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Bhagavad Gita: क्या है गोलोक धाम, जहां स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं नित्य विहार? जानें इसकी दिव्य कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Bhagavad Gita: श्रीमद्भागवत और वैष्णव ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अवतार लिया, तब उन्होंने गोलोक की अनेक लीलाओं को वृंदावन में प्रकट किया। 

Bhagavad Gita
Bhagavad Gita: सनातन धर्म के ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण के धाम का वर्णन अत्यंत दिव्य और अलौकिक रूप में मिलता है। वैष्णव परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु के अनेक लोक हैं, जिनमें वैकुंठ धाम और उससे भी सर्वोच्च गोलोक धाम का विशेष महत्व बताया गया है। गोलोक को भगवान श्रीकृष्ण का निज धाम माना गया है, जहां वे अपने शाश्वत स्वरूप में विराजमान रहते हैं और राधारानी, गोप-गोपियों, नंद-यशोदा, गोवंश तथा अपने पार्षदों के साथ नित्य लीलाएं करते हैं। भगवद्गीता, ब्रह्मसंहिता, पद्म पुराण, स्कंद पुराण, गर्ग संहिता और श्रीमद्भागवत महापुराण की वैष्णव व्याख्याओं में गोलोक की महिमा का वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं कि गोलोक धाम क्या है, इसकी उत्पत्ति कैसे मानी जाती है और वहां भगवान श्रीकृष्ण की नित्य लीलाओं का स्वरूप कैसा बताया गया है।

क्या है गोलोक धाम?

वैष्णव संप्रदाय के अनुसार गोलोक धाम भगवान श्रीकृष्ण का परम और शाश्वत निवास है। इसे समस्त आध्यात्मिक लोकों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जहां वैकुंठ धाम में भगवान विष्णु अपने चतुर्भुज स्वरूप में विराजते हैं, वहीं गोलोक में श्रीकृष्ण अपने द्विभुज, मुरलीधर और गोपाल स्वरूप में निवास करते हैं। 'गोलोक' शब्द दो भागों से मिलकर बना है- 'गो' अर्थात गौ, इंद्रियां, पृथ्वी तथा वेद, और 'लोक' अर्थात दिव्य धाम। इसलिए गोलोक को वह परम लोक कहा गया है, जहां भगवान श्रीकृष्ण गोपाल रूप में अपनी शाश्वत लीलाएं करते हैं। ब्रह्मसंहिता में गोलोक को ऐसा दिव्य लोक बताया गया है, जहां प्रत्येक वृक्ष कल्पवृक्ष है, प्रत्येक भूमि चिंतामणि स्वरूप है, प्रत्येक जलधारा अमृत के समान है और वहां का प्रत्येक क्षण आनंदमय है।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम धाम के बारे में क्या कहा?

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उनका परम धाम ऐसा है, जहां पहुंचने के बाद जीव फिर संसार में लौटकर जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता।

श्लोक है-

"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥"


अर्थात उस परम धाम को न सूर्य प्रकाशित करता है, न चंद्रमा और न अग्नि। जो वहां पहुंच जाता है, वह फिर संसार में वापस नहीं आता। वैष्णव आचार्यों ने इस परम धाम को गोलोक धाम के रूप में भी स्वीकार किया है, जहां श्रीकृष्ण अपनी नित्य लीलाओं में विराजमान रहते हैं।

ब्रह्मसंहिता में गोलोक का अद्भुत वर्णन

ब्रह्मसंहिता के पांचवें अध्याय में भगवान ब्रह्मा स्वयं गोलोक धाम का वर्णन करते हैं। वहां कहा गया है कि गोलोक में असंख्य कल्पवृक्ष हैं, जहां इच्छानुसार सब कुछ प्राप्त होता है। वहां की भूमि चिंतामणि से निर्मित है और वहां की प्रत्येक वस्तु दिव्य चेतना से परिपूर्ण है। वर्णन के अनुसार वहां श्रीकृष्ण अपनी वंशी बजाते हुए गोपियों और गोपबालकों के साथ विहार करते हैं। अनगिनत सुरभि गायें वहां विचरण करती हैं, जिनका दूध अमृत के समान माना गया है। वहां न समय का प्रभाव है, न वृद्धावस्था, न रोग और न मृत्यु।

गोलोक धाम की उत्पत्ति कैसे मानी जाती है?

वैष्णव पुराणों के अनुसार गोलोक किसी देवता द्वारा निर्मित स्थान नहीं है। यह भगवान श्रीकृष्ण का अनादि और शाश्वत धाम है। जब सृष्टि की रचना भी नहीं हुई थी, तब भी गोलोक विद्यमान था और प्रलय के बाद भी इसका अस्तित्व बना रहता है। कई वैष्णव ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से समस्त आध्यात्मिक लोकों की व्यवस्था प्रकट हुई। वैकुंठ, शिवलोक और अन्य दिव्य लोक भी भगवान की शक्ति से प्रकट हुए, किंतु गोलोक को उनका निज धाम कहा गया है, जो सदा से विद्यमान है।

गोलोक धाम में श्रीराधा का स्थान

गोलोक धाम का वर्णन श्रीराधा के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। वैष्णव ग्रंथों में श्रीराधा को भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति कहा गया है। गोलोक में वे श्रीकृष्ण के साथ सदैव विराजमान रहती हैं। गर्ग संहिता तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन है कि राधारानी गोलोक की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। वहां की प्रत्येक लीला, प्रत्येक कुंज और प्रत्येक उत्सव में उनका विशेष स्थान है। श्रीकृष्ण और राधा की दिव्य युगल स्वरूप में ही गोलोक की नित्य लीलाओं का विस्तार होता है।

गोलोक में कैसी होती हैं भगवान श्रीकृष्ण की नित्य लीलाएं?

