Ganga Avtaran Story: यज्ञ रक्षा का कार्य पूरा होने के बाद विश्वामित्र के आदेशानुसार राम और लक्ष्मण ने भी विश्वामित्र तथा अन्य ऋषि-मुनियों के साथ मिथिलापुरी की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में अनेक प्रकार के दृश्यों का अवलोकन करते हुये वे आध्यात्मिक चर्चा भी करते जाते थे।
Ramayana Mythological Story: जब परमेश्वर श्रीहरि विष्णु ने त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में धरती पर मानव-अवतार ग्रहण किया, तब बाल्यकाल से ही उन्होंने अपनी दिव्य लीलाएँ आरम्भ कर दी थीं। राक्षसों का संहार करने तथा ऋषि-मुनियों के यज्ञों की रक्षा करवाने हेतु महर्षि विश्वामित्र स्वयं अयोध्या नरेश दशरथ के पास पहुँचे और कौशल्या-पुत्र श्रीराम तथा सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण को बाल्यावस्था में ही राजद्वार से वन ले आए। ताड़का वध, मारीच-सुबाहु का नाश तथा सिद्धाश्रम में यज्ञ की पूर्ण रक्षा के पश्चात् विश्वामित्र दोनों राजकुमारों को मिथिलापुरी ले जा रहे थे। मार्ग में अनेक पवित्र नदियों के तट पार करते, वन-उपवनों के मनोरम दृश्य निहारते तथा आध्यात्मिक चर्चाएँ करते हुए वे आगे बढ़ रहे थे। इसी क्रम में एक दिन वे परम पावन माँ गंगा के तट पर पहुँचे। मार्ग में अनेक पवित्र तीर्थों का दर्शन कराते तथा दिव्य कथाएँ सुनाते जा रहे थे। इन्हीं कथाओं में सर्वश्रेष्ठ थी– माँ गंगा के पृथ्वी-अवतरण की पावन कथा। आइए पौराणिक कथा से जानते हैं कि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण को गंगा जी के जन्म का कौन सा रहस्या सुनाया था।
गंगा तट पर पहुंचकर सभी ने किया स्नान-विश्राम
यज्ञ रक्षा का कार्य पूरा होने के बाद विश्वामित्र के आदेशानुसार राम और लक्ष्मण ने भी विश्वामित्र तथा अन्य ऋषि-मुनियों के साथ मिथिलापुरी की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में अनेक प्रकार के दृश्यों का अवलोकन करते हुये वे आध्यात्मिक चर्चा भी करते जाते थे। इस प्रकार वे शोण नदी के तट पर पहुँचे। विश्वामित्र सहित सभी ऋषि मुनियों एवं राजकुमारों ने सरिता के शीतल जल में स्नान किया। इसके पश्चात् सन्ध्या-उपासना आदि से निवृत होकर धार्मिक कथाओं की चर्चा में व्यस्त हो गये। रात्रि अधिक हो जाने पर गुरु की आज्ञा से सभी ने वहीं रात्रि व्यतीत की।
प्रातः नित्यकर्मों तथा सन्ध्यावन्दनादि से निवृत होने के पश्चात् यह मण्डली आगे की ओर बढ़ी। वे परम पावन गंगा नदी के तट पर पहुँचे। उस समय मध्यानह्न होने के कारण भगवान भस्कर आकाश के मध्य में पहुँच चुके थे और गंगा का दृष्य अत्यंत मनोरम दिखाई दे रहा था। अठखेलियाँ करती हुई लहरों में सूर्य के अनेकों प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहे थे। जल में कौतुकमयी मछलियाँ क्रीड़ा कर रही थीं और नभ में सारस, हंस जैसे पक्षी अपनी मीठी बोली में बोल रहे थे। दूर दूर तक सुनहरे रेत के कण बिखरे पड़े थे और तटवर्ती वृक्षों की अनुपम शोभा दृष्टिगत हो रही थी।
श्रीराम का भाव-विभोर होना और प्रश्न पूछना
राम इस दृश्य को अपलक दृष्टि से देख रहे थे। उन्हें देख कर विश्वामित्र ने पूछा, “वत्स! इतना भावविभोर होकर तुम क्या देख रहे हो? राम ने कहा, “गुरुदेव! मैं सुरसरि की इस अद्भुत छटा को देख रहा हूँ। इस परम पावन सलिला के दर्शन मात्र से मेरे हृदय को अपूर्व शान्ति मिल रही है। भगवन्! मैं आपके श्रीमुख से यह सुनना चाहता हूँ कि इस कलुषहारिणी पवित्र गंगा की उत्पत्ति कैसे हुई?”
