Ramayana Mythological Story: हिंदू धर्म का महान महाकाव्य रामायण भगवान श्रीराम की गाथा का प्रमाण देता है। श्रीराम को भगवान विष्णु का सातवां अवतार माना गया है। रामायण में श्रीराम और उनके तीनों भाइयों- भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के जन्म की कथा न केवल एक परिवार की कहानी है, बल्कि धर्म, कर्म, भक्ति और दैवीय योजना का प्रतीक है। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में वर्णित इस कथा के अनुसार, ये चारों भाई इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ की संतान थे, जिनका जन्म एक यज्ञ के फलस्वरूप हुआ। यह कथा देवताओं की प्रार्थना से शुरू होकर पुत्र प्राप्ति के यज्ञ तक की है। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर कैसे हुआ था श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म...
भगवान विष्णु ने क्यों लिया श्रीराम का अवतार
कथा की जड़ें त्रेता युग में हैं, जब लंका का राजा रावण अपने असीम बल और वरदानों से तीनों लोकों में आतंक मचा रहा था। रावण को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि वह देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व या किसी भी जीव से नहीं मारा जा सकेगा, सिवाय मनुष्य और वानर के। इस वरदान के बल पर रावण ने इंद्रलोक पर आक्रमण किया, देवताओं को पराजित किया और अपनी बहन शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ा दिए।
देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में गए। वैकुंठ में सभी देवता, ब्रह्मा और शिव सहित, विष्णु से प्रार्थना करने लगे। उन्होंने कहा- हे नारायण, रावण का अंत करने के लिए आपको धरती पर अवतरित होना होगा। रावण ने मनुष्य को तुच्छ प्राणी समझा था, इसलिए उसने वरदान में मनुष्य को शामिल नहीं किया था, इसलिए उसका वध मनुष्य के हाथों संभव था, जिसके लिए भगवान विष्णु ने मनुष्य का अवतार लिया, जो श्रीराम बने। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने कहा था- मैं राजा दशरथ के यहां चार पुत्रों के रूप में अवतार लूंगा। मैं राम बनूंगा, और मेरे अंश भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न होंगे।" यह दैवीय योजना थी, जो आगे चलकर रामायण की आधारशिला बनी।
राजा दशरथ को कैसे हुई संतान की प्राप्ति
भगवान विष्णु को श्रीराम के रूप में राजा दशरथ के घर में जन्म लेना था, लेकिन अब प्रश्न था कि दशरथ जैसे पुण्यवान राजा को पुत्र कैसे प्राप्त होंगे? इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ अयोध्या के शासक थे। वे पराक्रमी, धर्मनिष्ठ और प्रजापालक थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पीड़ा थी- संतान का न होना। दशरथ की तीन रानियां थीं- कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। कौशल्या सबसे बड़ी और सबसे प्रिय थीं, कैकेयी युद्धकुशल और सुंदर, जबकि सुमित्रा सेवा भाव वाली। वर्षों बीत गए, लेकिन कोई संतान नहीं हुई। राजा को उत्तराधिकारी की चिंता सताने लगी। प्रजा भी चिंतित थी, क्योंकि बिना उत्तराधिकारी के राज्य अस्थिर हो सकता था।
दशरथ ने कई यज्ञ किए, तपस्या की, लेकिन सफलता नहीं मिली। एक दिन, उनके गुरु वशिष्ठ और अन्य ऋषियों ने सलाह दी कि पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाएं। यह यज्ञ महर्षि ऋष्यशृंग द्वारा संपन्न होता है, जो कामदेव पर विजय प्राप्त कर चुके थे और यज्ञ की सफलता सुनिश्चित करते थे। दशरथ ने ऋष्यशृंग को आमंत्रित किया। ऋष्यशृंग विभांडक ऋषि के पुत्र थे और अंग देश के राजा रोमपाद की दत्तक पुत्री थे और राजा दशरथ की पुत्री शांता के पति थे। ऐसे में ऋष्यशृंग राजा दशरथ के दमाद थे।
पुत्रकामेष्टि यज्ञ का आयोजन