वैष्णव आचार्यों के अनुसार गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। वहां प्रत्येक दिन दिव्य आनंद से परिपूर्ण माना गया है। गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण प्रातःकाल अपने सखा-सखियों तथा गोपबालकों के साथ गौचारण के लिए निकलते हैं। वहां यमुना के समान दिव्य सरिताएं, कुंज, वन, पुष्पों से भरे उपवन और सुरभि गायों के विशाल समूह हैं। श्रीकृष्ण अपनी मुरली की मधुर ध्वनि से समस्त धाम को आनंदमय बना देते हैं। रासलीला भी गोलोक की नित्य लीलाओं में प्रमुख मानी जाती है। वैष्णव परंपरा के अनुसार यह सांसारिक नहीं, बल्कि पूर्णतः दिव्य और आध्यात्मिक लीला है, जिसका वर्णन अनेक पुराणों और भक्ति ग्रंथों में मिलता है।

क्या गोलोक और वृंदावन का संबंध है?

वैष्णव मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर स्थित वृंदावन को गोलोक का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। श्रीमद्भागवत और वैष्णव ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अवतार लिया, तब उन्होंने गोलोक की अनेक लीलाओं को वृंदावन में प्रकट किया। इसी कारण वृंदावन की यमुना, गोवर्धन पर्वत, निधिवन, सेवाकुंज और अन्य लीलास्थलों को अत्यंत पवित्र माना जाता है। भक्तों की मान्यता है कि वृंदावन में आज भी श्रीकृष्ण की दिव्य उपस्थिति विद्यमान है और यह भूमि गोलोक की झलक प्रदान करती है।

गोलोक धाम का स्वरूप कैसा बताया गया है?

पुराणों और वैष्णव साहित्य में गोलोक का अत्यंत मनोहारी चित्रण मिलता है। वहां न अंधकार है और न किसी प्रकार का भय। वहां का प्रत्येक भवन रत्नों से निर्मित है। वृक्ष सदैव फल-फूलों से लदे रहते हैं। पक्षियों का मधुर कलरव और श्रीकृष्ण की वंशी की ध्वनि पूरे धाम को आनंदमय बनाए रखती है। गोलोक में समय का प्रभाव नहीं होता। वहां न दिन का बंधन है, न रात का। वहां सब कुछ भगवान की इच्छा और उनकी नित्य लीलाओं के अनुरूप चलता है।

गोलोक में कौन-कौन निवास करता है?

वैष्णव परंपरा के अनुसार गोलोक धाम में श्रीकृष्ण के समस्त नित्य पार्षद निवास करते हैं। इनमें श्रीराधा, ललिता सखी, विशाखा सखी, अष्टसखियां, नंद बाबा, माता यशोदा, श्रीबलराम, गोप-गोपियां, गोपबालक तथा सुरभि गायों का विशेष स्थान बताया गया है। इन सभी का स्वरूप दिव्य और शाश्वत माना गया है। वे भगवान श्रीकृष्ण की सेवा और लीलाओं में निरंतर सहभागी रहते हैं।

वैकुंठ और गोलोक में क्या अंतर बताया गया है?

वैष्णव दर्शन के अनुसार वैकुंठ धाम भगवान विष्णु का दिव्य लोक है, जहां भगवान चतुर्भुज स्वरूप में लक्ष्मीजी के साथ विराजमान रहते हैं। वहां भगवान की ऐश्वर्यमयी उपासना होती है। इसके विपरीत गोलोक धाम में भगवान श्रीकृष्ण अपने गोपाल स्वरूप में रहते हैं। यहां ऐश्वर्य की अपेक्षा माधुर्य और प्रेम का भाव प्रधान माना गया है। नंद बाबा उन्हें पुत्र मानते हैं, यशोदा उन्हें स्नेह से पालती हैं, गोपबालक उनके मित्र हैं और गोपियां उन्हें अपना सर्वस्व मानती हैं। यही कारण है कि वैष्णव परंपरा गोलोक को प्रेममयी भक्ति का सर्वोच्च धाम मानती है।

श्रीमद्भागवत में गोलोक से जुड़ी मान्यताएं

श्रीमद्भागवत महापुराण में 'गोलोक' शब्द का सीमित प्रयोग मिलता है, किंतु दशम स्कंध में वर्णित वृंदावन की लीलाओं को वैष्णव आचार्यों ने गोलोक की नित्य लीलाओं का प्राकट्य माना है। श्रीकृष्ण का गोचारण, कालिय मर्दन, गोवर्धन धारण, रासलीला और गोपियों के साथ दिव्य विहार- इन सभी को गोलोक की शाश्वत लीलाओं का पृथ्वी पर अवतरण बताया गया है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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