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Vishnu Purana: आखिर बालक ध्रुव कैसे बने ध्रुव तारा? जानिए भगवान विष्णु की दिव्य लीला से जुड़ी पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Vishnu Purana: पौराणिक कथाओं के अनुसार, ध्रुव स्वायंभुव मनु के वंशज और राजा उत्तानपाद के पुत्र थे। राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं- सुनीति और सुरुचि। सुनीति अत्यंत धर्मपरायण, विनम्र और सद्गुणों से युक्त थीं।

Vishnu Purana
Vishnu Purana: विष्णु पुराण, भागवत महापुराण और अन्य वैष्णव ग्रंथों में बालक ध्रुव की कथा अत्यंत प्रसिद्ध मानी जाती है। यह केवल एक राजकुमार की तपस्या की कहानी नहीं, बल्कि भगवान विष्णु की उस दिव्य लीला का वर्णन है, जिसमें मात्र पांच वर्ष का बालक अपनी अटूट भक्ति और कठोर तप के बल पर ऐसा स्थान प्राप्त करता है, जो आज भी आकाश में ध्रुव तारे के रूप में स्थिर माना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भगवान विष्णु ने स्वयं ध्रुव को ऐसा अमर पद प्रदान किया, जिसे न देवता प्राप्त कर सके और न ही महान ऋषि। यही कारण है कि ध्रुव तारे को स्थिरता, अटलता और भगवान विष्णु की कृपा का प्रतीक माना जाता है। आइए जानते हैं कि आखिर बालक ध्रुव कैसे ध्रुव तारा बने और भगवान विष्णु की इस दिव्य लीला के पीछे की पूरी पौराणिक कथा क्या है।

ध्रुव कौन थे?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, ध्रुव स्वायंभुव मनु के वंशज और राजा उत्तानपाद के पुत्र थे। राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं- सुनीति और सुरुचि। सुनीति अत्यंत धर्मपरायण, विनम्र और सद्गुणों से युक्त थीं, जबकि सुरुचि राजा की प्रिय रानी थीं। ध्रुव, महारानी सुनीति के पुत्र थे और उनके छोटे भाई उत्तम, महारानी सुरुचि के पुत्र थे। राजा का अधिक स्नेह सुरुचि और उनके पुत्र उत्तम पर था, जबकि ध्रुव और उनकी माता को अपेक्षाकृत उपेक्षा का सामना करना पड़ता था। यहीं से प्रारंभ होती है वह घटना जिसने बालक ध्रुव के जीवन की दिशा ही बदल दी।

जब सुरुचि के कठोर वचनों ने बदल दी ध्रुव की नियति

एक दिन राजा उत्तानपाद राजसिंहासन पर बैठे हुए थे। उनके प्रिय पुत्र उत्तम उनकी गोद में खेल रहे थे। उसी समय पांच वर्षीय ध्रुव भी अपने पिता की गोद में बैठने की इच्छा लेकर वहां पहुंचे। ध्रुव जैसे ही गोद में बैठने लगे, तभी महारानी सुरुचि ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने अत्यंत कठोर शब्दों में कहा कि राजा की गोद में बैठने का अधिकार केवल उनके पुत्र उत्तम को है। यदि ध्रुव को भी यह स्थान चाहिए तो उन्हें पहले भगवान विष्णु की आराधना करके अगले जन्म में उनके गर्भ से जन्म लेना होगा। सुरुचि के इन कटु वचनों को सुनकर ध्रुव का हृदय टूट गया। इससे भी अधिक पीड़ा उन्हें इस बात की हुई कि उनके पिता मौन बैठे रहे और उन्होंने पुत्र का पक्ष नहीं लिया। अपमानित होकर ध्रुव रोते हुए अपनी माता सुनीति के पास पहुंचे और पूरी घटना सुनाई।

माता सुनीति ने क्या कहा?

