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Ramayana: लंका विजय से पहले श्रीराम ने क्यों की थी देवी दुर्गा की पूजा? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ramayana: श्रीराम ने समुद्र तट पर देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा आरंभ करने का निश्चय किया। पूजा के लिए 108 नीलकमलों की आवश्यकता बताई गई।

Ramayana Mythological Story
Ramayana Mythological Story: लंका विजय का प्रसंग रामायण का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। जब श्रीराम माता सीता की खोज करते हुए वानर सेना के साथ समुद्र पार करके लंका पहुंचने की तैयारी कर रहे थे, तब रावण जैसा बलशाली और मायावी शत्रु उनके सामने था। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी समय देवताओं के आग्रह पर श्रीराम ने आदिशक्ति देवी दुर्गा की उपासना की थी। इस पूजा को “अकाल बोधन” कहा जाता है, क्योंकि देवी दुर्गा की आराधना सामान्यतः वसंत ऋतु में की जाती थी, जबकि श्रीराम ने आश्विन मास में उनका आवाहन किया। यह कथा विशेष रूप से देवी भागवत, कालिका पुराण तथा बंगाल की दुर्गा पूजा परंपराओं में वर्णित मिलती है। मान्यता है कि देवी की कृपा प्राप्त करने के बाद ही श्रीराम ने रावण के विरुद्ध निर्णायक युद्ध प्रारंभ किया और अंततः विजय प्राप्त की।

देवताओं की चिंता और ब्रह्मा का सुझाव

जब रावण के अत्याचारों से तीनों लोक पीड़ित थे, तब देवताओं ने ब्रह्मा से निवेदन किया कि श्रीराम की विजय सुनिश्चित करने का उपाय बताया जाए। ब्रह्मा ने कहा कि रावण को पराजित करने के लिए आदिशक्ति भगवती दुर्गा की आराधना आवश्यक है। उन्होंने श्रीराम से कहा कि वे देवी का विधिपूर्वक पूजन करें, क्योंकि वही समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं और उनकी कृपा से असंभव कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं। श्रीराम ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार की और देवी की पूजा का संकल्प लिया।

अकाल बोधन की तैयारी

श्रीराम ने समुद्र तट पर देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा आरंभ करने का निश्चय किया। पूजा के लिए 108 नीलकमलों की आवश्यकता बताई गई। हनुमान सहित वानर वीर विभिन्न दिशाओं में जाकर दुर्लभ नीलकमल एकत्र करने लगे। बड़ी कठिनाई के बाद 108 कमल जुटाए गए और पूजा का मंडप तैयार किया गया। शास्त्रीय विधि से कलश स्थापना, मंत्रोच्चार, हवन और देवी स्तुति प्रारंभ हुई। श्रीराम पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवती का आवाहन कर रहे थे।

एक नीलकमल कम पड़ गया

पूजा के अंतिम चरण में जब कमलों की गणना की गई तो पता चला कि 108 में से एक कमल कम है। पौराणिक कथा के अनुसार देवी स्वयं श्रीराम की भक्ति की परीक्षा लेना चाहती थीं, इसलिए एक कमल अदृश्य हो गया। श्रीराम को “कमलनयन” कहा जाता है। उन्होंने सोचा कि यदि एक कमल कम है तो वे अपना एक नेत्र देवी को अर्पित कर देंगे, क्योंकि उनका नेत्र भी कमल के समान माना जाता है। उन्होंने धनुष की नोक से अपना नेत्र निकालने का संकल्प लिया और देवी के चरणों में अर्पित करने के लिए तैयार हो गए।

देवी दुर्गा का प्रकट होना

जैसे ही श्रीराम अपना नेत्र अर्पित करने लगे, उसी क्षण देवी दुर्गा प्रकट हो गईं। उन्होंने श्रीराम का हाथ पकड़ लिया और कहा कि उनकी भक्ति से वे अत्यंत प्रसन्न हैं। देवी ने श्रीराम को आशीर्वाद देते हुए कहा कि वे रावण पर निश्चित रूप से विजय प्राप्त करेंगे। भगवती ने यह भी कहा कि देवताओं के कल्याण और धर्म की रक्षा के लिए उनका यह अभियान सफल होगा। देवी के आशीर्वाद से श्रीराम की पूजा पूर्ण हुई और समस्त देवगण प्रसन्न हो उठे।

नवमी और विजय का संबंध

पौराणिक कथा के अनुसार श्रीराम ने आश्विन शुक्ल षष्ठी से नवमी तक देवी की आराधना की। नवमी के दिन देवी ने उन्हें विजय का वर प्रदान किया और दशमी के दिन रावण का वध हुआ। इसी कारण दशहरा या विजयादशमी को धर्म की विजय का पर्व माना जाता है।

रावण के विरुद्ध युद्ध

देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद श्रीराम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की। युद्ध कई दिनों तक चला। मेघनाद, कुंभकर्ण और रावण के अन्य पराक्रमी योद्धा युद्धभूमि में उतरे। अंततः दशमी के दिन श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से रावण का वध किया। पौराणिक परंपरा में माना जाता है कि देवी दुर्गा की कृपा से ही रावण की मायावी शक्तियां निष्प्रभावी हुईं और श्रीराम को विजय प्राप्त हुई।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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