Shiva Purana: शिवपुराण और प्राचीन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय दारुक वन में अनेक महान ऋषि अपने परिवारों सहित निवास करते थे। वे यज्ञ, तप और वैदिक कर्मकांड में अत्यंत निपुण थे।
Shiva Purana: भगवान शिव का स्वरूप जितना अद्भुत है, उतना ही रहस्यमयी भी माना जाता है। उनके मस्तक पर चंद्रमा, जटाओं में गंगा, गले में नाग, हाथ में त्रिशूल और शरीर पर बाघ की खाल का वस्त्र इन सभी के पीछे पौराणिक कथाएं वर्णित हैं। शिवपुराण और अन्य प्राचीन ग्रंथों में भगवान शिव के बाघ की खाल धारण करने का प्रसंग भी अत्यंत रोचक बताया गया है। यह कथा ऋषियों के अहंकार, भगवान शिव की लीला और उनके वैराग्य से जुड़ी हुई मानी जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर भगवान शिव ने बाघ की खाल को ही अपना वस्त्र क्यों बनाया।
दारुक वन में हुई भगवान शिव की अद्भुत लीला
शिवपुराण और प्राचीन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय दारुक वन में अनेक महान ऋषि अपने परिवारों सहित निवास करते थे। वे यज्ञ, तप और वैदिक कर्मकांड में अत्यंत निपुण थे। समय बीतने के साथ उनमें अपने तप और ज्ञान का अभिमान उत्पन्न हो गया। उन्हें यह विश्वास हो गया कि उनके यज्ञ और कर्म ही संसार में सबसे श्रेष्ठ हैं तथा उनके अतिरिक्त किसी अन्य शक्ति का कोई विशेष महत्व नहीं है। भगवान शिव ने जब यह देखा कि तपस्या के साथ अहंकार भी बढ़ गया है, तब उन्होंने उनके अभिमान को दूर करने का विचार किया। इसी उद्देश्य से उन्होंने एक विशेष लीला रची।
भगवान शिव ने धारण किया दिगंबर योगी का स्वरूप
एक दिन भगवान शिव दिगंबर, युवा और अत्यंत तेजस्वी योगी का रूप धारण करके दारुक वन पहुंचे। उनके शरीर से दिव्य आभा निकल रही थी। उनका अलौकिक स्वरूप देखकर ऋषियों की पत्नियां और वहां उपस्थित स्त्रियां उनके प्रति आकर्षित होकर उनके पीछे-पीछे चलने लगीं। वे भगवान शिव के दिव्य तेज से अभिभूत हो गईं।
जब ऋषियों ने यह दृश्य देखा तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। वे भगवान शिव के वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं सके। उन्होंने उस योगी को साधारण मनुष्य समझकर उसे अपने आश्रम से बाहर निकालने का प्रयास किया। उनका क्रोध बढ़ता गया और उन्होंने अपनी तपस्या तथा यज्ञ की शक्ति का प्रयोग कर उस योगी का नाश करने का निश्चय किया।
यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न किया गया भयंकर बाघ
ऋषियों ने अपने मंत्रबल और यज्ञ की अग्नि से एक अत्यंत विशाल, हिंसक और शक्तिशाली बाघ उत्पन्न किया। उस बाघ का उद्देश्य केवल भगवान शिव पर आक्रमण करना था। वह प्रचंड वेग से भगवान शिव की ओर दौड़ा, लेकिन भगवान शिव पूर्णतः शांत रहे। उन्होंने न तो भय प्रकट किया और न ही क्रोध। जैसे ही बाघ उनके समीप पहुंचा, भगवान शिव ने सहज भाव से उसे पकड़ लिया। कुछ ही क्षणों में उन्होंने उस बाघ का वध कर दिया। यह सब इतनी सरलता से हुआ कि ऋषि और वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।
बाघ की खाल को बनाया अपना वस्त्र
बाघ का वध करने के बाद भगवान शिव ने उसकी खाल उतारी और उसी को अपने शरीर पर वस्त्र के रूप में धारण कर लिया। उन्होंने किसी प्रकार का गर्व या विजय का प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि अत्यंत शांत भाव से बाघ की खाल पहनकर वहीं विराजमान हो गए। यही वह प्रसंग माना जाता है जिसके बाद भगवान शिव का बाघम्बर स्वरूप प्रसिद्ध हुआ। संस्कृत में बाघ की खाल को "व्याघ्रचर्म" कहा गया है, इसलिए भगवान शिव को "व्याघ्रचर्मधारी" भी कहा जाता है। अनेक प्राचीन मंदिरों की मूर्तियों और चित्रों में भगवान शिव को व्याघ्रचर्म धारण किए हुए ही दर्शाया गया है।
ऋषियों ने फिर किया दूसरा प्रयास
पौराणिक कथा के अनुसार, बाघ के नष्ट हो जाने के बाद भी ऋषियों का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने अपनी यज्ञ शक्ति से एक विशाल विषधर सर्प उत्पन्न किया और उसे भगवान शिव पर छोड़ दिया। भगवान शिव ने उस सर्प को भी सहजता से पकड़ लिया और अपने गले में धारण कर लिया। यही कारण माना जाता है कि भगवान शिव के गले में नाग विराजमान दिखाई देते हैं। इसके बाद ऋषियों ने एक भयंकर राक्षस को उत्पन्न किया। भगवान शिव ने उसका भी अंत कर दिया और अपनी दिव्य शक्ति का परिचय दिया।
ऋषियों का टूटा अहंकार
जब ऋषियों ने देखा कि उनकी समस्त यज्ञ शक्तियां भगवान शिव के सामने निष्फल हो रही हैं, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें ज्ञात हुआ कि जिस योगी को वे साधारण मनुष्य समझ रहे थे, वे स्वयं महादेव हैं। सभी ऋषि भगवान शिव के चरणों में गिर पड़े और उनसे क्षमा याचना करने लगे। भगवान शिव ने उन्हें क्षमा प्रदान की और अपना वास्तविक दिव्य स्वरूप प्रकट किया। इसके बाद ऋषियों ने भगवान शिव की स्तुति की और उनकी आराधना की।
शिवपुराण में व्याघ्रचर्मधारी शिव का स्वरूप
शिवपुराण में भगवान शिव का वर्णन अनेक दिव्य रूपों में मिलता है। उनमें व्याघ्रचर्म धारण किए हुए शिव का स्वरूप विशेष रूप से प्रसिद्ध है। शिव की प्रतिमाओं, शिवलिंग के समीप स्थापित मूर्तियों और कैलाशपति महादेव के चित्रों में उन्हें बाघ की खाल पर विराजमान अथवा उसे वस्त्र के रूप में धारण किए हुए दर्शाया जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)