facebook pixel
विज्ञापन
Home  mythology  ramayana mythological story chitrakoot ke bad shree ram ne kis jagah banaya tha apna nivas sthan

Ramayana: चित्रकूट के बाद श्रीराम ने किस जगह को बनाया था अपना निवास स्थान? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी साह
सार

Ramayana Katha: अयोध्या के महाराज दशरथ ने राम को युवराज घोषित करने का निर्णय लिया, जिसकी प्रसन्नता अयोध्या के प्रत्येक घर में व्याप्त थी। किंतु नियति को कुछ और स्वीकार था। 

Ramayana Mythological Story:
Ramayana Mythological Story: भगवान श्रीराम राक्षस राज रावण का वध करने तथा मर्यादा पुरुषोत्तम का आदर्श स्थापित करने के लिए विष्णु के अवतार के रूप में मानव रूप में धरती पर अवतरित हुए थे। उनके दिव्य लीला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहा 14 वर्ष का वनवास। इस वनवास काल में उन्होंने अनेक ऋषि-मुनियों से भेंट की, असंख्य राक्षसों का संहार किया और धर्म की स्थापना की। वनवास के दौरान उन्होंने कई स्थानों पर निवास किया, लेकिन सबसे अधिक समय उन्होंने चित्रकूट में व्यतीत किया था। वहाँ पिता दशरथ का स्वर्गवास की सूचना मिली, भरत मिलन हुआ और राम-भारत मिलाप की अमर गाथा रची गई, लेकिन क्या आपको पता है कि चित्रकूट के बाद श्रीराम, सीता और लक्ष्मण कहाँ गए थे? उन्होंने अपना अगला प्रमुख निवास स्थान कहाँ बनाया था? आइए जानते हैं उस पावन स्थल की कथा...

अयोध्या से वनगमन

अयोध्या के महाराज दशरथ ने राम को युवराज घोषित करने का निर्णय लिया, जिसकी प्रसन्नता अयोध्या के प्रत्येक घर में व्याप्त थी। किंतु नियति को कुछ और स्वीकार था। कैकेयी को मिले वरदानों के कारण राम को चौदह वर्ष का वनवास मिला और भरत को राज्य। राम ने पिता की वचन-पालन की लाज रखते हुए बिना किसी शिकायत के वन को प्रस्थान किया। उनके साथ सीता और लक्ष्मण भी अटूट प्रेम और कर्तव्य निभाते हुए चल पड़े। अयोध्या छोड़ते समय लोगों का विलाप, जनसमुदाय की विनती और राजा दशरथ का हृदय-विदारक दुःख इतिहास की अमर घटनाएँ हैं।

अयोध्या से प्रयाग तक की यात्रा में भगवान राम ने पहले तमसा नदी के तट पर विश्राम किया, फिर त्रिवेणी संगम पहुंचे जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती की धाराएँ उन्हें पवित्र आशीष देने मानो स्वयं उपस्थित थीं। यहीं उन्होंने ऋषि भारद्वाज से भेंट की, जिन्होंने उन्हें वनवास के उपयुक्त स्थल की दिशा दी और कहा कि चित्रकूट की शरण लें, क्योंकि वह स्थान शांति और तपस्या का केंद्र है। भारद्वाज की आज्ञा शिरोधार्य कर राम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट की ओर बढ़े, और वहीँ उनका प्रथम बड़ा आश्रय स्थापित हुआ।

चित्रकूट में श्रीराम का आगमन

चित्रकूट की धरती पर कदम रखते ही श्रीराम ने अनुभव किया कि यह क्षेत्र स्वयं तपस्या का स्वरूप है। घने वन, निर्मल नदियाँ और पहाड़ों की आलिंगन करती शृंखलाएँ इस भूमि को दैवी बनाती हैं। यही वह स्थान है जहाँ लक्ष्मण ने श्रीराम और सीता के लिए एक सुंदर कुटिया बनाई और वर्षों तक राम परिवार ने शांतिपूर्वक निवास किया। चित्रकूट में राम का समय न केवल विश्राम का, बल्कि गहन आध्यात्मिक साधना का था।

