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Devguru Brihaspati: आखिर अंगिरा ऋषि के पुत्र को कैसे मिला देवगुरु बृहस्पति का पद? जानें रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Devguru Brihaspati: महर्षि अंगिरा ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक माने जाते हैं। उनका उल्लेख ऋग्वेद, महाभारत, भागवत पुराण, विष्णु पुराण तथा अनेक अन्य ग्रंथों में मिलता है। वे सप्तर्षियों में भी प्रतिष्ठित हैं और वेदों के महान ज्ञाता माने जाते हैं।

Devguru Brihaspati
Devguru Brihaspati Mythological Story: सनातन धर्म में देवगुरु बृहस्पति को देवताओं के आचार्य, धर्म के ज्ञाता, वेद-वेदांगों के परम विद्वान और देवताओं के मार्गदर्शक के रूप में जाना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में भी बृहस्पति ग्रह को ज्ञान, धर्म, विद्या, संतान, गुरु और शुभता का कारक माना गया है, लेकिन प्रश्न यह उठता है कि महर्षि अंगिरा के पुत्र बृहस्पति को आखिर देवताओं का गुरु बनने का गौरव कैसे प्राप्त हुआ? क्या केवल महर्षि अंगिरा का पुत्र होने के कारण उन्हें यह पद मिला था, या इसके पीछे कोई विशेष पौराणिक कारण भी था?

पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार देवगुरु बृहस्पति का पद किसी वंश परंपरा का परिणाम नहीं था, बल्कि यह उनके अद्वितीय ज्ञान, तप, वेदों की गहन समझ, धर्मनिष्ठा और देवताओं के हित में दिए गए अमूल्य मार्गदर्शन का फल था। आइए विस्तार से जानते हैं वह पौराणिक कथा, जिसके कारण महर्षि अंगिरा के पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु कहलाए।

कौन थे महर्षि अंगिरा?

महर्षि अंगिरा ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक माने जाते हैं। उनका उल्लेख ऋग्वेद, महाभारत, भागवत पुराण, विष्णु पुराण तथा अनेक अन्य ग्रंथों में मिलता है। वे सप्तर्षियों में भी प्रतिष्ठित हैं और वेदों के महान ज्ञाता माने जाते हैं। महर्षि अंगिरा ने तप, यज्ञ, वेद और ब्रह्मविद्या के क्षेत्र में अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त किया था। उनके आश्रम में अनेक ऋषि, मुनि और शिष्य शिक्षा ग्रहण करते थे। उसी दिव्य परंपरा में उनके पुत्र के रूप में बृहस्पति का जन्म हुआ।

बृहस्पति का जन्म और प्रारंभिक शिक्षा

पुराणों के अनुसार महर्षि अंगिरा और उनकी पत्नी श्रद्धा के पुत्र बृहस्पति बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी थे। कहा जाता है कि बाल्यावस्था से ही उनमें असाधारण स्मरण शक्ति, वेदों को समझने की क्षमता और धर्म के प्रति गहरी आस्था थी। महर्षि अंगिरा ने स्वयं अपने पुत्र को वेद, वेदांग, ब्रह्मविद्या, यज्ञ-विधि, ज्योतिष, नीति, धर्मशास्त्र तथा राजधर्म की शिक्षा दी। बृहस्पति ने अल्प समय में ही समस्त विद्याओं में ऐसी दक्षता प्राप्त कर ली कि बड़े-बड़े ऋषि भी उनके ज्ञान का सम्मान करने लगे। कई पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि बृहस्पति ने केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं प्राप्त किया, बल्कि कठोर तपस्या और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना में भी उच्च स्थान प्राप्त किया।

कैसे बढ़ी उनकी विद्वत्ता की ख्याति?

