Ramayana Mythological Story: रामायण में मां सीता की खोज का प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जब रावण माता सीता का हरण कर उन्हें लंका ले गया, तब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण उनकी खोज में वन-वन भटकते रहे। इसी क्रम में वानरराज सुग्रीव की सहायता से एक विशाल वानर सेना का गठन किया गया और सीता की खोज के लिए अलग-अलग दिशाओं में दल भेजे गए। दक्षिण दिशा में अंगद, जाम्बवान, हनुमान और अन्य वीर वानर गए। जब उन्हें कहीं भी माता सीता का पता नहीं चला, तब संपाती नामक वृद्ध गिद्ध ने ऐसा रहस्य बताया जिसने पूरी खोज का मार्ग बदल दिया और हनुमान जी को लंका की ओर प्रस्थान करने की प्रेरणा मिली।
संपाती कौन थे?
संपाती और जटायु दोनों अरुण के पुत्र थे। जटायु वही महान गिद्ध थे जिन्होंने माता सीता की रक्षा के लिए रावण से युद्ध किया था। संपाती जटायु के बड़े भाई थे। युवावस्था में दोनों भाइयों में अत्यंत प्रेम था। एक बार वे सूर्य के समीप तक उड़ने की प्रतिस्पर्धा करने लगे। जटायु सूर्य की प्रचंड तपन सहन नहीं कर पाए, तब संपाती ने अपने पंख फैलाकर उन्हें बचा लिया। सूर्य की तीव्र गर्मी से संपाती के पंख जल गए और वे उड़ने की शक्ति खो बैठे। इसके बाद वे समुद्र तट के समीप एक पर्वत पर रहने लगे।
वानर दल की निराशा
दक्षिण दिशा में खोज करते हुए अंगद, हनुमान, जाम्बवान और अन्य वानर अत्यंत थक चुके थे। समय सीमा समाप्त होने वाली थी और माता सीता का कोई समाचार नहीं मिला था। सभी वानर समुद्र तट पर बैठकर चिंतित हो गए। अंगद ने कहा कि यदि वे बिना समाचार के लौटे तो सुग्रीव दंड देंगे। निराशा इतनी बढ़ गई कि कई वानरों ने वहीं प्राण त्यागने का विचार कर लिया। उसी समय समीप के पर्वत पर रहने वाले वृद्ध गिद्ध संपाती ने उनकी बातचीत सुनी। उन्होंने जटायु का नाम सुना तो वे चौंक उठे और वानरों से पूछा कि उनके भाई जटायु का क्या हुआ।
जटायु का समाचार सुनकर संपाती का शोक
हनुमान और अंगद ने संपाती को बताया कि रावण माता सीता का हरण करके ले जा रहा था। जटायु ने वीरतापूर्वक उसका मार्ग रोका और भयंकर युद्ध किया, किंतु अंततः रावण ने उनके पंख काट दिए। बाद में भगवान श्रीराम को जटायु मिले और उन्होंने अंतिम समय में सीता हरण का समाचार देकर प्राण त्याग दिए। अपने भाई के बलिदान का समाचार सुनकर संपाती अत्यंत दुःखी हुए। उन्होंने जटायु के प्रति श्रद्धा व्यक्त की और कहा कि उनका भाई धर्म की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
संपाती ने कैसे बताया माता सीता का पता?
संपाती के पास दिव्य दृष्टि थी। यद्यपि वे उड़ नहीं सकते थे, किंतु दूरस्थ स्थानों को देखने की शक्ति उनमें विद्यमान थी। उन्होंने समुद्र के पार दृष्टि डाली और वानरों से कहा कि वे स्पष्ट रूप से लंका नगरी को देख रहे हैं। उन्होंने बताया कि रावण ने माता सीता को लंका में अशोक वाटिका में रखा हुआ है।
संपाती ने वानरों से कहा- मैं अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा हूँ कि जनकनंदिनी सीता समुद्र के उस पार लंका में अशोक वाटिका में बैठी हैं। वे श्रीराम का स्मरण कर रही हैं और राक्षसियों से घिरी हुई हैं।” यह सुनते ही वानर दल में उत्साह की लहर दौड़ गई। अब पहली बार उन्हें निश्चित रूप से पता चल गया कि माता सीता कहाँ हैं।
हनुमान जी को मिला लंका जाने का मार्ग
संपाती ने केवल सीता का स्थान ही नहीं बताया, बल्कि समुद्र की दूरी भी बताई। उन्होंने कहा कि लंका लगभग सौ योजन दूर समुद्र के पार स्थित है। यह सुनकर सभी वानर विचार करने लगे कि इतनी विशाल दूरी को कौन पार कर सकता है। अंगद ने अपनी क्षमता बताई, किंतु लौट आने को लेकर संदेह व्यक्त किया। तब जाम्बवान ने हनुमान जी को उनकी वास्तविक शक्ति का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि हनुमान वायुपुत्र हैं और असाधारण बल एवं वेग के स्वामी हैं। संपाती द्वारा दी गई सूचना ने ही वह आधार प्रदान किया जिसके बाद हनुमान जी ने समुद्र लांघने का संकल्प लिया। यदि संपाती माता सीता का स्थान न बताते, तो वानर दल को आगे की दिशा स्पष्ट नहीं हो पाती।
संपाती के पंखों की पुनर्प्राप्ति
वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब संपाती ने श्रीराम के कार्य में सहायता की, तब उन्हें पूर्व में प्राप्त एक वरदान स्मरण आया। ऋषियों ने कहा था कि जब वे रामकाज में सहयोग करेंगे, तब उन्हें पुनः बल प्राप्त होगा। माता सीता का समाचार देकर उन्होंने धर्म का कार्य किया। इसके पश्चात उनके जले हुए पंखों में फिर से शक्ति आने लगी और वे प्रसन्न हो उठे।
हनुमान जी का महासंकल्प
संपाती की बात सुनने के बाद जाम्बवान ने हनुमान जी का उत्साह बढ़ाया, तब हनुमान जी ने अपने विशाल स्वरूप का प्रदर्शन किया और महेंद्र पर्वत पर चढ़कर समुद्र लांघने की तैयारी की। उन्होंने श्रीराम का स्मरण किया और लंका की ओर प्रस्थान किया। यही वह क्षण था जब सीता खोज अभियान को निर्णायक दिशा मिली। संपाती की सूचना के कारण हनुमान जी सीधे लंका पहुँचे, अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन किए और श्रीराम की मुद्रिका उन्हें सौंपकर उनका संदेश प्राप्त किया।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)