Ramayana: यह कथा है ब्रह्मर्षि ऋष्यशृंग की, जिनके सिर पर हिरण के सींग थे, जो जंगल की गोद में पले-बढ़े। इन्हीं ऋष्यशृंग ने अयोध्या के राजा दशरथ के लिए वह पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया था, जिससे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चार पुत्रों का जन्म हुआ।
Ramayana Katha: हिंदू पौराणिक ग्रंथों की गहराइयों में छिपी एक ऐसी कथा है, जो आज भी लोगों के मन में श्रद्धा और आश्चर्य जगाती है। यह कथा है ब्रह्मर्षि ऋष्यशृंग की, जिनके सिर पर हिरण के सींग थे, जो जंगल की गोद में पले-बढ़े, जिन्होंने जीवन में कभी स्त्री का मुख नहीं देखा था और फिर भी एक राजकुमारी के प्रेम में बंधकर गृहस्थ बने, लेकिन उनकी असली पहचान यही नहीं, बल्कि यह है कि इन्हीं ऋष्यशृंग ने अयोध्या के राजा दशरथ के लिए वह पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया था, जिससे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चार पुत्रों का जन्म हुआ। यह कहानी केवल एक यज्ञ की नहीं, बल्कि तप, प्रलोभन, छल, विवाह, अकाल और दैवीय कृपा की पूरी श्रृंखला है। आइए जानते हैं कि आखिर कौन थे ऋष्यशृंग, जिन्होंने राजा दशरथ के लिए करवाया था पुत्रकामेष्टि यज्ञ...
महर्षि विभांडक से ऋष्यशृंग का जन्म
कथा की शुरुआत होती है महर्षि विभांडक से। विभांडक महर्षि कश्यप के पुत्र थे और घोर तपस्वी। वे वन में एकांतवास करते थे, जहां न कोई मनुष्य आता था, न कोई शोर। एक दिन वे सरोवर में स्नान कर रहे थे, तभी अप्सरा उर्वशी जलक्रीड़ा कर रही थीं। उनकी अलौकिक सुंदरता देखकर विभांडक के मन में कामवासना जागृत हुई और अनायास ही उनका वीर्यपात हो गया। उसी समय एक हिरणी जल पीने आई। उसने विभांडक का वीर्य पी लिया। हिरणी गर्भवती हुई और समय आने पर उसने एक मानव शिशु को जन्म दिया, लेकिन शिशु के सिर पर हिरण के सींग थे, इसलिए उसका नाम पड़ा ऋष्यशृंग- ऋषि का शृंग यानी हिरण का सींग।
अंगदेश में अकाल और ऋष्यशृंग का यज्ञ
विभांडक ने बच्चे को गोद लिया और वन में ही पाला। ऋष्यशृंग को कभी स्त्री का दर्शन नहीं हुआ। वे केवल पिता के साथ वेदपाठ, तप और ब्रह्मचर्य में डूबे रहे। उनके लिए दुनिया सिर्फ आश्रम, वृक्ष, पशु और पिता तक सीमित थी। इधर अंग देश में राजा रोमपाद राज्य करते थे। रोमपाद राजा दशरथ के घनिष्ठ मित्र थे, लेकिन एक बार रोमपाद ने ब्राह्मणों का अपमान कर दिया। फलस्वरूप देवराज इंद्र रुष्ट हो गए और अंग देश में भयंकर अकाल पड़ गया। वर्षा बंद हो गई, नदियां सूखने लगीं, फसलें मर गईं, प्रजा भूख से तड़प रही थी। राजा के पुरोहितों ने ज्योतिष और शास्त्र देखकर बताया कि अकाल का कारण राजा का ब्राह्मण अपमान है। इसे दूर करने का एकमात्र उपाय है कि वन में रहने वाले पुण्यवान ऋषि ऋष्यशृंग को राजधानी लाया जाए। उनके चरण स्पर्श मात्र से इंद्र प्रसन्न होकर वर्षा करेंगे, लेकिन समस्या यह थी कि ऋष्यशृंग जंगल में रहते थे और स्त्री का नाम तक नहीं जानते थे। उन्हें लाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। सैनिक भेजने से डर था कि ऋषि क्रोधित हो जाएंगे।
