Ramayana Mythological Story: चित्रकूट पहुँचकर श्रीराम ने मंदाकिनी नदी के तट पर एक सुंदर परणकुटी बनाई। यहीं उन्हें सूचना मिली कि भरत अयोध्या की राजगद्दी नहीं चाहते और राम को वापस लाने आए हैं। भरत और राम की चित्रकूट में बड़ी मार्मिक भेंट हुई।
Ramayana Mythological Story: भगवान विष्णु ने जब-जब धरती पर असुरों का आतंक बढ़ा, तब-तब उन्होंने अवतार लेकर पृथ्वी का भार हल्का किया। त्रेतायुग में जब राक्षसराज रावण के अत्याचार चरम पर पहुँच गए और उसने तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मचा रखी थी, तब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में मानव अवतार लिया। उनका एकमात्र उद्देश्य था रावण का वध करना और धर्म की पुनर्स्थापना।
इस दिव्य लीला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था श्रीराम का 14 वर्ष का वनवास। इसी वनवास काल में उन्होंने अनेक महर्षियों से भेंट की, राक्षसों का संहार किया और अंततः लंका विजय तक की यात्रा पूरी की। वनवास के दौरान वे कई पवित्र स्थानों पर रुके– चित्रकूट, दंडकारण्य और पंचवटी। इनमें से पंचवटी का विशेष महत्व है, क्योंकि यहीं से राम-रावण युद्ध की असली शुरुआत हुई, लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्रीराम को पंचवटी जाने की सलाह किसने दी थी? आइए वाल्मीकि रामायण के आधार पर पूरी कथा...
श्रीराम वनवास कैसे मिला?
श्रीराम अयोध्या के राजकुमार थे। राजा दशरथ उन्हें युवराज बनाना चाहते थे। लेकिन कैकेयी ने अपने दो वरदानों का प्रयोग कर राम को 14 वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत को राजगद्दी दिलवा दी। राम ने बिना किसी विरोध के पितृ-वचन का पालन किया। माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी उनके साथ वन को चल पड़े।
तीनों ने वल्कल वस्त्र धारण किए और पैदल ही अयोध्या से प्रस्थान किया। रास्ते में कोसल देश के लोग उनके पीछे-पीछे चले आए। श्रीराम नहीं चाहते थे कि प्रजा कष्ट उठाए, इसलिए उन्होंने रात में गुप्त रूप से तमसा नदी पार की और फिर श्रृंगवेरपुर पहुँचे। वहाँ निषादराज गुह ने उनकी बड़ी सेवा-सत्कार की। इसके बाद वे गंगा पार कर प्रयाग क्षेत्र में पहुँचे।
भरद्वाज ऋषि का आश्रम
श्रीराम सबसे पहले महर्षि भरद्वाज के आश्रम पहुंचे, जो संगम के निकट था। भरद्वाज मुनि ने तीनों का खूब सत्कार किया। जब राम ने उनसे पूछा कि हम वन में कहाँ निवास करें, तो भरद्वाज मुनि ने कहा- “दस कोस दूर चित्रकूट पर्वत है। वह स्थान बड़ा रमणीय और ऋषि-मुनियों से भरा हुआ है। वहीं निवास करो।” श्रीराम ने मुनि को प्रणाम किया और चित्रकूट की ओर प्रस्थान कर दिया।
चित्रकूट में प्रवास
चित्रकूट पहुँचकर श्रीराम ने मंदाकिनी नदी के तट पर एक सुंदर परणकुटी बनाई। यहीं उन्हें सूचना मिली कि भरत अयोध्या की राजगद्दी नहीं चाहते और राम को वापस लाने आए हैं। भरत और राम की चित्रकूट में बड़ी मार्मिक भेंट हुई। राम ने भरत को समझाया कि पिता का वचन सर्वोपरि है। भरत ने राम की खड़ाऊँ लेकर अयोध्या लौटने का निश्चय किया और नंदीग्राम में रहकर 14 वर्ष राज्य चलाने लगे।
चित्रकूट में ही इंद्र-पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारी। क्रोधित राम ने ब्रह्मास्त्र से उसका पीछा किया। अंत में जयंत ने क्षमा माँगी तो राम ने उसकी एक आँख फोड़ दी। साथ ही चित्रकूट में ही विराध राक्षस का वध हुआ। विराध ने सीता का हरण करने की कोशिश की थी, किंतु राम-लक्ष्मण ने मिलकर उसका संहार कर दिया।
महर्षि अत्रि-अनसूया से भेंट
चित्रकूट में ही अत्रि ऋषि के आश्रम गए। वहाँ माता अनसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी और उन्हें दिव्य वस्त्र-आभूषण भेंट किए।
चित्रकूट छोड़ने का कारण
कुछ समय बाद चित्रकूट में बहुत सारे ऋषि-मुनि आने लगे। इससे स्थान पर बहुत चहल-पहल हो गई। साथ ही खर-दूषण जैसे राक्षस वहाँ के ऋषियों को सताने लगे। राम समझ गए कि अब यहाँ रहना उचित नहीं, इसलिए वे चित्रकूट छोड़कर दंडकारण्य की ओर चल पड़े।
ऋषि अगस्त्य से भेंट
दंडकारण्य में प्रवेश करते ही श्रीराम सबसे पहले महर्षि अगस्त्य के आश्रम पहुँचे। अगस्त्य मुनि दक्षिण भारत के सबसे बड़े तपस्वी थे। उन्होंने ही वातापि और इल्वल राक्षसों का संहार किया था।
जब राम ने उनसे निवास-स्थान पूछा तो अगस्त्य मुनि ने कहा: -“हे राम! यहाँ से दो योजन दूर गोदावरी नदी के तट पर पंचवटी नाम का अत्यंत रमणीय स्थान है। वहाँ अनेक पवित्र वृक्ष हैं – अश्वत्थ, प्लक्ष, बट, बेल और आम। वहाँ वन्य पशु-पक्षी भी बहुत हैं। तुम वहाँ निवास करो। वह स्थान मेरे आश्रम से भी निकट है।
इसी प्रकार अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को विष्णु का दिया हुआ धनुष, ब्रह्मा का दिया हुआ बाण और इंद्र की दी हुई तलवार भी भेंट की। ऐसे में श्रीराम को पंचवटी जाने की सलाह महर्षि अगस्त्य ने दी थी।
पंचवटी में प्रवास
पंचवटी पहुँचकर राम-लक्ष्मण ने फिर एक सुंदर परणकुटी बनाई। पाँच विशाल वट वृक्षों के बीच यह स्थान था, इसलिए नाम पंचवटी पंचवटी। गोदावरी तट का यह क्षेत्र अत्यंत मनोरम था।
शूर्पणखा प्रसंग
एक दिन शूर्पणखा (रावण की बहन) वहाँ घूमने आई। उसने राम का रूप देखकर मोहित हो गई और विवाह का प्रस्ताव रखा। राम ने हँसते हुए कहा कि मैं पत्नीव्रता हूँ, मेरे भाई लक्ष्मण अविवाहित हैं, उनसे बात करो। लक्ष्मण ने भी टाल दिया। क्रोधित शूर्पणखा ने सीता पर आक्रमण किया। लक्ष्मण ने तुरंत तलवार से उसकी नाक और कान काट दिए।
नाक-कान कटे हुए शूर्पणखा अपने भाई खर-दूषण के पास गई। खर-दूषण ने 14,000 राक्षसों की सेना लेकर पंचवटी पर चढ़ाई की। राम ने अकेले ही सारी राक्षस सेना का संहार कर दिया। खर, दूषण और त्रिशिरा – तीनों बड़े योद्धा मारे गए। यह घटना दंडकारण्य के राक्षसों के लिए बड़ा आघात थी।
रावण को सूचना और स्वर्ण मृग छल
शूर्पणखा लंका पहुँची और रावण को सारी बात बताई। उसने कहा, “भाई! राम की पत्नी सीता अत्यंत सुंदर है। तुम उसे हर लाओ।” रावण पहले तो हँसा, लेकिन मारीच के साथ मिलकर योजना बनाई।
मारीच स्वर्ण मृग बनकर पंचवटी में आया। सीता ने उस मृग को देखकर राम से कहा कि मुझे वह मृग चाहिए। राम मृग के पीछे गए। मृग बहुत दूर ले गया। जब राम ने बाण मारा तो मारीच ने राम की आवाज में “हा सीते! हा लक्ष्मण!” चिल्लाया।
लक्ष्मण को सीता ने बहुत फटकार लगाई और श्रीराम के पास भेज दिया। जैसे ही दोनों भाई गए, रावण साधु वेश में आया और सीता का हरण कर लंका ले गया।
जटायु युद्ध और आगे की यात्रा
रावण जब सीता को ले जा रहा था तो जटायु ने उससे भयंकर युद्ध किया। रावण ने उसके पंख काट दिए। जटायु घायल अवस्था में राम को सारी बात बताकर प्राण त्याग दिए। इसके बाद राम-लक्ष्मण ने कबंध राक्षस का वध किया। कबंध ने मरते-मरते बताया कि पंपा सरोवर के पास ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव रहते हैं, उनसे मित्रता करो।
(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।