ध्रुव की व्यथा सुनकर माता सुनीति भी दुखी हुईं, लेकिन उन्होंने किसी के प्रति क्रोध व्यक्त नहीं किया। उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि संसार में यदि कोई ऐसा है जो हर दुख दूर कर सकता है और न्याय दे सकता है, तो वे भगवान विष्णु हैं। उन्होंने ध्रुव से कहा कि यदि तुम सच्चे मन से भगवान विष्णु की आराधना करोगे तो वे अवश्य प्रसन्न होंगे और तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करेंगे। माता के इन शब्दों ने बालक ध्रुव के मन में भगवान विष्णु के प्रति अटूट विश्वास उत्पन्न कर दिया। उसी क्षण उन्होंने वन जाकर तपस्या करने का निश्चय कर लिया।

वन की ओर निकल पड़े पांच वर्ष के ध्रुव

मात्र पांच वर्ष की आयु में ध्रुव राजमहल छोड़कर अकेले ही वन की ओर चल पड़े। उनका उद्देश्य केवल भगवान विष्णु के दर्शन करना था। देवताओं और ऋषियों ने जब यह देखा कि इतना छोटा बालक कठिन वनमार्ग पर अकेला जा रहा है, तब सभी आश्चर्यचकित हो उठे। इसी दौरान देवर्षि नारद की दृष्टि ध्रुव पर पड़ी। उन्होंने बालक को रोककर समझाने का प्रयास किया कि इतनी कम आयु में कठोर तप करना अत्यंत कठिन है। उन्होंने ध्रुव से कहा कि वे कुछ समय बाद यह साधना करें, लेकिन ध्रुव का संकल्प अटल था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक भगवान विष्णु के दर्शन नहीं होंगे, तब तक वे लौटकर नहीं जाएंगे।

देवर्षि नारद ने दिया भगवान विष्णु का मंत्र

जब नारद मुनि ने देखा कि ध्रुव अपने निश्चय से हटने वाले नहीं हैं, तब उन्होंने उन्हें भगवान विष्णु की उपासना की विधि बताई। उन्होंने ध्रुव को मधुवन में जाकर तप करने का निर्देश दिया और भगवान विष्णु का प्रसिद्ध द्वादशाक्षरी मंत्र- "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करने की शिक्षा दी। साथ ही उन्होंने भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप का ध्यान करने की विधि भी बताई ताकि ध्रुव का मन एकाग्र रह सके।

ध्रुव की कठोर तपस्या

नारद मुनि के निर्देशानुसार ध्रुव यमुना तट स्थित मधुवन पहुंचे और भगवान विष्णु की आराधना प्रारंभ कर दी। विष्णु पुराण और भागवत महापुराण में उनकी तपस्या का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। प्रारंभ में ध्रुव तीन दिन में एक बार वन के फल ग्रहण करते थे। इसके बाद उन्होंने छह दिन में केवल सूखी घास और पत्तों का सेवन किया।

कुछ समय पश्चात वे केवल जल ग्रहण करने लगे।

फिर उन्होंने जल का भी त्याग कर दिया और केवल वायु के सहारे तप करने लगे। अंततः उन्होंने एक पैर पर खड़े होकर पूर्ण एकाग्रता से भगवान विष्णु का ध्यान करना प्रारंभ कर दिया। उनकी तपस्या इतनी प्रबल हो गई कि तीनों लोकों में उसका प्रभाव दिखाई देने लगा। देवताओं को अनुभव होने लगा कि सम्पूर्ण सृष्टि जैसे स्थिर होती जा रही है। पृथ्वी तक उनके तप के प्रभाव से कांपने लगी।

देवताओं की प्रार्थना

ध्रुव की अद्भुत तपस्या देखकर देवगण चिंतित हो उठे। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे प्रार्थना की कि वे ध्रुव को दर्शन देकर उनकी तपस्या पूर्ण करें। भगवान विष्णु ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार की और अपने वाहन गरुड़ पर आरूढ़ होकर मधुवन पहुंचे।