विश्वामित्र जी ने किया कथा प्रारम्भ
राम का प्रश्न सुन कर ऋषि विश्वामित्र बोले, “हे राम! अनेक प्रकार के कष्टों और तापों का निवारण करने वाली गंगा की कथा अत्यंत मनोरंजक तथा रोचक है। मैं तुम सभी को यह कथा सुनाता हूँ।”
हिमालय की दो कन्याएँ– गंगा और उमा
ऋषि विश्वामित्र ने इस प्रकार कथा सुनाना आरम्भ किया, “पर्वतराज हिमालय की अत्यंत रूपवती, लावण्यमयी एवं सर्वगुण सम्पन्न दो कन्याएँ थीं। इन कन्याओं की माता, सुमेरु पर्वत की पुत्री, मैना थीं। बड़ी कन्या का नाम गंगा तथा छोटी कन्या का नाम उमा था। गंगा अत्यन्त प्रभावशाली और असाधारण दैवी गुणों से सम्पन्न थी। वह किसी बन्धन को स्वीकार न कर मनमाने मार्गों का अनुसरण करती थी। उसकी इस असाधारण प्रतिभा से प्रभावित होकर देवता लोग विश्व के कल्याण की दृष्टि से उसे हिमालय से माँग कर ले गये। पर्वतराज की दूसरी कन्या उमा बड़ी तपस्विनी थी। उसने कठोर एवं असाधारण तपस्या करके शिव जी को वर के रूप में प्राप्त किया।”
राम का पूछा दूसरा प्रश्न
विश्वामित्र के इतना कहने पर राम ने कहा, “हे भगवन्! जब गंगा को देवता लोग सुरलोक ले गये तो वह पृथ्वी पर कैसे अवतरित हुई और गंगा को त्रिपथगा क्यों कहते हैं?”
उमा-गंगा का संवाद
राम के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ऋषि विश्वामित्र ने कहा, “सुरलोक में विचरण करती हुई गंगा से उमा की भेंट हुई। गंगा ने उमा से कहा कि मुझे सुरलोक में विचरण करते हुये बहुत दिन हो गये हैं। मेरी इच्छा है कि मैं अपनी मातृभूमि पृथ्वी पर विचरण करूँ। उमा ने गंगा आश्वासन दिया कि वे इसके लिये कोई प्रबन्ध करने का प्रयत्न करेंगी।”
राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की मृत्यु
विश्वामित्र ने फिर गंगा के धरती पर अवतरण की कथा सुनाई। इसके बाद ही राजा सगर के 60 हजार पुत्रों की मृत्यु हुई। महाराज सगर ने अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ किया। इन्द्र ने यज्ञ का अश्व चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बाँध दिया। सगर के साठ हजार पुत्र घोड़ा ढूँढ़ते हुए कपिल मुनि के आश्रम में पहुँचे। मुनि समाधि में थे। पुत्रों ने उन्हें चोर समझ अपशब्द कहे। क्रुद्ध होकर कपिल मुनि ने हुंकार मात्र से उन साठ हजार पुत्रों को भस्म कर दिया।
अंशुमान और दिलीप की असफल तपस्या
सगर के पौत्र अंशुमान ने कपिल मुनि से घोड़ा लेकर यज्ञ पूर्ण करवाया और उद्धार का उपाय पूछा। कपिल मुनि ने कहा- “इनका उद्धार तभी होगा जब स्वर्ग की गंगा इनकी भस्म को स्पर्श करेगी।” अंशुमान ने कठोर तप किया, किन्तु सफल न हुए। उनके पुत्र दिलीप ने भी आजीवन तप किया, पर गंगा नहीं आईं।
भगीरथ की घोर तपस्या
अंत में दिलीप-पुत्र भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का संकल्प लिया। उन्होंने हिमालय पर एक पैर पर खड़े होकर हजारों वर्ष तक केवल वायु पीकर तपस्या की। ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और बोले- “वत्स! मैं गंगा को पृथ्वी पर भेज रहा हूँ, किन्तु मेरे वेग को पृथ्वी सहन नहीं कर सकेगी। तुम शिव से प्रार्थना करो कि वे मुझे अपनी जटाओं में धारण करें।”
भगीरथ का शिव-आराधन
भगीरथ ने कैलाश पर जाकर भगवान शिव की घोर आराधना की। भोलेनाथ प्रसन्न हुए और बोले- “तथास्तु! मैं गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लूँगा।” ब्रह्माजी ने गंगा को आज्ञा दी। गंगा अत्यंत अभिमान के साथ पृथ्वी को जलमग्न करने के इरादे से झूमती हुई आईं। भगवान शिव ने एक जटा उचकाकर उन्हें उसमें कैद कर लिया। गंगा जटाओं में भटकती रहीं, बाहर न निकल सकीं। गंगा ने जब अपने को जटा-जाल में फँसा देखा तो अत्यंत क्रुद्ध हुईं, किन्तु कुछ कर न सकीं।
त्रिपथगा कैसे कहलाई गंगा
तब भगीरथ ने पुनः शिव-स्तुति की। भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर अपनी जटा से गंगा को बिंदु-सरस्वती नामक स्थान पर मुक्त कर दिया। वहाँ से गंगा सात धाराओं में विभक्त होकर पृथ्वी पर अवतरित हुईं– तीन धाराएँ पूर्व में, तीन पश्चिम में और सातवीं धारा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चली। इसी कारण गंगा को त्रिपथगा कहते हैं। स्वर्ग, मृत्यु लोक और पाताल– तीनों लोकों में विचरण करने के कारण भी उन्हें त्रिपथगा कहते हैं।
(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)