Ramayana Story: चित्रकूट के निकट ही महर्षि अत्रि का आश्रम था। श्रीराम जब चित्रकूट में ठहरे, तब सबसे पहले अत्रि मुनि ने उन्हें दर्शन दिए। अत्रि जी ने श्रीराम को गले लगाया और कहा- हे राम! तुम समस्त जगत के उद्धार के लिए यहाँ आए हो।
Ramayana Mythological Story: भगवान श्रीराम राक्षसराज रावण के वध और धर्म की स्थापना के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में मनुष्य रूप में धरती पर अवतरित हुए थे। उनकी दिव्य लीला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा चौदह वर्ष का वनवास था। इस काल में उन्होंने न केवल कठोर तपस्या की, अपितु अनेक महर्षियों से भेंट कर उन्हें दर्शन दिए, उनके आश्रमों की रक्षा की और वर्षों से श्रीराम-प्रतीक्षा में बैठे तपस्वियों की साधना को सफल किया। वनवास के प्रारंभिक दिनों में जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट पर्वत पर निवास कर रहे थे, तब वहाँ अनेक महर्षियों का आगमन हुआ और उनसे श्रीराम की विशेष भेंट हुई। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड और अरण्य काण्ड में इन घटनाओं का सुंदर वर्णन मिलता है। आइए, जानते हैं कि चित्रकूट में श्रीराम से किन-किन ऋषियों की भेंट हुई और उन भेंटों के पीछे क्या पौराणिक प्रसंग थे...
वनवास का प्रारंभ और चित्रकूट प्रवेश
कैकेयी के वरदान से चौदह वर्ष के वनवास को स्वीकार कर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या से प्रस्थान करते हैं। गंगा तट पर गुह निषादराज से भेंट, केवट से गंगा पार कराने की लीला, फिर प्रयाग में भरद्वाज मुनि के आश्रम में रात्रि-विश्राम करते हैं। जब प्रभु श्री राम, माता जानकी और लक्ष्मण वनवास को प्रस्थान कर रहे थे, तब वह भारद्वाज मुनि के आश्रम में आए, जहां से उन्हें आगे का मार्गदर्शन मिला। प्रभु श्री राम यमुना-गंगा के संगम तट पर पहुँचे। वहाँ महर्षि भारद्वाज का दिव्य आश्रम था। ऋषि ने प्रभु का दोनों हाथ जोड़कर स्वागत किया और कहा- “हे रघुकुल तिलक! मैंने तपस्या से जाना है कि आपका वनवास केवल राक्षसों के संहार और ऋषियों की रक्षा के लिए ही हुआ है। इसके बाद श्रीराम ने ऋषि भारद्वाज के आश्रम में विश्राम किया और फिर चित्रकूट की ओर आगे बढ़ चले। महर्षि भरद्वाज के निर्देशानुसार वे चित्रकूट पर्वत पर पहुँचते हैं। यहीं वे मंदाकिनी नदी के तट पर ऋषियों के परामर्श से पर्णकुटी बनाकर रहने लगते हैं।
चित्रकूट में महर्षि वाल्मीकि से प्रथम भेंट
वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट है कि चित्रकूट पहुँचने से पहले ही श्रीराम तमसा नदी के तट पर महर्षि वाल्मीकि से मिले थे, किंतु चित्रकूट में भी वाल्मीकि जी का बार-बार आना-जाना हुआ। वाल्मीकि जी तो स्वयं श्रीराम के परम भक्त थे और उन्होंने ही रामकथा को लिपिबद्ध किया। चित्रकूट में जब श्रीराम पर्णकुटी बना रहे थे, तब वाल्मीकि जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि यह स्थान तुम्हारे निवास के लिए अत्यंत उत्तम है। बाद में लव-कुश भी इसी चित्रकूट क्षेत्र में वाल्मीकि आश्रम में पले। अतः चित्रकूट में वाल्मीकि जी की भेंट को प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
चित्रकूट के आसपास के महर्षि और उनका आगमन
श्रीराम के चित्रकूट आने की बात जब चारों दिशाओं में फैली, तब वहाँ रहने वाले सैकड़ों ऋषि-मुनि उनके दर्शन के लिए आने लगे। वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड में लिखा है:-