ऋंग ऋषि एक पवित्र आत्मा वाले संत थे, और जहां भी उनका पैर पड़ता था, वहां यश और कीर्ति फैल जाती थी। दशरथ के मंत्री सुमंत ने उन्हें मुख्य पुजारी बनने का अनुरोध किया। दशरथ ने यज्ञ आयोजित करने का आदेश दिया। शुरू में ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से मना कर दिया, लेकिन शांता के समझाने पर वे राजा दशरथ के लिए पुत्र प्राप्ति यज्ञ करने को राजी हो गए। अयोध्या में एक शानदार यज्ञशाला तैयार की गई। ऋष्यशृंग और शांता ने यज्ञ का नेतृत्व किया। हवन कुंड अश्वमेध यज्ञ की राख से बनाया गया। देवताओं को बुलाया गया- अग्नि, इंद्र, ब्रह्मा सभी देवताओं को बुलाया गया। मंत्रों के उच्चारण से पूरा वातावरण गूंज उठा।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, यज्ञ पूरा होने पर भगवान अग्नि खुद यज्ञाग्नि से प्रकट हुए, और उनके हाथों में खीर के दो कटोरी थी। राजा दशरथ ने दोनों बर्तन अपनी तीन रानियों- कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा में बांट दिए। कौशल्या ने एक बर्तन का आधा हिस्सा खाया और सुमित्रा ने बचा हुआ हिस्सा। इसी तरह कैकेयी ने दूसरे बर्तन का आधा हिस्सा खाया और सुमित्रा ने शेष हिस्सा। खीर खाने के कुछ दिनों बाद तीनों रानियों ने गर्भ ठहर लिया। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, जब पुनर्वसु नक्षत्र था और सूर्य, मंगल, शनि, बृहस्पति तथा शुक्र अपने उच्च स्थानों में थे, कर्क लग्न उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ। वह शिशु नीले रंग का, चुंबक जैसे आकर्षक, बेहद तेजस्वी, अत्यंत सुंदर और दिव्य था। उसे देखने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
इसके बाद शुभ नक्षत्रों और मुहूर्त में महारानी कैकेयी को एक पुत्र और सुमित्रा को दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। पूरे राज्य में खुशियां मनाई जाने लगीं। राजा के चार पुत्रों के जन्म के उत्सव में गंधर्व गीत गाने लगे और अप्सराएं नाचने लगीं। देवता अपने विमानों में सवार होकर फूल बरसाने लगे। महाराज ने खुलकर दान दिया- राजद्वार पर आए भाटों, चारणों, आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को। प्रजा को धन-धान्य और दरबारियों को रत्न-आभूषण बांटे गए। चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ ने किया और उनके नाम रामचंद्र, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न रखे गए।
कहा जाता है कि पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाने वाले का सारा जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में समाप्त हो जाता है। इसी पुण्य के बदले राजा दशरथ को पुत्र प्राप्त हुए। दशरथ ने ऋंग ऋषि को यज्ञ कराने के एवज में ढेर सारा धन दिया, जिससे उनके बेटे-बेटियों का पालन-पोषण हुआ। यज्ञ से मिली खीर से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। ऋंग ऋषि फिर से पुण्य कमाने के लिए जंगल में तपस्या करने चले गए। मान्यता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश आगे चलकर सेंगर राजपूत बना, जिन्हें ऋंगवंशी राजपूत कहा जाता है।
किस तिथि में हुआ श्रीराम का जन्म
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र में दोपहर के समय हुआ। यह राम नवमी के रूप में मनाया जाता है। अन्य भाइयों का जन्म उसी दिन या अगले दिन माना जाता है, लेकिन थोड़े अंतराल में माना जाता है। सबसे पहले राम का जन्म हुआ। कौशल्या के गर्भ से भगवान विष्णु का पूर्ण अवतार राम प्रकट हुए।
भरत का जन्म
राम के जन्म के कुछ क्षण बाद या अगले दिन कैकेयी के गर्भ से भरत का जन्म हुआ। भरत विष्णु के शंख का अंश थे। उनका रूप भी दिव्य था- सुंदर, बलवान। भरत के नाम का अर्थ था- पालन करने वाला।
लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म