Ramayana Mythological Story: रामायण में माता सीता का दूसरा वनवास सबसे मार्मिक और चर्चित प्रसंगों में से एक माना जाता है। लंका विजय के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ, तब कुछ समय तक सब कुछ शांतिपूर्ण रहा। किंतु बाद में प्रजा के बीच उठे संदेह और सामाजिक चर्चा के कारण ऐसी परिस्थिति बनी कि श्रीराम को अत्यंत कठिन निर्णय लेना पड़ा। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह वनवास किसी दंड के रूप में नहीं, बल्कि राजधर्म और लोकमत के कारण दिया गया था। वाल्मीकि रामायण और अन्य रामायण परंपराओं में इस प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसमें बताया गया है कि माता सीता उस समय गर्भवती थीं और उन्हें महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहना पड़ा, जहां बाद में लव और कुश का जन्म हुआ। आइए जानते हैं यह पूरी पौराणिक कथा...
अयोध्या लौटने के बाद की स्थिति
रावण वध के पश्चात माता सीता ने अग्नि परीक्षा देकर अपनी पवित्रता सिद्ध की थी। इसके बाद भगवान श्रीराम उन्हें साथ लेकर अयोध्या लौटे। अयोध्या में उनका भव्य स्वागत हुआ और श्रीराम का राज्याभिषेक संपन्न हुआ। कुछ समय तक राज्य सुखपूर्वक चलता रहा, किंतु एक दिन श्रीराम को ज्ञात हुआ कि नगर में कुछ लोग सीता के लंका में रहने को लेकर चर्चा कर रहे हैं। प्रजा के एक वर्ग के मन में यह प्रश्न उठ रहा था कि जो स्त्री लंबे समय तक रावण की कैद में रही हो, उसे राजमहल में स्थान दिया जाना उचित है या नहीं।
धोबी के कथन का प्रसंग
पौराणिक कथा के अनुसार एक धोबी ने अपनी पत्नी से विवाद के दौरान कहा कि वह श्रीराम की तरह नहीं है, जो पराए घर में रही पत्नी को स्वीकार कर ले। यह बात नगर में फैल गई। जब श्रीराम तक यह समाचार पहुंचा तो वे अत्यंत दुखी हुए। श्रीराम जानते थे कि सीता पूर्णतः पवित्र हैं और उन्होंने अग्नि परीक्षा भी दी है, किंतु एक राजा के रूप में उन्हें प्रजा की भावना और राज्य की मर्यादा का भी विचार करना था। यही कारण था कि वे गहरे द्वंद्व में पड़ गए।
श्रीराम का कठिन निर्णय
राजसभा में इस विषय पर विचार करने के बाद श्रीराम ने अत्यंत भारी मन से निर्णय लिया कि सीता को वन में भेज दिया जाए। उन्होंने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को आदेश दिया कि वे माता सीता को ऋषियों के आश्रम के निकट छोड़ आएं। उस समय माता सीता गर्भवती थीं। लक्ष्मण जब उन्हें वन की ओर ले जा रहे थे, तब मां सीता को प्रारंभ में यह ज्ञात नहीं था कि उन्हें वापस नहीं लाया जाएगा। जब लक्ष्मण ने श्रीराम का संदेश सुनाया तो वे अत्यंत व्यथित हुईं, किंतु उन्होंने पति के निर्णय का विरोध नहीं किया।
महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आगमन
वन में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। वाल्मीकि ने दिव्य दृष्टि से संपूर्ण घटना को जान लिया और माता सीता को आश्रय प्रदान किया। आश्रम में ऋषि-पत्नियों और तपस्विनियों ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया। यहीं पर माता सीता ने अपने शेष वनवास का समय बिताया। वाल्मीकि ने उन्हें सुरक्षा और सम्मान दिया तथा उनके रहने की व्यवस्था की।
लव और कुश का जन्म
कुछ समय बाद माता सीता ने जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया। महर्षि वाल्मीकि ने उनका नाम लव और कुश रखा। दोनों राजकुमार आश्रम में ही बड़े हुए। वाल्मीकि ने उन्हें वेद, शास्त्र, धनुर्विद्या और नीति का ज्ञान दिया। इसी आश्रम में उन्होंने रामकथा का भी अध्ययन किया। बाद में लव और कुश ने ही अयोध्या में श्रीराम के समक्ष रामायण का गायन किया था।
अश्वमेध यज्ञ और पुनः भेंट
वर्षों बाद श्रीराम ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के दौरान छोड़े गए अश्व को लव और कुश ने रोक लिया। इसके कारण अयोध्या की सेना और दोनों बालकों के बीच युद्ध हुआ। बाद में महर्षि वाल्मीकि के माध्यम से यह स्पष्ट हुआ कि लव और कुश श्रीराम और सीता के पुत्र हैं। इसके बाद माता सीता को सभा में बुलाया गया ताकि वे पुनः अपनी पवित्रता की पुष्टि करें।
माता सीता का अंतिम निर्णय
सभा में माता सीता ने पृथ्वी देवी का आह्वान करते हुए कहा कि यदि उन्होंने जीवन भर मन, वचन और कर्म से केवल श्रीराम का ही स्मरण किया है तो पृथ्वी उन्हें अपने भीतर स्थान दे। पौराणिक कथा के अनुसार पृथ्वी फटी और दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ। पृथ्वी देवी माता सीता को अपने साथ लेकर धरती में समा गईं। इस प्रकार माता सीता का पृथ्वी में विलय हो गया और उनका वनवास समाप्त हुआ।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)