ततः संनादिनः सर्वे त्यक्त्वा स्वान् विहगान् मृगान्।
ऋषयः संनिवृत्ताः ते रामदर्शनकाङ्क्षिणः॥
अर्थात् सभी ऋषि अपने-अपने आश्रमों से पक्षियों और मृगों को छोड़कर श्रीराम के दर्शन की अभिलाषा से चित्रकूट की ओर चल पड़े।
महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनसूया से भेंट
चित्रकूट के निकट ही महर्षि अत्रि का आश्रम था। श्रीराम जब चित्रकूट में ठहरे, तब सबसे पहले अत्रि मुनि ने उन्हें दर्शन दिए। अत्रि जी ने श्रीराम को गले लगाया और कहा- हे राम! तुम समस्त जगत के उद्धार के लिए यहाँ आए हो।
अनसूया जी ने माता सीता को पातिव्रत्य धर्म का उपदेश दिया और उन्हें दिव्य वस्त्र, आभूषण और तेज बढ़ाने वाला चंदन भेंट किया। यह प्रसंग अयोध्या काण्ड में विस्तार से वर्णित है। अनसूया जी ने सीता को दस प्रकार के पातिव्रत्य धर्म बताए और कहा कि पति को देवता मानकर उनकी सेवा करने से स्त्री का जीवन सफल होता है।
सुतीक्ष्ण मुनिसे भेंट
सुतीक्ष्ण मुनि का आश्रम चित्रकूट से कुछ दूरी पर था। जब श्रीराम चित्रकूट में थे, तब सुतीक्ष्ण मुनि उनके पास आए और प्रार्थना की कि वे उनके आश्रम में पधारें। बाद में जब श्रीराम दंडकारण्य की ओर गए, तब सुतीक्ष्ण के आश्रम में ठहरे, किंतु चित्रकूट में भी उनकी भेंट हुई थी।
शरभंग मुनि
शरभंग मुनि भी चित्रकूट के समीप तपस्या कर रहे थे। जब श्रीराम चित्रकूट में थे, तब इंद्र देव शरभंग मुनि को स्वर्ग ले जाने आए थे, किंतु शरभंग मुनि ने कहा- श्रीराम के दर्शन बिना मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा।
श्रीराम के दर्शन कर लेने के बाद शरभंग मुनि ने अपने शरीर को योगाग्नि से भस्म कर दिया और स्वर्ग गए। यह प्रसंग अरण्य काण्ड के प्रारंभ में है, जब श्रीराम चित्रकूट से दंडकारण्य जा रहे थे।
अन्य ऋषि-मुनि समूह
वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि चित्रकूट में श्रीराम के पास सैकड़ों ऋषि आए– कोई वैखानस, कोई वालखिल्य, कोई संप्रक्षाल, कोई मरीचिप, कोई अशन्याशी, कोई पर्णाशी, कोई दन्तोलूखली आदि। ये सभी वर्षों से श्रीराम की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे कहते थे- हे राम! राक्षस हमें बहुत सताते हैं। आप हमारे रक्षक बनिए।”
श्रीराम ने कहा- “मैं अवश्य आपकी रक्षा करूँगा।”
श्रीराम ओर मुनि अगस्त्य की भेंट
वनवास के दस वर्ष पूरे हो चुके थे। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट से दक्षिण की ओर बढ़ रहे थे। उन्होंने अत्रि-अनसूया, शरभंग, सुतीक्ष्ण आदि आश्रमों में विश्राम किया। सुतीक्ष्ण मुनि ने कहा– “हे राम! मेरे गुरु महर्षि अगस्त्य का आश्रम यहाँ से थोड़ी दूर है। वे आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।” श्रीराम ऋषि सुतीक्ष्ण का आशीर्वाद लेकर आगे बढ़े। मार्ग में अगस्त्य जी के शिष्य मिले। उन्होंने बड़े आदर से तीनों को आश्रम तक पहुँचाया।
इसके बाद अगस्त्य जी ने श्रीराम को तीन दिव्यास्त्र भेंट किए, जिन्हें वे स्वयं संचित करके रखे थे। पहला था भगवान विष्णु का वह महान धनुष, जो पहले इंद्र ने अगस्त्य जी को दिया था। दूसरा था ब्रह्मा जी द्वारा सृजित अक्षय तूणीर यानी दो तरकस, जिनमें बाण कभी समाप्त नहीं होते। तीसरा था- भगवान सूर्य द्वारा प्रदत्त तेजस्वी खड्ग। वाल्मीकि जी लिखते हैं कि अगस्त्य जी ने कहा – “हे राम! ये अस्त्र मैंने तुम्हारे लिए ही रख छोड़े थे। अब ये तुम्हारे ही हैं।”
(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।