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Ramayana Story: वन जाते समय श्रीराम ने किस नदी के तट पर गुजारी थी रात? कैसे प्रजा को छोड़कर बढ़ गए थे आगे

जीवांजलि, धर्मPublished by:
साक्षी साह
सार

Lord Rama: जब श्रीराम ने देखा कि प्रजाजन रथ के पीछे दौड़ते ही आ रहे हैं तो उन्होंने रथ को रुकवाया और उन्हें संबोधित करते हुए बोले- प्रिय अयोध्यावासियों, ज्ञात है कि आप लोगों का मेरे प्रति अटूट और निश्चल प्रेम है, इसीलिए आप लोग मुझे बार-बार अयोध्या लौट चलने का आग्रह कर रहे हो। 

Ramayana Mythological Story:
Ramayana Mythological Story: जब श्रीराम अपनी पत्नी सीता और अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वनवास के लिए जाने को तैयार हुए, तो महाराज दशरथ के हृदय में गहरा वेदना था। उन्होंने अपने विश्वसनीय मंत्री सुमंत से आदेश दिया कि वे रथ तैयार करें और श्रीरामचंद्र को अयोध्या की सीमा तक छोड़कर आएं। यह वह क्षण था जब रघुकुल के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने राजसी वैभव को त्यागकर वनवास की कठोर यात्रा स्वीकार की। अयोध्या नगरी उस समय शोक और प्रेम की लहरों से व्याकुल हो उठी थी। प्रजा अपने प्रिय राम को खोने के दर्द में डूबी हुई थी और कोई भी उन्हें वन की ओर जाते देखना नहीं चाहता था। वनवास के लिए प्रस्थान करने के बाद उन्होंने सबसे पहली रात कहां विश्राम किया था? क्या आप जानते हैं कि अयोध्या छोड़ते ही श्रीराम ने किस नदी के तट पर रात्रि व्यतीत की और वहां प्रजा का अटूट प्रेम कैसे उनके पीछे-पीछे दौड़ा चला आया? आइए इस प्रसंग से जुड़ी कथा को जानते हैं...

श्रीराम का वन प्रस्थान

महाराज दशरथ ने आज्ञा दी थी और सुमंत श्रीराम को वन ले जाने के लिए रथ ले आए। राम, सीता और लक्ष्मण ने वहाँ पर उपस्थित परिजनों तथा जनसमुदाय का यथोचित अभिवादन किया और रथ पर बैठकर चलने को उद्यत हुए। सुमंत के द्वारा रथ हाँकना आरंभ करते ही अयोध्या के लाखों नागरिकों ने 'हा राम! हा राम!!' कहते हुए उस रथ के पीछे दौड़ना शुरू कर दिया। रथ की गति जैसे-जैसे बढ़ती गई, प्रजा के पैर थकने लगे, किंतु उनका प्रेम उन्हें रोक नहीं पाता था। जब रथ की गति तेज हो गई और निवासी रथ के साथ-साथ दौड़ पाने में असमर्थ हो गए तो वे उच्च स्वर में कहने लगे, "रथ रोको, हम राम के दर्शन करना चाहते हैं। भगवान जाने अब हमें फिर कब इनके दर्शन हो पाएँगे।" रथ तीव्र गति से आगे बढ़ गया किंतु प्रजाजन रोते बिलखते उसके पीछे ही दौड़ते रहे। पुरुष, स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध सब नंगे पाँव, धूल धूसरित होकर रथ के पीछे चल रहे थे। उनका हृदय राम के वियोग में कराह रहा था, और आँखों से अश्रुओं की धारा बह रही थी।

 

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प्रजा से श्रीराम ने किया ये आग्रह

