Ramayana Mythological Story: भगवान राम जब अवतरित हुए तो बाल्यकाल से ही उन्होंने दिव्य लीलाएं शुरू कर दी थीं। दिव्य अस्त्रों की शिक्षा और ऋषियों के यज्ञ की रक्षा करवाने हेतु महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को बाल्यावस्था में ही अयोध्या से वन लेकर आए थे। इसके बाद वे उन्हें मिथिला लेकर गए, जहां श्रीराम ने शिव धनुष पिनाक की प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे भंग कर दिया और सीता स्वयंवर जीता तथा मां सीता से विवाह किया, लेकिन इस दौरान उनकी भेंट भगवान परशुराम से हुई, जो शिव धनुष टूटने पर क्रोधित थे और महेंद्र पर्वत से उसका वध करने के उद्देश्य से आए थे, जिसने यह शिव धनुष तोड़ा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब उन्हें श्रीराम के भगवान विष्णु के अवतार होने का ज्ञान हुआ तो उन्होंने श्रीराम के बाण से अपनी गमन शक्ति को क्यों नष्ट नहीं होने दिया... आइए पौराणिक कथा से जानते हैं इसका रहस्य...
बालकांड में छिपा है इसका रहस्य
हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित रामायण की यह कथा बालकांड में विस्तार से मिलती है। वाल्मीकि रामायण के बालकांड के सर्ग 73 से 76 तक इस घटना का सुंदर वर्णन है, जबकि तुलसीदास जी की रामचरितमानस में भी यह प्रसंग बड़े ही रोचक ढंग से वर्णित है। यह घटना श्रीराम के जीवन की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो उनके दिव्य स्वरूप को प्रमाणित करती है और साथ ही परशुराम जैसे महातपस्वी के सामने भी उनकी सर्वोच्चता को स्थापित करती है।
बाल्यकाल से दिव्य लीलाएं और मिथिला यात्रा
भगवान विष्णु ने रावण वध के लिए श्रीराम के रूप में अवतार लिया। उनका जन्म अयोध्या नरेश दशरथ के यहां हुआ। बाल्यावस्था में ही उनकी दिव्यता प्रकट होने लगी। जब महर्षि विश्वामित्र यज्ञ की रक्षा के लिए क्षत्रिय बल की आवश्यकता बताते हुए अयोध्या पहुंचे तो राजा दशरथ ने श्रीराम और लक्ष्मण को उनके साथ भेज दिया। बाल्यावस्था में ही राम-लक्ष्मण ने ताड़का वध किया, सुबाहु और मारीच जैसे राक्षसों को परास्त कर विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा की। इसके बाद विश्वामित्र उन्हें मिथिला ले गए, जहां राजा जनक ने सीता स्वयंवर रखा था।
स्वयंवर की शर्त थी कि जो भी शिवजी का धनुष पिनाक उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा देगा, वही सीता से विवाह करेगा। सैकड़ों राजा आए, लेकिन कोई धनुष उठा भी न सका। अंत में श्रीराम ने सहज ही धनुष उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाई और इतने जोर से खींचा कि धनुष बीच से टूट गया। टूटने की ध्वनि तीनों लोकों में गूंज उठी। राजा जनक प्रसन्न हुए और श्रीराम-सीता का विवाह निश्चित हो गया। राम के साथ भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के भी विवाह जनक की अन्य पुत्रियों से हुए। विवाह संपन्न होने के बाद दशरथ का पूरा कुनबा वधुओं सहित अयोध्या लौटने को तैयार हुआ।
क्रोधित परशुराम का आगमन