भगवान विष्णु ने दिए साक्षात दर्शन

जब भगवान विष्णु ध्रुव के सामने प्रकट हुए, तब ध्रुव ध्यान में लीन थे। भगवान ने अपने शंख से उनके कपोल का स्पर्श किया। भगवान के स्पर्श से ध्रुव ने नेत्र खोले और अपने सामने चार भुजाओं वाले दिव्य स्वरूप में श्रीहरि को खड़ा देखा। भगवान के तेज, पीताम्बर, कौस्तुभ मणि, श्रीवत्स चिह्न और दिव्य आभा का दर्शन करके ध्रुव भावविभोर हो गए। वे भगवान की स्तुति करना चाहते थे, लेकिन बालक होने के कारण उनके मुख से शब्द नहीं निकल पा रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपनी कृपा से उन्हें दिव्य वाणी प्रदान की। इसके बाद ध्रुव ने अत्यंत सुंदर स्तुति के माध्यम से भगवान की आराधना की, जिसे ध्रुव स्तुति के नाम से जाना जाता है।

भगवान विष्णु ने ध्रुव को दिया अमर पद

भगवान विष्णु ध्रुव की तपस्या और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने ध्रुव से वर मांगने के लिए कहा। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान के दर्शन के बाद ध्रुव के मन से राजसिंहासन और अपमान का भाव समाप्त हो चुका था। फिर भी भगवान विष्णु ने उनकी मन की भावना को जान लिया। उन्होंने ध्रुव से कहा कि पहले वे अपने पिता के राज्य में लौटें। उचित समय आने पर उन्हें राज्य प्राप्त होगा और वे दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक शासन करेंगे। इसके बाद भगवान विष्णु ने ध्रुव को ऐसा दिव्य पद प्रदान करने की घोषणा की, जो किसी अन्य को प्राप्त नहीं हुआ था।

कैसे बने ध्रुव तारा?

भगवान विष्णु ने ध्रुव से कहा कि उनके सांसारिक जीवन की पूर्ण अवधि समाप्त होने के बाद उन्हें आकाश में एक ऐसा सर्वोच्च और स्थिर स्थान प्राप्त होगा, जो कभी नष्ट नहीं होगा। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने ध्रुव को समस्त नक्षत्रों, ग्रहों और तारों से भी ऊंचा स्थान प्रदान किया। यही स्थान आगे चलकर ध्रुवलोक कहलाया। कहा जाता है कि सभी ग्रह, नक्षत्र और सप्तर्षि मंडल ध्रुव के चारों ओर अपनी गति करते हैं, लेकिन ध्रुव स्वयं अटल और स्थिर रहते हैं। इसी कारण उन्हें ध्रुव तारा कहा गया। विष्णु पुराण में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु की कृपा से ध्रुव को ऐसा अमर लोक प्राप्त हुआ, जो कल्पांत तक अक्षुण्ण रहता है।

ध्रुव के राज्याभिषेक का वर्णन

भगवान विष्णु के आदेशानुसार ध्रुव वापस अपने पिता के राज्य में लौटे। उनके लौटने पर राजा उत्तानपाद अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्हें अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ और उन्होंने ध्रुव को स्नेहपूर्वक अपने पास रखा। समय आने पर राजा ने ध्रुव को राज्य सौंप दिया। ध्रुव ने दीर्घकाल तक धर्म और न्याय के अनुसार शासन किया। उनके शासनकाल का वर्णन पौराणिक ग्रंथों में अत्यंत समृद्ध और शांतिपूर्ण बताया गया है। जब उनकी पृथ्वी पर निर्धारित आयु पूर्ण हुई, तब भगवान विष्णु के दिव्य पार्षद उन्हें दिव्य विमान में लेकर ध्रुवलोक की ओर गए। वहीं उन्हें वह अमर पद प्राप्त हुआ, जो आज भी ध्रुव तारे के रूप में प्रसिद्ध माना जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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