Ramayana Mythological Story: रामायण में माता सीता की अग्नि परीक्षा का प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण और चर्चित माना जाता है। यह घटना उस समय की है जब भगवान श्रीराम ने लंका में रावण का वध कर धर्म की स्थापना की थी। रावण के पराजित होने के बाद जब माता सीता को अशोक वाटिका से श्रीराम के समक्ष लाया गया, तब उनके पवित्र चरित्र को लेकर अग्नि परीक्षा का प्रसंग सामने आया। वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण और रामचरितमानस में इस प्रसंग का उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार अग्नि परीक्षा का उद्देश्य माता सीता की निष्कलंक पवित्रता को समस्त लोकों के सामने प्रमाणित करना था।
रावण द्वारा सीता हरण
वनवास के दौरान पंचवटी में रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण कर लिया था। वह उन्हें लंका ले गया और अशोक वाटिका में रख दिया। रावण ने अनेक बार माता सीता को अपने महल में आने के लिए कहा, लेकिन माता सीता ने श्रीराम के प्रति अपनी अटूट निष्ठा बनाए रखी। उन्होंने रावण के सभी प्रस्ताव अस्वीकार कर दिए और केवल श्रीराम का स्मरण करती रहीं।
लंका विजय और सीता का आगमन
हनुमान जी के माध्यम से श्रीराम को माता सीता का समाचार मिला। इसके बाद वानर सेना के साथ श्रीराम ने समुद्र पर सेतु बनाकर लंका पर चढ़ाई की। भीषण युद्ध के बाद रावण का वध हुआ। विजय प्राप्त करने के पश्चात श्रीराम ने विभीषण से माता सीता को सम्मानपूर्वक अपने समक्ष लाने को कहा।
जब माता सीता श्रीराम के समक्ष पहुँचीं, तब श्रीराम ने कहा कि उन्होंने रावण का वध अपने कुल की मर्यादा और धर्म की रक्षा के लिए किया है। चूँकि माता सीता लंबे समय तक रावण की लंका में रहीं, इसलिए संसार में किसी प्रकार का संशय न रहे, इस कारण उनकी पवित्रता का प्रमाण आवश्यक है।
अग्नि परीक्षा का निर्णय
श्रीराम के वचन सुनकर माता सीता अत्यंत व्यथित हुईं। उन्होंने लक्ष्मण जी से अग्निकुंड तैयार करने को कहा। माता सीता ने देवताओं, पृथ्वी और समस्त लोकों को साक्षी मानकर कहा कि यदि उन्होंने मन, वचन और कर्म से केवल श्रीराम का ही स्मरण किया है और कभी किसी अन्य पुरुष का चिंतन नहीं किया, तो अग्नि देव उनकी रक्षा करें। इसके बाद माता सीता निर्भय होकर प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गईं। यह दृश्य देखकर वानर सेना, विभीषण और अन्य सभी उपस्थित लोग स्तब्ध रह गए।
अग्निदेव का प्रकट होना
कुछ ही क्षणों बाद अग्निदेव स्वयं प्रकट हुए। उन्होंने माता सीता को अपने साथ अग्नि से बाहर लाकर श्रीराम को सौंप दिया। अग्निदेव ने कहा कि माता सीता पूर्णतः पवित्र, निष्कलंक और धर्मपरायण हैं। उन्होंने रावण के महल में रहते हुए भी अपने पतिव्रत धर्म का तनिक भी उल्लंघन नहीं किया। अग्निदेव ने श्रीराम से कहा कि माता सीता के चरित्र में किसी प्रकार का दोष नहीं है और उन्हें आदरपूर्वक स्वीकार करना चाहिए।
श्रीराम का उत्तर
अग्निदेव के वचन सुनकर श्रीराम ने कहा कि उन्हें माता सीता की पवित्रता पर कभी संदेह नहीं था। वे जानते थे कि सीता सूर्य की किरणों की भाँति निर्मल हैं। किंतु वे चाहते थे कि समस्त संसार के सामने उनकी निष्कलंकता प्रमाणित हो जाए, ताकि भविष्य में कोई भी उनके चरित्र पर प्रश्न न उठा सके। इसके बाद श्रीराम ने माता सीता को सम्मानपूर्वक अपने साथ स्वीकार किया। देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और श्रीराम-सीता की पुनर्मिलन लीला का उत्सव मनाया।
अध्यात्म रामायण में वर्णित माया सीता की कथा
अध्यात्म रामायण में इस प्रसंग का एक विशेष वर्णन मिलता है। इसके अनुसार जब रावण सीता हरण करने आया था, तब वास्तविक माता सीता को अग्निदेव की शरण में सुरक्षित रखा गया था और उनकी स्थान पर एक “माया सीता” रावण के साथ गई थी।
रावण ने जिस सीता का हरण किया, वह वास्तविक सीता नहीं थीं। रावण वध के बाद अग्नि परीक्षा के समय माया सीता अग्नि में प्रवेश कर गईं और अग्निदेव ने वास्तविक माता सीता को बाहर लाकर श्रीराम को सौंप दिया। इस प्रकार अग्नि परीक्षा वास्तविक सीता की पुनः प्राप्ति का भी माध्यम बनी।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)