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Ramayana: कौन थी मायावी राक्षसी सिंहिका, जिसका हनुमान जी ने किया था संहार?

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ramayana: सुंदरकांड के अनुसार सिंहिका समुद्र में रहने वाली एक मायावी राक्षसी थी। उसे यह वरदान प्राप्त था कि वह किसी भी उड़ते हुए प्राणी की छाया को पकड़ सकती थी।

Ramayana
Ramayana: रामायण में हनुमान जी की समुद्र लांघकर लंका तक पहुंचने की यात्रा कई अद्भुत घटनाओं से भरी हुई है। इस यात्रा के दौरान उन्हें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा, जिनमें एक थी मायावी राक्षसी सिंहिका। वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में वर्णित यह प्रसंग हनुमान जी के पराक्रम और बुद्धिमत्ता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। सिंहिका ऐसी राक्षसी थी, जो आकाश में उड़ते हुए प्राणियों की छाया पकड़कर उन्हें अपनी ओर खींच लेती थी। जब हनुमान जी मां सीता की खोज में लंका जा रहे थे, तब इसी मायावी शक्ति के कारण उनका सामना सिंहिका से हुआ और अंततः हनुमान जी ने उसका संहार किया।

समुद्र लांघते समय आई बाधा

सुग्रीव के आदेश पर जब हनुमान जी सीता माता की खोज में दक्षिण दिशा की ओर निकले, तब वे महेंद्र पर्वत से विशाल रूप धारण करके समुद्र के ऊपर उड़ चले। मार्ग में सबसे पहले उनका सामना नागमाता सुरसा से हुआ। सुरसा की परीक्षा में सफल होने के बाद वे आगे बढ़े। कुछ दूर जाने पर उन्हें अनुभव हुआ कि उनकी गति अचानक धीमी पड़ रही है। वे अत्यंत वेग से उड़ रहे थे, फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें रोक रही हो। हनुमान जी ने नीचे समुद्र की ओर दृष्टि डाली तो उन्होंने एक विकराल राक्षसी को देखा, जिसकी आंखें लाल थीं और मुख अत्यंत भयावह था। वही सिंहिका थी।

कौन थी सिंहिका?

सुंदरकांड के अनुसार सिंहिका समुद्र में रहने वाली एक मायावी राक्षसी थी। उसे यह वरदान प्राप्त था कि वह किसी भी उड़ते हुए प्राणी की छाया को पकड़ सकती थी। जैसे ही किसी की छाया उसके अधिकार में आती, वह उस प्राणी को अपनी ओर खींच लेती थी। इस शक्ति के कारण आकाश में उड़ने वाले पक्षी, गंधर्व, नाग और अन्य जीव उससे भयभीत रहते थे। जब हनुमान जी समुद्र के ऊपर से उड़ रहे थे, तब सिंहिका ने उनकी विशाल छाया देखी और उसे पकड़ लिया। परिणामस्वरूप हनुमान जी की गति रुक गई।

हनुमान जी ने कैसे पहचाना?

हनुमान जी ने तुरंत समझ लिया कि यह कोई सामान्य बाधा नहीं है। उन्हें सुग्रीव द्वारा कही गई बात स्मरण हुई कि समुद्र में एक ऐसी राक्षसी रहती है जो छाया पकड़कर यात्रियों को रोक लेती है। उन्होंने अनुमान लगा लिया कि यह वही सिंहिका है। सिंहिका ने अपना विशाल मुख खोल दिया और हनुमान जी को निगलने का प्रयास करने लगी। उसका मुख पर्वत के समान बड़ा हो गया। हनुमान जी ने भी अपना आकार बढ़ा लिया, जिससे सिंहिका ने अपना मुख और अधिक फैला लिया।

मायावी युद्ध का आरंभ

सिंहिका सोच रही थी कि वह हनुमान जी को निगलकर अपना आहार बना लेगी। लेकिन हनुमान जी ने अपनी बुद्धि और बल का अद्भुत परिचय दिया। जब सिंहिका का मुख अत्यधिक बड़ा हो गया, तब हनुमान जी अचानक सूक्ष्म रूप धारण करके उसके मुख में प्रवेश कर गए। राक्षसी को लगा कि उसने हनुमान जी को निगल लिया है, किंतु अगले ही क्षण हनुमान जी ने उसके भीतर अपने तीक्ष्ण नखों और बलशाली भुजाओं से उसके हृदय और प्राणस्थलों पर प्रहार किया।

सिंहिका का संहार

हनुमान जी ने सिंहिका के शरीर को भीतर से क्षत-विक्षत कर दिया। उसके प्राण निकल गए और वह समुद्र में गिर पड़ी। तत्पश्चात हनुमान जी तुरंत उसके मुख से बाहर निकल आए और पुनः आकाश मार्ग से लंका की ओर बढ़ गए। वाल्मीकि रामायण में वर्णित है कि सिंहिका का वध होते ही समुद्र के निवासी देवता, सिद्ध, चारण और गंधर्व अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने हनुमान जी की वीरता की प्रशंसा की और उन्हें सीता की खोज में सफलता का आशीर्वाद दिया।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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