Vishvamitra Story: विश्वामित्र के साथ चलते-चलते श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी घने वन के अंधकार से बाहर निकले। सामने भगवान भास्कर का दिव्य प्रकाश चारों ओर फैला हुआ था।
Ramayana Mythological Story: जब त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु ने धरती पर मनुष्य रूप में श्रीराम के रूप में अवतार लिया, तब बाल्यकाल से ही उन्होंने अपनी दिव्य लीलाएं प्रारम्भ कर दी थीं। दैत्य-संहार, दिव्यास्त्रों की शिक्षा तथा ऋषियों के यज्ञों की रक्षा करने के लिए महर्षि विश्वामित्र स्वयं अयोध्या पधारे और बाल्यावस्था में ही श्रीराम तथा लक्ष्मण को अपने साथ वन ले आए। मार्ग में अनेक राक्षसों का संहार करते हुए वे उस पवित्र भूमि की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ विश्वामित्र को अपना महायज्ञ पूर्ण करना था। वह आश्रम था “सिद्धाश्रम” के नाम से विख्यात था। सिद्धाश्रम की ओर जाते समय ही महर्षि विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को इस आश्रम के नामकरण की अद्भुत एवं दिव्य कथा सुनाई थी। आइए, जानते हैं उस पौराणिक कथा के बारे में...
आश्रम देख मंत्रमुग्ध हुए श्रीराम
विश्वामित्र के साथ चलते-चलते श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी घने वन के अंधकार से बाहर निकले। सामने भगवान भास्कर का दिव्य प्रकाश चारों ओर फैला हुआ था। नाना प्रकार के सुंदर वृक्ष, मनोरम उपत्यकाएं और मन को मुग्ध कर देने वाले दृश्य दिखाई दे रहे थे। श्रीरामचन्द्रजी ने विश्वामित्र जी से विनम्र भाव से पूछा- “हे मुनिराज! सामने पर्वत की सुंदर उपत्यकाओं में हरे-हरे वृक्षों की जो लुभावनी पंक्तियाँ दृष्टिगोचर हो रही हैं, उनके पीछे ऐसा प्रतीत होता है, मानो कोई आश्रम हो। क्या वास्तव में ऐसा कोई आश्रम है अथवा यह मेरी केवल कल्पना मात्र है? वहाँ मधुरभाषी एवं रंग-बिरंगे पक्षियों के झुंड के झुंड उड़ते दिखाई दे रहे हैं, जिससे लगता है कि मेरी कल्पना निराधार नहीं है।”
महर्षि विश्वामित्र मुस्कुराए और बोले- हे वत्स राम! यह तुम्हारी कल्पना नहीं, वरन् सत्य है। यह वास्तव में एक आश्रम है और इसका नाम सिद्धाश्रम है।” यह सुनते ही लक्ष्मणजी के मन में जिज्ञासा जागी और वे बोले, “हे गुरुदेव! इस आश्रम का नाम सिद्धाश्रम क्यों पड़ा?” महर्षि विश्वामित्र ने गंभीर स्वर में कहा, “हे लक्ष्मण! इस संबंध में एक अत्यंत पवित्र एवं दिव्य कथा प्रचलित है। अब मैं तुम्हें इसकी कथा सुनाता हूं। अब तुम दोनों कथा सुनो।
विश्वामित्र ने सुनाई कथा
प्राचीन काल में बलि नाम का एक महापराक्रमी दैत्यराज था। उसने अपनी अपराजेय शक्ति से समस्त देवताओं को पराजित कर दिया था और तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था। एक बार उसी महाबली ने इसी स्थान पर एक विशाल एवं अतुलनीय यज्ञ का अनुष्ठान आरंभ किया। उस यज्ञ के पूर्ण होने पर उसकी शक्ति और भी अनंत गुना बढ़ जाने वाली थी। यह देखकर देवराज इन्द्र अत्यंत भयभीत हो उठे।
वे समस्त देवताओं को साथ लेकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और स्तुति करने के पश्चात् करबद्ध प्रार्थना की- “हे त्रिलोकीनाथ! हे लक्ष्मीपते! राजा बलि ने हम सभी देवताओं को परास्त कर दिया है। अब वह एक विराट यज्ञ कर रहा है। वह महादानी और उदार हृदय वाला राक्षस है। उसके द्वार से कोई भी याचक कभी खाली हाथ नहीं लौटा। उसकी तपस्या, तेज, दान और यज्ञ जैसे शुभ कर्मों से देवलोक सहित संपूर्ण ब्रह्मांड काँप उठा है। यदि उसका यह यज्ञ सफलतापूर्वक पूर्ण हो गया तो वह इन्द्रासन पर अधिकार कर लेगा। इन्द्रासन पर किसी असुर का अधिकार होना हमारी सुर-परंपरा के सर्वथा विरुद्ध है। अतः हे भगवन! आप कोई ऐसा उपाय कीजिए जिससे उसका यज्ञ पूर्ण न हो सके।”
विष्णु जी के वामन अवतार से जुड़ी कथा
