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Shiv Purana: क्यों हुआ भगवान शिव और अर्जुन के बीच युद्ध? जानिए पाशुपतास्त्र से जुड़ी पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Shiv Purana: जब पांडव द्यूत क्रीड़ा में अपना राज्य हार गए, तब उन्हें बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा। वनवास के दौरान महर्षि व्यास ने पांडवों को बताया कि भविष्य में कौरवों के साथ होने वाला युद्ध अत्यंत भीषण होगा।

Shiv Purana
Shiv Purana: महाभारत और शिवपुराण में भगवान शिव तथा अर्जुन से जुड़ी एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा का वर्णन मिलता है। यह प्रसंग केवल एक युद्ध की कथा नहीं, बल्कि उस दिव्य परीक्षा का वर्णन है जिसमें भगवान शिव स्वयं अर्जुन के पराक्रम, धैर्य और तपस्या की परीक्षा लेने के लिए शिकारी किरात का रूप धारण करते हैं। इसी युद्ध के बाद अर्जुन को भगवान शिव का अत्यंत दुर्लभ और अजेय पाशुपतास्त्र प्राप्त होता है। महाभारत के वनपर्व में वर्णित यह प्रसंग आने वाले कुरुक्षेत्र युद्ध की तैयारी का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। आइए जानते हैं कि आखिर भगवान शिव और अर्जुन के बीच युद्ध क्यों हुआ और पाशुपतास्त्र प्राप्त करने की पूरी पौराणिक कथा क्या है।

वनवास के दौरान अर्जुन को दिव्य अस्त्रों की आवश्यकता क्यों पड़ी?

जब पांडव द्यूत क्रीड़ा में अपना राज्य हार गए, तब उन्हें बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा। वनवास के दौरान महर्षि व्यास ने पांडवों को बताया कि भविष्य में कौरवों के साथ होने वाला युद्ध अत्यंत भीषण होगा। भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण और अश्वत्थामा जैसे महायोद्धाओं का सामना केवल सामान्य अस्त्रों से संभव नहीं होगा। महर्षि व्यास की सलाह पर अर्जुन को दिव्य अस्त्र प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करने का निर्देश दिया गया। भगवान श्रीकृष्ण और इंद्र भी जानते थे कि आने वाले समय में अर्जुन को ऐसे दिव्य अस्त्रों की आवश्यकता पड़ेगी, जिनका सामना कोई साधारण योद्धा न कर सके। इसी उद्देश्य से अर्जुन हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं, जहां वे भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या आरंभ करते हैं।

इंद्रकील पर्वत पर अर्जुन की कठोर तपस्या

अर्जुन इंद्रकील पर्वत पहुंचकर भगवान शिव का ध्यान करने लगे। उन्होंने भोजन और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। पहले वे फल खाते रहे, फिर केवल पत्तों पर जीवित रहे और अंत में केवल वायु के सहारे तपस्या करने लगे। कहा जाता है कि अर्जुन कई महीनों तक एक पैर पर खड़े होकर भगवान शिव का स्मरण करते रहे। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि देवता भी आश्चर्यचकित हो उठे। चारों ओर अर्जुन की तपस्या का तेज फैलने लगा। देवताओं ने भगवान शिव से निवेदन किया कि अर्जुन की तपस्या स्वीकार करें और उन्हें दर्शन दें। भगवान शिव ने अर्जुन की भक्ति देखकर प्रसन्नता तो प्रकट की, लेकिन पहले उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया।

भगवान शिव ने क्यों धारण किया किरात का रूप?

भगवान शिव यह देखना चाहते थे कि अर्जुन केवल तपस्वी ही नहीं, बल्कि युद्धभूमि में भी धैर्य, साहस और धर्म का पालन करने वाला योद्धा है या नहीं। इसी कारण भगवान शिव ने एक वनवासी शिकारी अर्थात किरात का रूप धारण किया। माता पार्वती भी किरात स्त्री का रूप लेकर उनके साथ चलीं। उनके साथ अनेक गण भी शिकारी के वेश में उपस्थित हुए। उसी समय भगवान शिव ने अपनी माया से एक अत्यंत भयंकर जंगली वराह (सूअर) को अर्जुन की ओर भेजा। कुछ ग्रंथों में इस वराह को असुर मुकासुर का रूप बताया गया है, जो अर्जुन की तपस्या भंग करने के उद्देश्य से आया था।

वराह के वध को लेकर हुआ विवाद

जब विशाल वराह अर्जुन की ओर बढ़ा तो अर्जुन ने तत्काल अपना धनुष उठाकर उस पर बाण चला दिया। उसी क्षण किरात रूप में उपस्थित भगवान शिव ने भी अपने धनुष से उसी वराह पर बाण छोड़ दिया। दोनों बाण एक साथ जाकर वराह को लगे और वह वहीं गिर पड़ा। इसके बाद विवाद उत्पन्न हुआ। अर्जुन ने कहा कि वराह का वध उसके बाण से हुआ है। दूसरी ओर किरात रूपधारी भगवान शिव ने दावा किया कि शिकार उनका है क्योंकि उनका बाण पहले लगा था। धीरे-धीरे यह विवाद तीखी बहस में बदल गया।