चित्रकूट में ही वे अत्रि ऋषि और माता अनसूया के आश्रम पहुँचे। यह आश्रम चित्रकूट की ही पवित्र सीमा में था। माता अनसूया ने सीता का विशेष आदर-सत्कार किया और उन्हें पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया। उन्होंने सीता को दिव्य वस्त्र, अलंकरण और सौभाग्य प्रदान किया। अत्रि ऋषि ने राम का सम्मानपूर्वक सत्कार किया और उन्हें वनवास में पालन करने योग्य सिद्धांतों का स्मरण कराया। यह भेंट राम के चित्रकूट प्रवास का महत्वपूर्ण अध्याय है।

चित्रकूट में राम ने कई राक्षसों का वध किया, अनगिनत साधुओं के तप की रक्षा की और दंडकारण्य की सुरक्षा की शपथ ली। इसी भूमि पर भरत उनसे मिलने आए, उन्हें वापस अयोध्या ले जाने का आग्रह किया और पिता दशरथ की स्वर्गवास का समाचार सुनाया। राम ने धर्म का पालन करते हुए वनवास स्वीकार किया और भरत लौट गए, लेकिन चित्रकूट में उनके प्रवास का संदेश फैल जाने से तीर्थयात्रियों और जनसमूह की भीड़ बढ़ने लगी। वनवास की मर्यादा बनाए रखने के लिए राम को अंततः चित्रकूट छोड़ना पड़ा।

चित्रकूट छोड़ने का निर्णय

जब श्रीराम ने देखा कि चित्रकूट में कुटिया के आस-पास असंख्य लोग आने लगे हैं तो उन्होंने सीता और लक्ष्मण से कहा कि वनवास का अर्थ लोक-बंधन से दूर रहकर तप करना है। लोगों का अत्यधिक आना वनवास की शांति को भंग कर रहा है, इसलिए समय आ गया है कि वे आगे बढ़ें। इस निर्णय में श्रीराम के भीतर त्याग था, मर्यादा थी और वनवास के पालन की दृढ़ प्रतिज्ञा भी।

चित्रकूट के बाद की यात्रा

चित्रकूट छोड़कर दक्षिण दिशा में बढ़ते हुए श्रीराम दंडकारण्य के विस्तृत अरण्य में पहुंचे। यह वन अत्यंत भयावह माना जाता था, जहाँ राक्षसों का आतंक बढ़ चुका था और साधु-मुनियों को सदा भय सताता था। परंतु राम का आगमन स्वयं आशा का दीपक था। यहाँ उन्होंने अनेक ऋषियों के आश्रमों से होकर यात्रा की और धर्म-संरक्षण का वचन दिया।

यात्रा में वे सबसे पहले दंडकारण्य के उस भाग में पहुँचे जहाँ कई तपस्वी निवास करते थे। उन्होंने राम से तप की रक्षा की प्रार्थना की और कहा कि राक्षस उनके यज्ञ भंग करते हैं। राम ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे धर्मरक्षा के लिए सतत तत्पर रहेंगे।

शरभंग ऋषि का आश्रम

दंडकारण्य के गहन भाग में पहुंचकर श्रीराम शरभंग ऋषि के आश्रम में पहुंचे। जब वे पहुँचे तो इंद्र देवराज स्वयं शरभंग ऋषि को अपने वाहन से ब्रह्मलोक ले जाने आए थे। परंतु शरभंग ने कहा कि जब तक वे श्रीराम के दर्शन न कर लें तब तक वे देह त्याग नहीं करेंगे। इंद्र के जाने के बाद उन्होंने राम, सीता और लक्ष्मण का स्वागत किया और बताया कि दंडकारण्य में कितने दुष्ट राक्षस साधुओं को कष्ट पहुंचा रहे हैं। अपने कर्तव्य का स्मरण कराते हुए ऋषि ने अग्नि में प्रवेश कर देह त्याग दी। उनकी तपस्या का फल और उनका आशीर्वाद राम के वनवास का महत्वपूर्ण आधार बना।