इसी समय शिव धनुष टूटने की गूंज महेंद्र पर्वत पर तपस्या कर रहे भृगुवंशी परशुराम तक पहुंची। परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार थे, जो क्षत्रियों के अत्याचार से पृथ्वी को मुक्त करने के लिए अवतरित हुए थे। उन्होंने 21 बार क्षत्रियों का संहार किया था। वे शिवजी के परम भक्त थे और धनुष को शिव का प्रतीक मानते थे। क्रोधित होकर वे फरसा लेकर मिथिला पहुंचे। उनकी आंखें लाल थीं, जटाएं उग्र थीं और पूरा वातावरण भयभीत हो गया।
सभा में प्रवेश करते ही परशुराम ने गरजकर कहा, "यह शिव धनुष किसने तोड़ा? वह सामने आए, मैं उसका वध करूंगा!" सभी भयभीत हो गए। राजा जनक ने विनम्रता से कहा कि धनुष टूटने से स्वयंवर सफल हुआ है। परशुराम ने कहा कि शिव धनुष कोई साधारण व्यक्ति नहीं तोड़ सकता, वह मेरे कुल का शत्रु है।
लक्ष्मण के साथ तीखा संवाद
परशुराम के क्रोध को देखकर लक्ष्मण मुस्कुराए और व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोले, "हे मुनि! बचपन में हम कई धनुष तोड़ चुके हैं, आपको हर बार क्रोध करने की क्या जरूरत? यह धनुष तो पुराना हो चुका था, टूट गया तो क्या हुआ?" लक्ष्मण के इन तीखे वचनों से परशुराम और क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा, "हे बालक! तू बड़ा निडर है। ब्राह्मण का अपमान करने वाला क्षत्रिय सहस्त्रबाहु की तरह मेरा शत्रु है।"
लक्ष्मण ने फिर कहा, "आपका फरसा तो बहुत पुराना लग रहा है, जैसे ऊख का पोर (गन्ने का रेशा)। क्या यह भी किसी धनुष की तरह टूट जाएगा?" परशुराम नख-शिख तक क्रोध से भर गए और लक्ष्मण को पापी कहकर डांटने लगे। विश्वामित्र ने बीच-बचाव किया, तब श्रीराम ने आगे बढ़कर विनम्रता से कहा, "हे भृगुनंदन! मेरा छोटा भाई है, इसे क्षमा करें। धनुष तो आपके दास ने ही तोड़ा होगा, क्योंकि दास ही सेवा करता है।"
परशुराम ने कहा, "सेवक वह है, जो सेवा का काम करे। शत्रु का काम करके तो लड़ाई ही करनी चाहिए। हे राम! सुनो, जिसने शिवजी के धनुष को तोड़ा है, वह सहस्त्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।" श्रीराम के विनम्र वचनों से परशुराम कुछ शांत हुए, लेकिन लक्ष्मण फिर मुस्कुरा दिए, जिससे परशुराम का क्रोध फिर भड़क उठा।
श्रीराम के विष्णु अवतार होने का ज्ञान
परशुराम को श्रीराम के वचनों से लगा कि ये साधारण क्षत्रिय नहीं, बल्कि विष्णु के अवतार हैं, लेकिन मन में थोड़ी शंका थी। उन्होंने अपना वैष्णव धनुष यानी विष्णु का धनुष निकाला और श्रीराम को देते हुए कहा, "हे राम! हे लक्ष्मीपति! धनुष को हाथ में लीजिए और इसे खींचिए, जिससे मेरा संदेह मिट जाए।"
परशुराम ने धनुष देते ही वह स्वयं श्रीराम के हाथ चला गया। परशुराम को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने श्रीराम का प्रभाव जाना। श्रीराम ने धनुष पर बाण चढ़ाकर कहा, "हे भृगुनंदन! ब्राह्मण होने के कारण आप मेरे पूज्य हैं, इसलिए इस बाण को मैं आप पर नहीं छोड़ सकता, लेकिन धनुष पर चढ़ने के बाद यह बाण कभी निष्फल नहीं जाता। इसका कहीं न कहीं उपयोग करना अनिवार्य है, इसलिए मैं इस बाण को छोड़कर आपकी शीघ्रतापूर्वक सर्वत्र आने-जाने की शक्ति को नष्ट कर देता हूं।"
परशुराम की विनती