अर्जुन और किरात के बीच आरंभ हुआ भीषण युद्ध

जब किसी प्रकार विवाद समाप्त नहीं हुआ, तब अर्जुन ने उस शिकारी को युद्ध की चुनौती दे दी। किरात रूपधारी भगवान शिव ने चुनौती स्वीकार कर ली। अर्जुन ने अपने गांडीव से एक के बाद एक तीव्र गति से असंख्य बाण छोड़े। उनके बाण पर्वतों को भी चीर देने की क्षमता रखते थे, लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि किरात पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। भगवान शिव सहज भाव से अर्जुन के प्रत्येक बाण को निष्फल करते रहे। अर्जुन ने अग्निबाण, वायुबाण और अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, किंतु किरात रूपधारी भगवान शिव के सामने वे सभी व्यर्थ सिद्ध हुए।

जब अर्जुन के सभी अस्त्र निष्फल हो गए

युद्ध लगातार चलता रहा। अर्जुन ने अपने तरकश के लगभग सभी बाण चला दिए, लेकिन सामने खड़ा शिकारी तनिक भी विचलित नहीं हुआ। इसके बाद अर्जुन ने तलवार से आक्रमण किया। किरात ने उसे भी निष्फल कर दिया। अर्जुन ने गदा का प्रयोग किया, वह भी सफल नहीं हुआ। अंत में दोनों के बीच मल्लयुद्ध आरंभ हो गया। अर्जुन ने पूरे बल से युद्ध किया, लेकिन किरात रूपधारी भगवान शिव की शक्ति के सामने वे टिक नहीं सके। कुछ समय बाद भगवान शिव ने अर्जुन को परास्त कर भूमि पर गिरा दिया।

पराजय के बाद भी नहीं डगमगाई अर्जुन की भक्ति

युद्ध में पराजित होने के बाद भी अर्जुन ने हार नहीं मानी। उन्होंने समीप की मिट्टी से भगवान शिव का एक शिवलिंग बनाया। वन से पुष्प एकत्र कर उन्होंने शिवलिंग की पूजा प्रारंभ की और भगवान शिव से प्रार्थना करने लगे। कथा के अनुसार, अर्जुन ने जो पुष्प शिवलिंग पर अर्पित किए, वे अचानक वहां से अदृश्य होकर सामने खड़े किरात के मस्तक पर दिखाई देने लगे। यह अद्भुत दृश्य देखकर अर्जुन तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण शिकारी नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव हैं।

भगवान शिव ने प्रकट किया अपना दिव्य स्वरूप

अर्जुन ने तत्काल किरात के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। उसी क्षण भगवान शिव ने अपना वास्तविक दिव्य स्वरूप प्रकट किया। उनके साथ माता पार्वती भी अपने दिव्य रूप में प्रकट हुईं। समस्त देवगण भी वहां उपस्थित हो गए। भगवान शिव ने अर्जुन से कहा कि उन्होंने यह युद्ध केवल उसकी परीक्षा लेने के लिए किया था। वे अर्जुन की तपस्या, साहस, धैर्य और युद्धकौशल से अत्यंत प्रसन्न हैं। भगवान शिव ने कहा कि युद्ध के दौरान अर्जुन ने कभी कायरता नहीं दिखाई और अंत तक पूरी निष्ठा से संघर्ष किया।

भगवान शिव ने अर्जुन को प्रदान किया पाशुपतास्त्र

अर्जुन की परीक्षा पूरी होने के बाद भगवान शिव ने उन्हें अपना परम दिव्य अस्त्र पाशुपतास्त्र प्रदान किया। पाशुपतास्त्र को भगवान शिव का सर्वाधिक शक्तिशाली अस्त्र माना जाता है। पौराणिक वर्णनों के अनुसार यह अस्त्र संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखता था। इसका प्रयोग अत्यंत विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता था। भगवान शिव ने अर्जुन को इस अस्त्र के प्रयोग, संचालन और वापस बुलाने की संपूर्ण विधि भी सिखाई। साथ ही यह निर्देश दिया कि इसका उपयोग केवल अत्यंत आवश्यक स्थिति में ही किया जाए।

पाशुपतास्त्र की विशेषता क्या मानी जाती है?

पौराणिक ग्रंथों में पाशुपतास्त्र को देवताओं के सबसे प्रबल अस्त्रों में गिना गया है। यह अस्त्र मंत्र, मन, दृष्टि अथवा धनुष के माध्यम से भी संचालित किया जा सकता था। कहा जाता है कि यदि इसका प्रयोग अनुचित स्थान या सामान्य युद्ध में किया जाए तो इसका विनाशकारी प्रभाव अत्यंत व्यापक हो सकता था। इसी कारण भगवान शिव ने इसके प्रयोग पर कठोर मर्यादा निर्धारित की थी। पाशुपतास्त्र को प्राप्त करना किसी भी योद्धा के लिए अत्यंत दुर्लभ माना गया है और अर्जुन उन विरले वीरों में गिने जाते हैं जिन्हें स्वयं भगवान शिव ने यह दिव्य अस्त्र प्रदान किया।

अर्जुन को अन्य देवताओं से भी मिले दिव्य अस्त्र

भगवान शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के बाद अर्जुन को अन्य देवताओं का भी आशीर्वाद प्राप्त हुआ। इसके बाद इंद्र ने अर्जुन को स्वर्ग बुलाया, जहां उन्हें अनेक दिव्य अस्त्र और शस्त्र प्राप्त हुए। वरुण, यम, कुबेर तथा अन्य देवताओं ने भी अर्जुन को अपने-अपने दिव्य अस्त्र प्रदान किए। इन्हीं दिव्य अस्त्रों के कारण अर्जुन आगे चलकर महाभारत के महानतम धनुर्धरों में गिने गए और कुरुक्षेत्र युद्ध में उन्होंने अनेक महारथियों का सामना किया।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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