सुतिक्ष्ण ऋषि का आश्रम

आगे बढ़ते हुए श्रीराम सुतिक्ष्ण ऋषि के आश्रम पहुंचे। यह ऋषि अत्यंत विनम्र और राम के अनन्य भक्त थे। उन्होंने राम को देखते ही प्रणाम किया और विलक्षण प्रेम के साथ उनका स्वागत किया। सुतिक्ष्ण ने राम को दंडकारण्य में आगे आने वाले आश्रमों का मार्ग बताया और कहा कि दक्षिण दिशा की यात्रा उन्हें महान ऋषियों के दर्शन कराएगी, जो राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस आश्रम में राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ कुछ समय व्यतीत किया और ऋषि के उपदेश को हृदय में धारण किया।

अगस्त्य ऋषि का आश्रम

सुतिक्ष्ण ऋषि की आज्ञा से आगे बढ़कर श्रीराम उस तपोभूमि में पहुँचे, जहाँ महर्षि अगस्त्य निवास करते थे। अगस्त्य ऋषि त्रेतायुग के महानतम ऋषियों में से एक थे- धर्मरक्षक, राक्षसी शक्तियों के संहारक और देवताओं के प्रिय। उन्होंने राम का स्वागत करते हुए कहा कि देवताओं ने उन्हें निर्देश दिया है कि वे राम को दिव्य अस्त्र-शस्त्र दें, जिनकी आवश्यकता आगे आने वाली अनेकों युद्ध कथाओं में पड़ेगी। अगस्त्य ने राम को विष्णु का अद्वितीय धनुष, अग्नि-बाण, वायु-बाण और कई दिव्य कवच प्रदान किए।

अगस्त्य ऋषि ने कहा कि दक्षिण दिशा में पंचवटी नामक एक पवित्र वन है, जो राम के वनवास के अंतिम महत्वपूर्ण चरण के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थल होगा। वहीं से राक्षसों के विनाश का मार्ग खुलेगा, वहीं श्रीराम के अवतरण का वास्तविक उद्देश्य गति प्राप्त करेगा।

पंचवटी में सीता हरण

अगस्त्य मुनि की आज्ञा का सम्मान करते हुए श्रीराम पंचवटी पहुंचे, जहाँ लक्ष्मण ने सुंदर कुटिया बनाई। यह स्थान प्रकृति की गोद में बसा था- पंचवटी के वृक्ष मानो अपनी छाया राम परिवार को अर्पित करते थे। यहाँ का वातावरण शांत था, किन्तु नियति को यहीं सबसे बड़ा परिवर्तन करना था।

पंचवटी में सबसे पहले शूर्पणखा आई, जिसने राम को देखकर विवाह का प्रस्ताव रखा। राम ने उसे विनम्रता से समझाया, किन्तु जब उसने सीता पर हाथ उठाया, तो लक्ष्मण ने उसकी नाक-कान काट दिए। उसके अपमान से क्रोधित होकर खर और दूषण ने चौदह हज़ार राक्षसों की सेना के साथ राम पर आक्रमण किया, किन्तु श्रीराम ने अकेले ही समस्त राक्षसों का वध कर दिया।

इन घटनाओं ने लंका में बैठे रावण को विचलित किया। शूर्पणखा ने उसे सीता के सौंदर्य का वर्णन किया और राम को दुखी करने का उपाय बताया। फिर वह समय आया जब रावण स्वर्ण-मृग (मारिच) की चाल से सीता को अकेली पाकर उनका हरण कर ले गया। यह घटना राम के जीवन में सबसे बड़ा दुख लेकर आई, किंतु साथ ही यही वह बिंदु था जहाँ से रावण के विनाश का मार्ग आरंभ हुआ।

यह भी पढ़ें:-

Vishwamitra-Vashishtha Yuddh: विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच क्यों हुआ था युद्ध? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 

Ramayana Katha: अयोध्या क्यों आए थे विश्वामित्र? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य

Vishvamitra Story: कौन थे विश्वामित्र? जिन्होंने श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को दिया था आध्यात्मिक ज्ञान

(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel