva Purana: भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। उनके स्वरूप का प्रत्येक अंग अपने भीतर एक विशेष पौराणिक रहस्य समेटे हुए है। जटाओं में विराजमान मां गंगा, मस्तक पर अर्धचंद्र, गले में सर्प और शरीर पर भस्म के साथ-साथ उनके माथे पर स्थित तीसरा नेत्र भी सबसे अधिक चर्चा का विषय रहा है। शिव पुराण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में भगवान शिव के तीसरे नेत्र का उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है। यह केवल उनके स्वरूप का एक अंग नहीं, बल्कि अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं का कारण भी बना। सबसे प्रसिद्ध कथा कामदेव के भस्म होने से जुड़ी है, जिसके माध्यम से तीसरे नेत्र के प्रकट होने और उसकी शक्ति का वर्णन मिलता है।
शिव के तीसरे नेत्र का उल्लेख
शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव के तीन नेत्र हैं। दो नेत्र सामान्य रूप से संसार को देखने के लिए हैं, जबकि तीसरा नेत्र उनके ललाट पर स्थित है। इसे दिव्य नेत्र कहा गया है। जब भी देवताओं, ऋषियों या तीनों लोकों पर कोई बड़ा संकट आया और सामान्य उपायों से उसका समाधान संभव नहीं हुआ, तब भगवान शिव के इसी तीसरे नेत्र की शक्ति का वर्णन मिलता है। पौराणिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि भगवान शिव का तीसरा नेत्र सदैव बंद रहता है। विशेष परिस्थितियों में ही यह खुलता है और उसके खुलते ही उससे निकलने वाली अग्नि अत्यंत प्रचंड मानी जाती है।
तारकासुर के अत्याचार से शुरू होती है कथा
तीसरे नेत्र से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा तारकासुर से प्रारंभ होती है। शिव पुराण के अनुसार तारकासुर नाम का एक असुर था जिसने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। वरदान मांगते समय उसने ऐसा वर मांगा कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सके।
ब्रह्मा जी ने वरदान दे दिया, लेकिन उस समय भगवान शिव माता सती के देह त्याग के बाद गहन तपस्या में लीन थे। उन्होंने संसार से लगभग संबंध समाप्त कर लिया था। दूसरी ओर उनका कोई पुत्र भी नहीं था। तारकासुर ने इसी बात का लाभ उठाकर तीनों लोकों में अत्याचार शुरू कर दिए। देवता, ऋषि और मानव सभी उसके अत्याचारों से पीड़ित हो गए।
भगवान शिव का ध्यान भंग करने की योजना
तारकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवता ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के पास पहुंचे, तब विचार किया गया कि यदि भगवान शिव का विवाह माता पार्वती से हो जाए, तो उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने वाले कार्तिकेय ही भविष्य में तारकासुर का वध कर सकेंगे, लेकिन उस समय भगवान शिव कठोर समाधि में लीन थे। उनका ध्यान भंग करना अत्यंत कठिन था। तब देवताओं ने कामदेव को इस कार्य के लिए चुना।
कामदेव पहुंचे कैलाश
पौराणिक कथा के अनुसार जब माता पार्वती भगवान शिव की सेवा और तपस्या में लगी हुई थीं, उसी समय कामदेव अपने पुष्पबाण लेकर कैलाश पहुंचे। उनके साथ उनकी पत्नी रति और वसंत ऋतु भी थी। वातावरण को मनोहर बनाने के लिए वसंत का प्रभाव फैलाया गया। पेड़ों पर पुष्प खिल उठे, सुगंध फैलने लगी और वातावरण अत्यंत आकर्षक हो गया। इसके बाद कामदेव ने अपने पुष्पबाण भगवान शिव की ओर चलाए ताकि उनकी समाधि भंग हो सके।
भगवान शिव का तीसरा नेत्र खुला
जैसे ही कामदेव का बाण भगवान शिव तक पहुंचा, उनकी समाधि भंग हो गई। उन्होंने तुरंत समझ लिया कि किसी ने जानबूझकर उनके तप में बाधा डालने का प्रयास किया है। क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने ललाट पर स्थित तीसरा नेत्र खोल दिया। जैसे ही तीसरा नेत्र खुला, उससे प्रचंड अग्नि प्रकट हुई। उस अग्नि की ज्वाला इतनी तीव्र थी कि कामदेव उसी क्षण भस्म हो गए। शिव पुराण में वर्णन मिलता है कि कामदेव का शरीर अग्नि में जलकर समाप्त हो गया। इसी कारण उन्हें आगे चलकर 'अनंग' कहा जाने लगा, अर्थात ऐसा देवता जिसका कोई स्थूल शरीर नहीं है।
रति का विलाप और शिव का वरदान
कामदेव के भस्म होने के बाद उनकी पत्नी रति अत्यंत दुखी हो गईं। उन्होंने भगवान शिव की स्तुति की और अपने पति को वापस जीवन देने की प्रार्थना की। रति की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ। तब उन्होंने वरदान दिया कि कामदेव शरीर के बिना भी संसार में अपनी शक्ति के साथ विद्यमान रहेंगे। भविष्य में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में उन्हें पुनः जन्म प्राप्त होगा। इस प्रकार कामदेव का पूर्ण अंत नहीं हुआ, बल्कि उन्हें नए स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठा मिली।
तीसरे नेत्र के खुलने के बाद क्या हुआ?
कामदेव के भस्म होने के बाद भी माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने का संकल्प नहीं छोड़ा। उन्होंने और भी कठोर तपस्या की। लंबे समय तक चले तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अंततः उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। आगे चलकर उनके पुत्र भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ। शिव पुराण के अनुसार भगवान कार्तिकेय ने ही युद्ध में तारकासुर का वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इस प्रकार कामदेव के भस्म होने और तीसरे नेत्र के खुलने की घटना आगे चलकर तारकासुर के अंत की भूमिका भी बनी।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)