Ramayana Story: अयोध्यापति महाराज दशरथ के दरबार में यथोचित आसन पर गुरु वशिष्ठ, मन्त्रीगण और दरबारीगण बैठे थे। सहसा महाराज दशरथ के द्वारपाल ने ऋषि विश्वामित्र के आगमन की सूचना दी।
Ramayana Mythological Story: जब साक्षात् भगवान विष्णु धरती पर मनुष्य-रूप में श्रीराम के रूप में अवतरित हुए तो बाल्यकाल से ही उन्होंने अपनी दिव्य लीलाएँ आरम्भ कर दी थीं। त्रिलोकी के स्वामी श्रीराम ने अभी बाल्यावस्था में ही वह पराक्रम दिखाना शुरू कर दिया था, जिसकी कल्पना भी सामान्य जन नहीं कर सकते। दिव्यास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करने तथा ऋषियों के यज्ञ की रक्षा कराने के निमित्त महर्षि विश्वामित्र स्वयं अयोध्या नगरी पधारे और बाल्यावस्था में ही श्रीराम तथा लक्ष्मण को अयोध्या से वन की ओर ले गए। उन्हें विश्वामित्र के आश्रम जाना था, जहाँ राक्षसों से यज्ञ की रक्षा करनी थी। इसी यात्रा के प्रारम्भिक चरण में मार्ग में सबसे पहले वे उस पवित्र स्थल पर ठहरे, जिसे लोग शिव आश्रम और कामदेव आश्रम दोनों नामों से पुकारते हैं। वहाँ रात्रि-विश्राम के समय महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण को उस आश्रम की अद्भुत एवं रहस्यमयी कथा सुनाई। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्या थी वह कथा…
अयोध्या में विश्वामित्र का आगमन
अयोध्यापति महाराज दशरथ के दरबार में यथोचित आसन पर गुरु वशिष्ठ, मन्त्रीगण और दरबारीगण बैठे थे। सहसा महाराज दशरथ के द्वारपाल ने ऋषि विश्वामित्र के आगमन की सूचना दी। स्वयं राजा दशरथ ने द्वार तक जाकर विश्वामित्र की अभ्यर्थना की और आदरपूर्वक उन्हें दरबार के अन्दर ले आए तथा गुरु वशिष्ठ के पास ही आसन देकर उनका यथोचित सत्कार किया।
कुशलक्षेम पूछने के पश्चात् राजा दशरथ ने विनम्र वाणी में ऋषि विश्वामित्र से कहा, “हे मुनिश्रेष्ठ! आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हुआ तथा आपके चरणों की पवित्र धूलि से यह राजदरबार और सम्पूर्ण अयोध्यापुरी धन्य हो गई। अब कृपा करके आप अपने आने का प्रयोजन बताइए। किसी भी प्रकार की आपकी सेवा करके मैं स्वयं को अत्यन्त भाग्यशाली समझूँगा।”
राजा के विनयपूर्ण वचनों को सुनकर मुनि विश्वामित्र बोले, “हे राजन्! आपने अपने कुल की मर्यादा के अनुरूप ही वचन कहे हैं। इक्ष्वाकु वंश के राजाओं की श्रद्धा-भक्ति गौ, ब्राह्मण और ऋषि-मुनियों के प्रति सदैव ही रही है। मैं आपके पास एक विशेष प्रयोजन से आया हूँ, समझिए कि कुछ माँगने के लिए आया हूँ। यदि आप मुझे वांछित वस्तु देने का वचन दें तो मैं अपनी माँग आपके सामने प्रस्तुत करूँ। आपके वचन न देने की दशा में मैं बिना कुछ माँगे ही वापस लौट जाऊँगा।”
महाराज दशरथ ने कहा, “हे ब्रह्मर्षि! आप निसंकोच अपनी माँग रखें। सम्पूर्ण विश्व जानता है कि रघुकुल के राजाओं का वचन ही उनकी प्रतिज्ञा होती है। आप माँग तो मैं अपना शीश काट कर भी आपके चरणों में रख सकता हूँ।” उनके इन वचनों से आश्वस्त होकर ऋषि विश्वामित्र बोले, “राजन्! मैं अपने आश्रम में एक यज्ञ कर रहा हूँ। इस यज्ञ के पूर्णाहुति के समय मारीच और सुबाहु नाम के दो राक्षस आकर रक्त, माँस आदि अपवित्र वस्तुएँ यज्ञ-वेदी में फेंक देते हैं। इस प्रकार यज्ञ पूर्ण नहीं हो पाता। ऐसा वे अनेक बार कर चुके हैं। मैं उन्हें अपने तेज से श्राप देकर नष्ट भी नहीं कर सकता, क्योंकि यज्ञ करते समय क्रोध करना वर्जित है।
मैं जानता हूँ कि आप मर्यादा का पालन करने वाले, ऋषि-मुनियों के हितैषी एवं प्रजावत्सल राजा हैं। मैं आपसे आपके ज्येष्ठ पुत्र राम को माँगने के लिए आया हूँ, ताकि वह मेरे साथ जाकर राक्षसों से मेरे यज्ञ की रक्षा कर सके और मेरा यज्ञानुष्ठान निर्विघ्न पूरा हो सके। मुझे पता है कि राम आसानी के साथ उन दोनों का संहार कर सकते हैं। अतः केवल दस दिनों के लिए राम को मुझे दे दीजिए। कार्य पूर्ण होते ही मैं उन्हें सकुशल आपके पास वापस पहुँचा दूँगा।”
राजा दशरथ का पुत्र-मोह
विश्वामित्र की बात सुनकर राजा दशरथ को अत्यन्त विषाद हुआ। ऐसा लगने लगा कि अभी वे मूर्छित हो जाएँगे। फिर स्वयं को संभाल कर उन्होंने कहा, “मुनिवर! राम अभी बालक है। राक्षसों का सामना करना उसके लिए सम्भव नहीं होगा। आपके यज्ञ की रक्षा करने के लिए मैं स्वयं ही जाने को तैयार हूँ।” विश्वामित्र बोले, “राजन्! आप तनिक भी सन्देह न करें कि राम उनका सामना नहीं कर सकते। मैंने अपने योगबल से उनकी शक्तियों का अनुमान लगा लिया है। आप निशंक होकर राम को मेरे साथ भेज दीजिए।”
इस पर राजा दशरथ ने उत्तर दिया, “हे मुनिश्रेष्ठ! राम ने अभी तक किसी राक्षस के माया-प्रपंचों को नहीं देखा है और उसे इस प्रकार के युद्ध का अनुभव भी नहीं है। जब से उसने जन्म लिया है, मैंने उसे अपनी आँखों के सामने से कभी ओझल भी होने नहीं दिया है। उसके वियोग से मेरे प्राण निकल जाएँगे। आपसे विनय है कि कृपा करके मुझे ससैन्य चलने की आज्ञा दें।”
विश्वामित्र का क्रोध
पुत्रमोह से ग्रस्त होकर राजा दशरथ को अपनी प्रतिज्ञा से विचलित होते देख ऋषि विश्वामित्र आवेश में आ गए। उन्होंने कहा, “राजन्! मैं नहीं जानता था कि रघुकुल में अब प्रतिज्ञा पालन करने की परम्परा समाप्त हो गई है। यदि जानता होता तो मैं कदापि नहीं आता। लो, मैं अब चला जाता हूँ।” बात समाप्त होते-होते उनका मुख क्रोध से लाल हो गया।
विश्वामित्र को इस प्रकार क्रुद्ध होते देख दरबारी एवं मन्त्रीगण भयभीत हो गए और किसी प्रकार के अनिष्ट की कल्पना से वे काँप उठे। तभी गुरु वशिष्ठ ने राजा को समझाया, “हे राजन्! पुत्र के मोह में ग्रस्त होकर रघुकुल की मर्यादा, प्रतिज्ञा पालन और सत्यनिष्ठा को कलंकित मत कीजिए। मैं आपको परामर्श देता हूँ कि आप राम के बालक होने की बात को भूल कर एवं निःशंक होकर राम को मुनिराज के साथ भेज दीजिए। महामुनि अत्यन्त विद्वान, नीतिनिपुण और अस्त्र-शस्त्र के ज्ञाता हैं। मुनिवर के साथ जाने से राम का किसी प्रकार से भी अहित नहीं हो सकता, उल्टे वे इनके साथ रह कर शस्त्र और शास्त्र विद्याओं में अत्यधिक निपुण हो जाएँगे तथा उनका कल्याण ही होगा।”
राम-लक्ष्मण का विश्वामित्र के साथ प्रस्थान
गुरु वशिष्ठ के वचनों से आश्वस्त होकर राजा दशरथ ने राम को बुला भेजा। राम के साथ-साथ लक्ष्मण भी वहाँ चले आए। राजा दशरथ ने राम को ऋषि विश्वामित्र के साथ जाने की आज्ञा दी। पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके राम के मुनिवर के साथ जाने के लिए तैयार हो जाने पर लक्ष्मण ने भी ऋषि विश्वामित्र से साथ चलने के लिए प्रार्थना की और अपने पिता से भी राम के साथ जाने के लिए अनुमति माँगी। अनुमति मिल जाने पर राम और लक्ष्मण सभी गुरुजनों से आशीर्वाद लेकर ऋषि विश्वामित्र के साथ चल पड़े।