राजा रोमपाद की पुत्री थी शांता। शांता वास्तव में राजा दशरथ की बड़ी बहन थीं, जिन्हें दशरथ ने गोद लिया था और बाद में रोमपाद को दे दिया था। शांता अत्यंत सुंदर, बुद्धिमती और साहसी थीं। राजा ने शांता को बुलाया और सारी बात बताई। उन्होंने कहा कि तुम्हें नर्तकी का वेश धारण करके ऋष्यशृंग को राजधानी लाना होगा। शांता सहमत हो गईं। वे रंग-बिरंगे वस्त्र पहनीं, आभूषणों से सजीं, सुगंध लगाईं और नौका पर सवार होकर ऋष्यशृंग के आश्रम के निकट सरोवर पर पहुंचीं। वहां वे नृत्य करने लगीं, मधुर गीत गाने लगीं। उनकी आवाज जंगल में गूंज रही थी।
शांता से ऋष्यशृंग का विवाह
ऋष्यशृंग आश्रम से बाहर निकले और आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने जीवन में पहली बार स्त्री देखी। उनके मन में उत्सुकता जागी। वे सोचने लगे कि यह क्या सुंदर प्राणी है। पिता ने तो कहा था कि केवल पुरुष और पशु ही होते हैं। शांता ने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं आपके आश्रम की सेविका हूं। मेरे पिता ने मुझे आपके दर्शन के लिए भेजा है। चलिए, मेरे साथ मेरे पिता के पास। ऋष्यशृंग मोहित हो गए। वे शांता के साथ नौका पर सवार होकर अंग देश की राजधानी चंपा पहुंच गए। जैसे ही उनका पैर राजधानी में पड़ा, आकाश में मेघ गरजे और मुसलाधार वर्षा होने लगी। अकाल समाप्त हो गया। प्रजा ने उत्सव मनाया। राजा रोमपाद ने ऋष्यशृंग का भव्य स्वागत किया और शांता का विवाह उनसे कर दिया।
ऋष्यशृंग वे शांता के साथ सुखी दांपत्य जीवन जीने लगे, साथ ही तप और वेदपाठ करते थे। राजा दशरथ की बेटी शांता तो सुखी जीवन जी रही थी, लेकिन राजा दशरथ और उनकी तीनों रानियां दुखी थी, क्योंकि उनका कोई पुत्र नहीं था और उन्हें इस बात की चिंता थी कि उनका उत्तराधिकारी कौन बनेगा। राजा दशरथ चिंतित थे कि कुल की निरंतरता कैसे बनी रहेगी। उनके गुरु वसिष्ठ ने सलाह दी कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करना होगा और इसे केवल ऋष्यशृंग ही करवा सकते हैं। दशरथ स्वयं अंग देश गए। रोमपाद और ऋष्यशृंग ने उनका स्वागत किया। दशरथ ने विनम्रता से कहा कि मुनिवर, मेरे कुल की रक्षा आप ही कर सकते हैं। कृपया अयोध्या चलकर यज्ञ करें। ऋष्यशृंग सहर्ष तैयार हो गए। वे शांता सहित अयोध्या पहुंचे।
राजा दशरथ के लिए करवाया पुत्रकामेष्टि यज्ञ
अयोध्या में भव्य यज्ञशाला बनाई गई। ऋष्यशृंग और शांता ने यज्ञ की अगुवाई की। हवन कुंड अश्वमेध यज्ञ की भस्म से बनाया गया। देवताओं का आवाहन किया गया– अग्नि, इंद्र, ब्रह्मा सभी। मंत्रोच्चार से वातावरण गूंज उठा। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, यज्ञ पूर्ण होने के बाद, भगवान अग्नि स्वयं यज्ञ की अग्नि से प्रकट हुए और उनके हाथों में खीर के दो पात्र थे। राजा दशरथ ने दोनों पात्र अपनी तीनों रानियों- कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा में बांट दिए। कौशल्या ने एक पात्र का आधा भाग खाया और सुमित्रा ने शेष भाग खा लिया। वहीं कैकेयी ने दूसरे पात्र का आधा भाग खाया और सुमित्रा ने शेष भाग खा लिया। खीर खाने के कुछ दिनों बाद, कौशल्या से भगवान राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।
ऋष्यशृंग ने दशरथ से कहा कि महाराज, आपके पुत्र विश्वविजेता होंगे। राम तो स्वयं विष्णु अवतार हैं। यज्ञ के बाद ऋष्यशृंग अयोध्या में ही रहे। उन्होंने राम की शिक्षा-दीक्षा में भी योगदान दिया। कुछ ग्रंथों में कहा गया है कि वे राम के राज्याभिषेक तक जीवित रहे। अंत में वे शांता सहित हिमालय चले गए और तपस्या में लीन होकर ब्रह्मलोक प्राप्त किए।
(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)