जब श्रीराम ने देखा कि प्रजाजन रथ के पीछे दौड़ते ही आ रहे हैं तो उन्होंने रथ को रुकवाया और उन्हें संबोधित करते हुए बोले, "प्रिय अयोध्यावासियों, ज्ञात है कि आप लोगों का मेरे प्रति अटूट और निश्चल प्रेम है और इसीलिए आप लोग मुझे बार-बार अयोध्या लौट चलने का आग्रह कर रहे हो। यद्यपि आपके इस प्रेम को टालना मेरे लिए अत्यंत कठिन है, किंतु मैं आप लोगों से आग्रह करता हूँ कि आप लोग मेरी विवशता को समझने का प्रयास करें। क्या आप लोग चाहेंगे कि मैं पिता की आज्ञा भंग करके पाप का भागी बनूँ? मैं जानता हूँ कि आप लोग मुझसे वास्तविक स्नेह रखते हैं और ऐसा कदापि नहीं चाहेंगे। अतः आप लोगों के लिए यही उचित है कि मुझे प्रेमपूर्वक वन जाने के लिए विदा करें और भरत को राजा स्वीकार करके उनके निर्देशों का पालन करें।" श्रीरामचंद्र ने भरत की प्रशंसा करते हुए कहा कि भरत मेरे ही समान गुणवान हैं और वे अयोध्या का कुशल संचालन करेंगे। इस प्रकार उन्होंने प्रजा को धर्म, कर्तव्य और राज्यहित की याद दिलाई।

श्रीराम के लिए प्रजा का विलाप

कई अनेकों प्रकार से नगरवासियों को समझा-बुझा कर राम ने सुमंत से पुनः रथ को आगे बढ़ाने का अनुरोध किया। श्रीराम की वाणी में मधुरता और धैर्य था, जो प्रजा के हृदय को छू रहा था। कुछ क्षणों के लिए राम के कथन का प्रभाव प्रजाजनों पर पड़ा किंतु रथ के चलते ही वे फिर से रोते-बिलखते रथ के पीछे चलने लगे। वे राम-लक्ष्मण के प्रेम की डोर में इतना अधिक बँधे थे कि चाहकर भी राम के द्वारा दिए गए उपदेशों और निर्देशों को क्रियान्वित नहीं कर पा रहे थे और विवश होकर बरबस रथ के पीछे चले जा रहे थे। उनकी बुद्धि उन्हें रोक रही थी, किंतु हृदय उन्हें बलात् रथ के साथ घसीटे लिए जा रहा था।

उनकी भावनाओं के आगे उनका विवेक कुछ भी काम नहीं कर पा रहा था। प्रजा का यह प्रेम देखकर श्रीराम का हृदय भी द्रवित हो उठा, किंतु वे पितृवचन के पालन में अटल थे। अपनी बातों का उन पर कुछ भी प्रभाव न पड़ते देख कर राम ने सुमंत से रथ को और तेज चलाने की आज्ञा दी और रथ की गति तेज हो गई। किंतु भावाभिभूत प्रजाजनों की भीड़ फिर भी रथ के पीछे दौड़ी ही जा रही थी। दूर तक यह दृश्य चलता रहा– एक ओर रथ पर बैठे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, सीता और लक्ष्मण, दूसरी ओर उनके पीछे रोती-बिलखती प्रजा।

 
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तमसा नदी के तट पर विश्राम

तमसा नदी के तट पर पहुँचते-पहुँचते रथ के अश्व भी क्लांत हो चुके थे, तथा उन्हें विश्राम की आवश्यकता थी। मंत्री सुमंत ने रथ वहीं रोक दिया। राम, सीता और लक्ष्मण तीनों रथ से उतर आए। वे तमसा के तट पर खड़े होकर उसकी लहरों का आनंद लेने लगे। तमसा नदी की शांत धारा, उसके किनारे के वृक्ष और सायंकाल का मनोरम दृश्य सब कुछ दिव्य लग रहा था। किंतु यह शांति अधिक देर न टिकी। इतने में ही रोते बिलखते वे सहस्रों अयोध्यावासी भी वहाँ आ पहुँचे जो रथ की गति के साथ न चल पाने के कारण पीछे रह गए थे।

उन्होंने चारों ओर से राम, लक्ष्मण तथा सीता को घेर लिया और अनेकों प्रकार के भावुकतापूर्ण तर्क देकर उनसे वापस अयोध्या चलने का अनुरोध करने लगे। कोई कहता, "प्रभु, बिना आपके अयोध्या सूनी हो जाएगी।" कोई विलाप करता, "हम आपके बिना जीवित कैसे रहेंगे?" प्रजा की यह व्याकुलता देखकर श्रीरामचंद्र का हृदय करुणा से भर गया। रामचंद्र ने उन्हें अनेकों प्रकार से धैर्य बँधाया। उन्होंने कहा कि यह पितृ आज्ञा का पालन है और भरत के राज्य में सब सुखी रहेंगे। उनके कुछ शांत होने पर रामचंद्र ने प्रजाजनों से प्रेमपूर्वक आग्रह किया कि वे वापस लौट जाएँ। श्रीराम तथा प्रजाजनों के मध्य संवाद अबाध गति से चलता रहा और रात्रि हो गई।

प्रजा को छोड़ चुपचाप निकले श्रीराम

भूख-प्यास तथा लंबी यात्रा की थकान से आक्रांत अयोध्यावासी वहीं वन के वृक्षों के कंद-मूल-फल खाकर भूमि पर सो गए। तमसा नदी के तट पर हजारों लोग पेड़ों की छाँव में विश्राम कर रहे थे, और उनकी सिसकियाँ रात्रि के सन्नाटे में गूँज रही थीं। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण भी वहाँ विश्राम कर रहे थे। यह वनवास की पहली रात थी, जो तमसा के तट पर व्यतीत हो रही थी। जब ब्राह्म-मुहूर्त में रामचंद्र की निद्रा टूटी तो वे उन निद्रामग्न नगरवासियों की ओर देखकर लक्ष्मण से बोले, "भैया, मुझसे इन प्रजाजनों का यह त्यागपूर्ण कष्ट देखा नहीं जा रहा है, इसलिए अब यही उचित है कि हम लोग चुपचाप यहाँ से निकल पड़ें। अतः हे लक्ष्मण, तुम शीघ्र जाकर तत्काल रथ तैयार करवा लो। किंतु ध्यान रखना कि किसी प्रकार की आहट न हो वरना ये जाग कर फिर हमारे पीछे-पीछे आने लगेंगे।" श्रीराम का हृदय प्रजा के प्रेम से अभिभूत था, किंतु वे नहीं चाहते थे कि प्रजा उनके कारण और अधिक कष्ट उठाए।

प्रजा का विलाप

राम के आदेशानुसार लक्ष्मण ने सुमंत से आग्रह करके रथ को थोड़ी दूर पर एक निर्जन स्थान में खड़ा करवा दिया। पुरवासियों को आभास तक नहीं मिला कि कब वे रथ में सवार होकर तपोवन की ओर निकल गए। ब्राह्म मुहूर्त की शांति में रथ चुपचाप आगे बढ़ गया और तमसा के तट पर सोई प्रजा अज्ञानतावश विश्राम करती रही। पुरवासियों की निद्रा भंग होने पर वे सब उन्हें ढूँढने लगे और रथ की लीक के पीछे-पीछे बहुत दूर तक गए। आगे जाकर मार्ग कंकरीला-पथरीला हो गया था इसलिए रथ के लीक के चिह्न दिखाई देना बंद हो गया। अनेकों प्रयत्न करने पर भी जब वे रथ के मार्ग का अनुसरण न कर सके तो निराश होकर वे विलाप करते हुए लौट पड़े। "हा राम! हा राम!" की पुकारें फिर से गूँज उठीं, किंतु अब श्रीराम दूर निकल चुके थे।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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