प्रथम रात्रि-विश्राम
दूसरे दिन ब्राह्म-मुहूर्त में निद्रा त्याग कर मुनि विश्वामित्र तृण-शैयाओं पर विश्राम करते हुए राम और लक्ष्मण के पास जाकर बोले, “हे राम और लक्ष्मण! जागो। रात्रि समाप्त हो गई है। कुछ ही काल में प्राची में भगवान भुवन-भास्कर उदित होने वाले हैं। जिस प्रकार वे अन्धकार का नाश कर समस्त दिशाओं में प्रकाश फैलाते हैं, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने पराक्रम से राक्षसों का विनाश करना है। नित्य कर्म से निवृत्त होओ, सन्ध्या-उपासना करो। अग्निहोत्रादि से देवताओं को प्रसन्न करो। आलस्य को त्यागो और शीघ्र उठ जाओ, क्योंकि अब सोने का समय नहीं है।”
गुरु की आज्ञा प्राप्त होते ही दोनों भाइयों ने शैया त्याग दी और नित्यकर्म एवं स्नान-ध्यान आदि से निवृत्त होकर मुनिवर के साथ गंगा तट की ओर चल दिए। वे गंगा और सरयू के संगम पर पहुँचे, जहाँ पर ऋषि-मुनियों तथा तपस्वियों के शान्त व सुन्दर आश्रम बने हुए थे। एक अत्यधिक सुन्दर आश्रम को देखकर रामचन्द्र ने गुरु विश्वामित्र से पूछा, “हे गुरुवर! यह परम रमणीक आश्रम किन महर्षि का निवास-स्थान है?”
कामदेव आश्रम की कथा
राम के प्रश्न के उत्तर में ऋषि विश्वामित्र ने बताया, “हे राम! यह एक विशेष आश्रम है। पूर्व काल में कैलाशपति महादेव ने यहाँ घोर तपस्या की थी। सम्पूर्ण विश्व उनकी तपस्या को देखकर विचलित हो उठा था। उनकी तपस्या से देवराज इन्द्र भयभीत हो गए और उन्होंने शंकर जी के तप को भंग करने का निश्चय किया। इस कार्य के लिए उन्होंने कामदेव को नियुक्त कर दिया। भगवान शिव पर कामदेव ने एक के बाद एक कई बाण छोड़े, जिससे उनकी तपस्या में बाधा पड़ी। क्रुद्ध होकर महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया।
उस तीसरे नेत्र की तेजोमयी ज्वाला से जल कर कामदेव भस्म हो गए। देवता होने के कारण कामदेव की मृत्यु नहीं हुई, केवल शरीर ही नष्ट हुआ। इस प्रकार अंग नष्ट हो जाने के कारण उसका नाम अनंग हो गया और इस स्थान का नाम अंगदेश पड़ गया। यह भगवान शिव का आश्रम है, किन्तु भगवान शिव के द्वारा यहाँ पर कामदेव को भस्म कर देने के कारण इसे कामदेव का आश्रम भी कहते हैं। इस प्रकार वह पवित्र स्थल जो मूलतः भगवान शिव का तपोभूमि था, कामदेव के भस्म होने के कारण “कामदेव आश्रम” के नाम से भी विख्यात हो गया।
गुरु विश्वामित्र की आज्ञानुसार सभी ने वहीं रात्रि-विश्राम करने का निश्चय किया। राम और लक्ष्मण दोनों भाइयों ने वन से कंद-मूल-फल लाकर मुनिवर को समर्पित किए और गुरु के साथ दोनों भाइयों ने प्रसाद ग्रहण किया। तत्पश्चात् स्नान, सन्ध्या-उपासना आदि से निवृत्त होकर राम और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र से अनेक प्रकार की कथाएँ तथा धार्मिक प्रवचन सुनते रहे। अन्त में गुरु की यथोचित सेवा करने के पश्चात् आज्ञा पाकर वे परम पवित्र गायत्री मन्त्र का जाप करते हुए तृण-शैयाओं पर जा विश्राम करने लगे।
(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)