समय बीतने के साथ बृहस्पति की विद्वत्ता चारों दिशाओं में प्रसिद्ध होने लगी। जब भी ऋषियों के बीच धर्म, यज्ञ, वेदों की व्याख्या या किसी जटिल विषय पर चर्चा होती, तब बृहस्पति के विचारों को अत्यंत सम्मान दिया जाता। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल शास्त्रों का ज्ञान नहीं रखते थे, बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में धर्म के अनुरूप निर्णय देने की क्षमता भी रखते थे। वे कठिन से कठिन प्रश्नों का समाधान वेदों और धर्मशास्त्रों के आधार पर करते थे। इसी कारण धीरे-धीरे उनकी ख्याति देवलोक तक पहुंची।

देवताओं को क्यों पड़ी एक गुरु की आवश्यकता?

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय ऐसा आया जब देवताओं और दैत्यों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ने लगा। देवताओं के सामने केवल युद्ध का संकट नहीं था, बल्कि यज्ञों की विधि, धर्मपालन, राजधर्म, नीति और आध्यात्मिक मार्गदर्शन जैसे विषयों में भी उन्हें एक ऐसे आचार्य की आवश्यकता महसूस हुई जो हर परिस्थिति में उनका उचित मार्गदर्शन कर सके। देवताओं के राजा इंद्र सहित सभी देवताओं ने विचार किया कि ऐसा गुरु होना चाहिए जो वेदों का पूर्ण ज्ञाता हो, निष्पक्ष हो, तपस्वी हो और धर्म से कभी विचलित न होता हो।

ब्रह्मा ने क्यों बृहस्पति को चुना?

विष्णु पुराण, भागवत पुराण तथा अन्य पौराणिक परंपराओं के अनुसार जब देवताओं ने इस विषय में ब्रह्मा से मार्गदर्शन मांगा, तब ब्रह्मा ने महर्षि अंगिरा के पुत्र बृहस्पति का नाम सुझाया। ब्रह्मा ने बताया कि बृहस्पति वेदों के परम विद्वान हैं। उन्होंने दीर्घकाल तक तप किया है, धर्म के सूक्ष्म सिद्धांतों का ज्ञान रखते हैं और निष्पक्ष होकर निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। उनमें किसी प्रकार का अहंकार नहीं है तथा उनका संपूर्ण जीवन धर्म की स्थापना के लिए समर्पित है। ब्रह्मा की आज्ञा के बाद देवताओं ने बृहस्पति का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया। तभी से वे 'देवगुरु बृहस्पति' कहलाए।

देवगुरु बनने के बाद क्या थी उनकी भूमिका?

देवगुरु बनने के बाद बृहस्पति का कार्य केवल धार्मिक अनुष्ठान कराना नहीं था। वे देवताओं के आध्यात्मिक गुरु, सलाहकार और धर्माचार्य बन गए। वे इंद्र सहित सभी देवताओं को यज्ञ-विधि बताते थे, कठिन परिस्थितियों में नीति का मार्ग सुझाते थे, धर्म और अधर्म का अंतर समझाते थे तथा आवश्यक होने पर देवताओं को संयम और धैर्य का उपदेश भी देते थे। जब भी देवताओं के सामने कोई बड़ा संकट आता, तब इंद्र सहित सभी देवता सबसे पहले बृहस्पति की शरण में जाते थे।

इंद्र के साथ जुड़ी प्रसिद्ध कथा

देवगुरु बृहस्पति से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा इंद्र के अहंकार से संबंधित है। कथा के अनुसार एक बार इंद्र अपने वैभव और शक्ति के कारण अत्यंत अभिमानी हो गए। उसी समय देवगुरु बृहस्पति उनकी सभा में पहुंचे, लेकिन इंद्र ने अहंकारवश उनका उचित सम्मान नहीं किया। देवगुरु ने इसे अपमान नहीं, बल्कि इंद्र के भीतर बढ़ते अहंकार का संकेत माना। वे बिना कुछ कहे सभा से लौट गए। गुरु के चले जाने के बाद देवताओं का तेज क्षीण होने लगा। इसी अवसर का लाभ उठाकर असुरों ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया। देवता पराजित होने लगे, तब इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने देवगुरु बृहस्पति की खोज की, लेकिन वे तत्काल नहीं मिले। बाद में देवताओं ने प्रायश्चित किया और बृहस्पति के मार्गदर्शन से पुनः अपनी शक्ति प्राप्त की। 


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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