facebook pixel
विज्ञापन
Home  mythology  ramayana mythoogical story sita swayamvar kyon hua tha janiye janakpur sabha ki pauranik katha

Sita Swayamvar: क्यों हुआ था सीता स्वयंवर? जानें जनकपुर की सभा से जुड़ी पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी साह
सार

Ramayana: सीता बचपन से ही असाधारण थीं। जब वे मात्र आठ-दस वर्ष की थीं, तब एक दिन राजमहल के आंगन में खेलते-खेलते उन्होंने कुछ सहेलियों के साथ मजाक में एक शिव धनुष उठा लिया था।

Ramayana Mythological Story
Ramayana Mythological Story: रामायण की अमर गाथा में सीता स्वयंवर एक ऐसा प्रसंग है, जो न केवल प्रेम, शक्ति और धर्म की परीक्षा का प्रतीक है, बल्कि भारतीय संस्कृति में विवाह की पवित्रता और राजसी परंपराओं को भी दर्शाता है। भगवान राम और मां सीता का मिलन एक स्वयंवर की वजह से हुआ था, जिसे जीतने के बाद भगवान राम का विवाह मां सीता के साथ संपन्न हुआ था, लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर यह स्वयंवर क्यों हुआ? इसके पीछे की कहानी क्या थी? कैसे शुरू हुआ यह पूरा प्रसंग? और स्वयंवर के दौरान क्या-क्या हुआ? आइए, वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों के आधार पर इस पौराणिक कथा को शुरू से समझते हैं...

सीता मां का जन्म

कथा की शुरुआत मिथिला नरेश राजा जनक के राज्य से होती है। जनक एक विद्वान, धर्मात्मा और यज्ञप्रिय राजा थे। वे शिव भक्त थे और उनके राज्य में सुख-शांति थी, लेकिन एक बड़ी चिंता उन्हें सताती थी, क्योंकि उनके राज्या में आकाल पड़ गया था। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार मिथिला में भयंकर अकाल पड़ा। फसलों की कमी और प्रजा की पीड़ा को देखकर राजा जनक अत्यंत दुखी हुए। ऋषियों और मुनियों के परामर्श पर उन्होंने स्वयं एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य भूमि को उपजाऊ बनाना और वर्षा प्राप्त करना था। इस यज्ञ के दौरान राजा जनक ने स्वयं हल जोतकर भूमि की जुताई शुरू की, ताकि वह प्रजा के प्रति अपनी जिम्मेदारी को और गहराई से निभा सकें।

जब राजा जनक हल जोत रहे थे, तभी हल की नोक एक सुनहरे पिटारे से टकराई। उत्सुकतावश जब उन्होंने उस पिटारे को खोला तो उसमें एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी कन्या थी। यह कन्या कोई और नहीं, बल्कि मां सीता थीं। उनकी सुंदरता और दैवीय आभा को देखकर राजा जनक और उनकी पत्नी सुनैना अभिभूत हो गए। उन्होंने इस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उनका नाम सीता रखा, क्योंकि वह सीत से प्रकट हुई थीं।  यह कन्या कोई साधारण बालिका नहीं थी; वह धरती माता की पुत्री थी, जो रावण के अत्याचारों से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए अवतरित हुई थी।  जनक और उनकी पत्नी सुनैना ने सीता को अपनी पुत्री मानकर पाला-पोसा। सीता बचपन से ही असाधारण गुणों वाली थीं – सुंदर, बुद्धिमती, धर्मपरायणा और प्रकृति प्रेमी। वे धरती की पुत्री होने के कारण फसलें उगाने में निपुण थीं और उनके स्पर्श मात्र से भूमि उपजाऊ हो जाती थी।  भगवान विष्णु की आज्ञा से मां लक्ष्मी ने ही सीता के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया था। इसलिए सीता को “भूमिजा” और “जनकी” भी कहा जाता है।
Ramayana Mythological Story

सीता स्वयंवर की प्रतीज्ञा

सीता बचपन से ही असाधारण थीं। जब वे मात्र आठ-दस वर्ष की थीं, तब एक दिन राजमहल के आंगन में खेलते-खेलते उन्होंने कुछ सहेलियों के साथ मजाक में एक शिव धनुष उठाने की कोशिश की। यह वही धनुष था, जो देवासुर संग्राम के समय भगवान शिव ने प्रयोग किया था और बाद में देवराज इंद्र को सौंप दिया था। इंद्र ने इसे भगवान परशुराम को सौंपा था, जिसके बाद परशुराम से ये शिव धनुष राजा जनक को प्राप्त हुआ था।

जब मां सीता ने यह शिव धनुष उठा लिया तो राजा जनक आश्चर्यचकित रह गए कि कैसे एक बालिका ने यह भारी शिव धनुष उठा लिया, जिसे वीर से वीर योद्धा तक भी हिला नहीं सकते थे। उसी समय राजा जनक ने दृढ़ प्रतिज्ञा की- मेरी पुत्री का विवाह उसी पुरुष से होगा जो इस शिव-धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा सके। जो इस धनुष को तोड़ देगा, वही सीता का पति बनेगा। यह शर्त उन्होंने इसलिए, रखी ताकि सीता का पाणिग्रहण कोई साधारण राजकुमार न कर सके, बल्कि ऐसा वीर हो, जो स्वयं भगवान शिव के धनुष को जीत सके। 

