Raksha Bandhan 2026: पौराणिक कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचीं। राजा बलि ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उन्हें अपनी अतिथि के रूप में स्थान दिया।
Raksha Bandhan Mythological Story: रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के संकल्प से जुड़ा माना जाता है, लेकिन इससे जुड़ी कई पौराणिक कथाएं ऐसी हैं, जिनमें देवी-देवताओं और भगवान के भक्तों के बीच रक्षा सूत्र के संबंध का वर्णन मिलता है। इन्हीं कथाओं में भगवान विष्णु के वामन अवतार, राजा बलि और माता लक्ष्मी से जुड़ी कथा भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई माना था। इसके बाद राजा बलि ने भी माता लक्ष्मी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और उनकी इच्छा का सम्मान किया।
लेकिन माता लक्ष्मी को राजा बलि को राखी बांधने की आवश्यकता क्यों पड़ी? भगवान विष्णु का राजा बलि के साथ क्या संबंध था और इस पूरी घटना का रक्षाबंधन से क्या संबंध माना जाता है? आइए जानते हैं इस पौराणिक कथा को विस्तार से।
राजा बलि थे भगवान विष्णु के परम भक्त
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा बलि असुरराज प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र थे। वे पराक्रमी, दानी और भगवान विष्णु के भक्त माने जाते थे। अपने पराक्रम और तप के बल पर राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। देवता उनके बढ़ते प्रभाव से चिंतित हो गए और भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया। वामन रूप में भगवान एक छोटे ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंचे। उस समय राजा बलि एक विशाल यज्ञ कर रहे थे और उन्होंने संकल्प लिया था कि यज्ञ में आने वाले किसी भी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं लौटाएंगे। वामन भगवान को देखकर राजा बलि ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और उनसे अपनी इच्छा बताने के लिए कहा। भगवान वामन ने राजा बलि से केवल तीन पग भूमि मांग ली।
राजा बलि ने वामन भगवान की मांग स्वीकार कर ली। इसके बाद भगवान वामन ने अपना विराट रूप धारण कर लिया। उन्होंने पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग लोक को नाप लिया। अब उनके तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा। राजा बलि समझ गए कि उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु हैं। उन्होंने भगवान विष्णु के तीसरे पग के लिए अपना सिर आगे कर दिया। भगवान ने उनके सिर पर अपना तीसरा पग रखा और राजा बलि को पाताल लोक जाने का वरदान मिला।
राजा बलि के द्वारपाल बने भगवान विष्णु
राजा बलि की भक्ति, दानशीलता और वचन निभाने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान मांगने के लिए कहा, जिस पर राजा बलि ने कहा कि भगवान आपने ही मुझे पाताल लोक का राजा बनाया है तो शत्रुओं से मेरे राज्य की रक्षा का दायित्व भी आपका ही है तो मैं चाहता हूं कि आप मेरे साथ पाताल लोक चले और मेरे राज्य की रक्षा करें। इसके बाद भगवान विष्णु ने राजा बलि को वचन दिया कि वे पाताल लोक में उनके साथ रहेंगे और उनकी रक्षा करेंगे। भगवान विष्णु के पाताल लोक में रहने के कारण देवी लक्ष्मी चिंतित हो गईं। भगवान विष्णु के बिना वैकुंठ सूना लगने लगा। माता लक्ष्मी चाहती थीं कि भगवान विष्णु वापस उनके साथ वैकुंठ लौटें, लेकिन राजा बलि को दिया गया वचन भी भगवान विष्णु के लिए महत्वपूर्ण था। ऐसे में माता लक्ष्मी ने एक उपाय किया।
माता लक्ष्मी ने राजा बलि को बांधा रक्षा सूत्र
पौराणिक कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचीं। राजा बलि ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उन्हें अपनी अतिथि के रूप में स्थान दिया। जब राजा बलि ने उस स्त्री से वहां आने का कारण पूछा, तो माता लक्ष्मी ने उन्हें अपना भाई मानते हुए उनके हाथ पर रक्षा सूत्र बांध दिया। इसके बदले राजा बलि ने माता लक्ष्मी से उनकी इच्छा पूछी।
माता लक्ष्मी ने तब अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और बताया कि वे भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी हैं। उन्होंने राजा बलि को बताया कि भगवान विष्णु उनके यहां हैं और वे उन्हें अपने साथ वैकुंठ ले जाना चाहती हैं। राजा बलि यह जानकर समझ गए कि जिस स्त्री ने उन्हें रक्षा सूत्र बांधा है, वह स्वयं माता लक्ष्मी हैं। उन्होंने माता लक्ष्मी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और उनके द्वारा बांधे गए रक्षा सूत्र का सम्मान रखा।
राजा बलि ने माता लक्ष्मी को दिया वचन
राजा बलि भगवान विष्णु के भक्त थे और वे उनके प्रति पूरी श्रद्धा रखते थे। जब माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ वैकुंठ ले जाने की इच्छा व्यक्त की, तो राजा बलि ने उन्हें रोकने के बजाय अपनी बहन के रूप में उनकी इच्छा स्वीकार की। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा बलि ने भगवान विष्णु को माता लक्ष्मी के साथ वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। इस प्रकार रक्षा सूत्र के माध्यम से बना भाई-बहन का संबंध भगवान विष्णु और राजा बलि के संबंध में भी एक महत्वपूर्ण प्रसंग बन गया। माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधी और राजा बलि ने भी भाई के रूप में उनकी इच्छा का सम्मान किया।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)