देवताओं की यह करुण प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने अत्यंत शांत स्वर में कहा- हे देवगण! आप सब निश्चिंत होकर अपने-अपने धाम को लौट जाएँ। आपका मनोरथ शीघ्र ही सिद्ध करूँगा।” देवताओं के चले जाने पर भगवान विष्णु ने वामन यानी बौने ब्राह्मण का अति तेजस्वी रूप धारण किया और उस स्थान पर पहुँचे जहाँ महाबली राजा बलि यज्ञ कर रहा था। उस बौने किंतु परम ओजस्वी ब्राह्मण को देखते ही राजा बलि अत्यंत प्रसन्न हुए और बड़े आदर से बोले- “हे विप्रवर! आपका इस यज्ञ-स्थल पर पदार्पण से मेरा यज्ञ धन्य हो गया। स्वागत है। आज्ञा कीजिए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”
वामन रूपधारी भगवान विष्णु ने अत्यंत मधुर स्वर में कहा, “राजन्! मुझे भगवान के भजन एवं तप के लिए केवल ढाई चरण भूमि चाहिए।” बलि ने हँसते हुए कहा, “हे ब्राह्मण! आप इतने महान तेजस्वी हैं और केवल ढाई चरण भूमि माँग रहे हैं? आप जितनी चाहें उतनी भूमि ले लें।” परंतु वामन भगवान ने दृढ़ता से कहा, “मुझे इससे अधिक कुछ नहीं चाहिए।” अंततः राजा बलि ने प्रसन्नता पूर्वक वामन को ढाई चरण भूमि नाप कर देने की आज्ञा दे दी।
आज्ञा मिलते ही भगवान विष्णु ने अपना विराट रूप प्रकट किया। पहले चरण में उन्होंने समस्त आकाश को और दूसरे चरण में पृथ्वी सहित संपूर्ण पाताल लोक को नाप लिया। फिर बलि से पूछा- “राजन्! तुम्हारा समस्त राज्य मेरे दो चरणों में ही समा गया। अब मेरे शेष आधे चरण के लिए कहाँ स्थान है?” महादानी बलि के द्वार से कभी कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटा था। उसने इस याचक को भी निराश नहीं करना चाहा। उसने नतमस्तक होकर कहा- “हे ब्राह्मण देव! अभी मेरा यह शरीर शेष है। आप अपना तृतीय चरण मेरे मस्तक पर रख दीजिए।”
भगवान विष्णु ने दिया राजा बलि को वरदान
भगवान विष्णु ने बलि के मस्तक पर अपना चरण रखकर उसे भी नाप लिया। बलि का यह दान इतना महान और अनुपम था कि आज भी “बलिदान” शब्द उसकी दानवीरता का पर्याय बन गया। भगवान विष्णु बलि की इस अद्वितीय दानशीलता से अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे वरदान दिया- “हे बलि! तुम्हारी इस दान-वीरता से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ। यह स्थान जहाँ तुमने यज्ञ किया था, सदा के लिए पवित्र रहेगा। यह सिद्धाश्रम कहलाएगा और यहाँ जो भी ऋषि-मुनि तपस्या करेंगे, उन्हें शीघ्र ही समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होंगी,” तब से यह स्थान “सिद्धाश्रम” के नाम से विख्यात हुआ। अनेक महर्षि यहाँ तप करके सिद्ध हुए और मुक्ति को प्राप्त हुए।
सिद्धाश्रम में श्रीराम और लक्ष्मण का आगमन
महर्षि विश्वामित्र ने आगे कहा- हे राम! मेरा आश्रम भी इसी सिद्धाश्रम में है। मैं यहीं बैठकर अपना यज्ञ पूर्ण करना चाहता हूँ। किंतु जब-जब मैंने यज्ञ प्रारंभ किया, तब-तब मारीच, सूबाहु आदि राक्षसों ने उसमें विघ्न डाला और उसे पूर्ण नहीं होने दिया। अब तुम दोनों मेरे साथ हो, इसलिए मैं निश्चिंत हूँ कि इस बार मेरा यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण होगा।” ऐसी दिव्य कथा सुनाते-सुनाते महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को साथ लेकर सिद्धाश्रम में प्रवेश किया। वहाँ निवास करने वाले समस्त महर्षि, मुनि और उनके शिष्यों ने तीनों का बड़े आदर और प्रेम से स्वागत-सत्कार किया।
श्रीराम ने दिया विश्वामित्र को वचन
श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यंत विनीत स्वर में विश्वामित्र जी से कहा- “हे मुनिराज! आप आज ही यज्ञ का शुभारंभ कीजिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपके यज्ञ की रक्षा करते हुए मैं इस पवित्र सिद्धाश्रम को राक्षसों से पूर्णतः मुक्त कर दूँगा।” श्रीराम के इन दृढ़ वचनों को सुनकर महर्षि विश्वामित्र के नेत्रों में आनंद के आँसू आ गए। वे तत्काल यज्ञ-सामग्री एकत्र करने में लग गए। इस प्रकार सिद्धाश्रम का वह पवित्र रहस्य श्रीराम और लक्ष्मण को विश्वामित्र जी के मुख से सुनने को मिला और उसी रात्रि से यज्ञ-रक्षा का महान संकल्प भी प्रारंभ हुआ, जो आगे चलकर ताड़का-वध, सुबाहु-मारीच संहार और अंततः अहिल्या उद्धार जैसे अनेक दिव्य कार्यों का कारण बना।
(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)