सीता जी का विवाह

समय बीतता गया और सीता युवावस्था में प्रवेश कर गईं। अब राजा जनक के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी- सीता का विवाह। जनक नहीं चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह किसी साधारण राजकुमार से हो। वे चाहते थे कि सीता का पति ऐसा वीर हो, जो शिव धनुष को उठा सके और उसकी प्रत्यंचा चढ़ा सके। यह धनुष कोई साधारण धनुष नहीं था। राजा जनक ने स्वयंवर का आयोजन किया।

स्वयंवर की घोषणा पूरे आर्यावर्त में फैला दी गई। जनकपुर में एक विशाल सभा का आयोजन हुआ, जहां राजसी वैभव का प्रदर्शन था। सभा भवन को फूलों, रत्नों और स्वर्ण से सजाया गया। चारों ओर यज्ञशालाएं थीं और वेद मंत्रों की गूंज थी। दूर-दूर से राजकुमार और महारथी आमंत्रित किए गए, लेकिन स्वयंवर से पहले एक महत्वपूर्ण प्रसंग हुआ। विश्वामित्र ऋषि अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण को लेकर मिथिला आए। इससे पहले विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को अयोध्या  से इसलिए साथ लाए थे, क्योंकि उनका उद्देश्य था- ताड़का वध के बाद राक्षसों से यज्ञ की रक्षा करना, जब उनका कार्य पूरा हो गया तो विश्वामित्र राम जी और लक्ष्मण को लेकर मिथिला आ गए।
Ramayana Mythological Story

सीता स्वयंवर की कथा 

राम उस समय मात्र 16 वर्ष के थे, लेकिन उनकी दिव्यता छिपी नहीं थी। वे नीले कमल जैसे नेत्रों वाले, लंबे भुजाओं वाले और शांत स्वभाव के थे। अब स्वयंवर का मुख्य दिन आया। सभा में हजारों राजकुमार एकत्रित थे। बनारस का राजकुमार, मगध का, कौशल का भी, सभी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। सीता सफेद वस्त्रों में दिव्य आभूषणों से सुसज्जित हाथ में वरमाला लिए सभा में प्रवेश करती हैं। उनकी सुंदरता देखकर सभी मुग्ध हो गए। जनक ने औपचारिक रूप से स्वयंवर की घोषणा की। पहले कई राजकुमारों ने धनुष उठाने की कोशिश की, लेकिन कोई इस धनुष को हिला तक नहीं पाया। 

कई राजकुमार धनुष को हिलाने का प्रयास करते हैं, लेकिन असफल रहते हैं। कुछ तो चोटिल हो जाते हैं। अंत में जनक उदास होकर कहते हैं कि क्या पृथ्वी पर कोई वीर नहीं बचा जो यह धनुष तोड़ सके। विश्वामित्र रामजी को इशारा करते हैं। श्रीराम पहले विश्वामित्र का आशीर्वाद लेते है और फिर राजा जनक की आज्ञा लेकर और धनुष की ओर जाते हैं। श्रीराम धनुष को आसानी से उठाते हैं, प्रत्यंचा चढ़ाते हैं और खींचते ही धनुष टूट जाता है। ध्वनि इतनी तेज होती है कि पूरा जनकपूर कांप उठता है।

अचानक 'टंकार' की ध्वनि हुई और धनुष दो टुकड़ों में टूट गया। यह ध्वनि इतनी तेज थी कि पूरे जनकपुर में गूंज गई, आकाश में बादल गरजे और पृथ्वी कांप उठी। जनक आनंदित हो गए, लेकिन परशुराम का क्रोध भड़क उठा। परशुराम भी भगवान विष्णु के अवतार माने जाते थे, वह धनुष टूटने की आवाज सुनकर सभा में पहुंचे। वे क्रोधित थे, क्योंकि यह उनका गुरु शिव का धनुष था। उन्होंने क्रोधित होते हुए पूछा कि किसने शिव धनुष तोड़ा?

वे राम जीसे युद्ध की चुनौती देते हैं और कहते हैं कि तुम यदि सच में वीर हो तो ये वैष्णव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा के दिखाओ, तभी भगवान राम वैष्णव धनुष भी उठा लेते हैं और ये देख भगवान परशुराम परशुराम समझ जाते हैं कि राम विष्णु अवतार हैं और आशीर्वाद देकर चले जाते हैं। अब विवाह की तैयारी शुरू होती है। दशरथ अयोध्या से आते हैं। चार भाइयों का विवाह होता है- राम जी का सीता मां के साथ, लक्ष्मण का उर्मिला से, भरत से मांडवी का और शत्रुघ्न के साथ श्रुतकीर्ति का विवाह होता है। विवाह उत्सव कई दिनों तक चलता है।

यह भी पढ़ें:-

Rishyasringa Story: कौन थे ऋष्यशृंग? जिनके पुत्रकामेष्टि यज्ञ से राजा दशरथ को हुई संतान प्राप्ति? 

Ramayana Story: कैसे और कब हुआ था श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म? जानें पौराणिक कथा 

Lord Ram-Maa Sita: मां सीता से पहली बार कहां मिले थे श्रीराम? पढ़ें स्वयंवर से पहले हुई भेंट की पौराणिक कथा

(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel