विज्ञापन
Home  mythology  mahabharat  mahabharata takshak naag ne raja parikshit ko kyon dasa tha janiye shrap se mrityu tak ki pauranik katha

Mahabharata: तक्षक नाग ने राजा परीक्षित को क्यों डसा था? जानें श्राप से मृत्यु तक की पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata: महाभारत युद्ध के अंतिम चरण में जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चलाकर उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु को नष्ट करने का प्रयास किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य प्रभाव से गर्भस्थ बालक की रक्षा की। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित कहलाया। 

Mahabharata
Mahabharata: महाभारत के युद्ध के बाद हस्तिनापुर पर शासन करने वाले राजा परीक्षित का अंत किसी युद्ध में नहीं, बल्कि एक ऋषि के श्राप और नागराज तक्षक के दंश से हुआ था। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार यह घटना एक ऐसी भूल से शुरू हुई, जो वन में शिकार के दौरान राजा से अनजाने में हो गई। ऋषि शमीक के अपमान से क्रोधित उनके पुत्र श्रृंगी ने राजा को सातवें दिन तक्षक नाग के दंश से मृत्यु का श्राप दे दिया। इसके बाद श्राप से बचने के लिए राजा ने हर संभव प्रयास किए, लेकिन नियति के अनुसार सातवें दिन नागराज तक्षक ने अपनी योजना से राजमहल में प्रवेश किया और श्राप को पूर्ण कर दिया। आइए जानते हैं कि आखिर राजा परीक्षित से ऐसी कौन-सी भूल हुई थी, श्रृंगी ऋषि ने उन्हें श्राप क्यों दिया और तक्षक नाग ने किस प्रकार राजा तक पहुंचकर इस श्राप को पूर्ण किया।

राजा परीक्षित कौन थे?

राजा परीक्षित महाभारत के महान योद्धा अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे। अभिमन्यु, अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र थे। महाभारत युद्ध के अंतिम चरण में जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चलाकर उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु को नष्ट करने का प्रयास किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य प्रभाव से गर्भस्थ बालक की रक्षा की। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित कहलाया। महाभारत युद्ध के बाद जब पांडवों ने राज्य त्यागकर हिमालय की ओर प्रस्थान किया, तब हस्तिनापुर का राजसिंहासन राजा परीक्षित को सौंप दिया गया। वे धर्मनिष्ठ, पराक्रमी और प्रजा का पालन करने वाले राजा माने जाते थे।

शिकार के दौरान घटी घटना

एक दिन राजा परीक्षित वन में शिकार खेलने के लिए निकले। लंबे समय तक जंगल में घूमने के कारण उन्हें अत्यधिक प्यास और थकान महसूस होने लगी। उसी समय उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया, जहां महान तपस्वी ऋषि शमीक गहन समाधि में लीन थे। राजा ने आश्रम में प्रवेश कर ऋषि से जल की याचना की और कई बार उनसे संवाद करने का प्रयास किया, लेकिन समाधि में होने के कारण ऋषि शमीक ने कोई उत्तर नहीं दिया। राजा परीक्षित ने इसे अपना अपमान समझ लिया। क्रोध में आकर उन्होंने पास में पड़ा एक मरा हुआ सर्प धनुष की नोक से उठाया और उसे ऋषि शमीक के गले में डाल दिया। इसके बाद वे वहां से चले गए। ऋषि शमीक को इस घटना का कोई ज्ञान नहीं था, क्योंकि वे समाधि में ही लीन थे।

श्रंगी ऋषि ने दिया कठोर श्राप

कुछ समय बाद ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी ऋषि को यह घटना ज्ञात हुई। वे उस समय युवा थे और कठोर तप के कारण तेजस्वी माने जाते थे। जब उन्होंने सुना कि हस्तिनापुर के राजा ने उनके पिता का अपमान किया है तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। क्रोधावेश में उन्होंने जल लेकर संकल्प किया और श्राप दिया कि जिसने उनके पिता के गले में मृत सर्प डाला है, उसे आज से सातवें दिन नागराज तक्षक डसेंगे और उसी विष से उसकी मृत्यु होगी। श्राप देने के बाद जब ऋषि शमीक को पूरी बात पता चली तो उन्होंने अपने पुत्र को समझाया कि राजा ने भूल अवश्य की थी, लेकिन क्रोध में इतना कठोर श्राप देना उचित नहीं था। उन्होंने कहा कि राजा प्रजा का रक्षक होता है और क्षमा धर्म का सर्वोच्च स्वरूप है। हालांकि, एक बार दिया गया श्राप वापस नहीं लिया जा सकता था।

राजा परीक्षित को श्राप का समाचार कैसे मिला?

ऋषि शमीक ने अपने एक शिष्य को हस्तिनापुर भेजा ताकि राजा परीक्षित को श्राप की सूचना समय रहते मिल जाए। जब राजा को यह समाचार मिला, तब उन्हें अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। उन्होंने स्वीकार किया कि क्रोध में उनसे एक अनुचित कार्य हो गया था। श्राप को जानने के बाद राजा ने अपनी सुरक्षा के व्यापक प्रबंध करवाए। उन्होंने एक ऊंचा और सुरक्षित महल बनवाया, जहां केवल विश्वसनीय लोगों को ही प्रवेश की अनुमति थी। चारों ओर सर्पों से रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की गई। विद्वान ब्राह्मणों, मंत्रविदों और वैद्यों को भी बुलाया गया, ताकि किसी भी प्रकार से नागदंश का प्रभाव रोका जा सके।

सात दिनों तक चला भागवत श्रवण

श्राप मिलने के बाद राजा परीक्षित ने यह निश्चय किया कि जीवन के अंतिम सात दिनों का उपयोग धर्मश्रवण में करेंगे। इसी समय महान ब्रह्मज्ञानी महर्षि शुकदेव उनके पास पहुंचे। राजा परीक्षित ने उनसे जीवन, मृत्यु, धर्म, भगवान विष्णु और मोक्ष से जुड़े प्रश्न पूछे, तब महर्षि शुकदेव ने उन्हें सात दिनों तक श्रीमद्भागवत महापुराण का विस्तृत उपदेश दिया। इसी सात दिवसीय भागवत कथा का उल्लेख भागवत महापुराण में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। कथा के सातवें दिन तक राजा निरंतर भगवान के गुणों और लीलाओं का श्रवण करते रहे।

तक्षक नाग ने मृत्यु का संकल्प कैसे पूरा किया?

सातवां दिन आते-आते राजा की सुरक्षा पहले से भी अधिक कड़ी कर दी गई थी। महल के चारों ओर सैनिक तैनात थे और किसी भी अपरिचित व्यक्ति को भीतर जाने की अनुमति नहीं थी। उसी समय नागराज तक्षक राजा तक पहुंचने के लिए निकल पड़े। मार्ग में उनकी भेंट महर्षि कश्यप से हुई। कश्यप ऋषि नागविष का उपचार करने की अद्भुत विद्या जानते थे और राजा परीक्षित को बचाने के उद्देश्य से हस्तिनापुर जा रहे थे। तक्षक ने उनकी शक्ति की परीक्षा लेने के लिए एक विशाल वृक्ष को अपने विष से तुरंत भस्म कर दिया। महर्षि कश्यप ने अपनी विद्या के प्रभाव से उसी वृक्ष को पुनः जीवित कर दिया। इससे तक्षक समझ गया कि यदि कश्यप राजा तक पहुंच गए तो उनका विष निष्फल हो सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार, तक्षक ने महर्षि कश्यप को अत्यधिक धन देकर वापस लौटने के लिए राजी कर लिया। कश्यप ने विचार किया कि राजा की आयु अब श्राप के अनुसार पूर्ण हो चुकी है और ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध जाना संभव नहीं है। इसके बाद वे वापस लौट गए।

फलों की टोकरी में पहुंचा तक्षक

राजा परीक्षित के महल में बाहरी लोगों का प्रवेश लगभग असंभव था। तब तक्षक ने एक नई योजना बनाई। भागवत महापुराण के अनुसार, कुछ ब्राह्मणों के वेश में लोग राजा के लिए फल लेकर पहुंचे। सुरक्षा जांच के बाद वे फल महल के भीतर पहुंचा दिए गए। उन फलों में से एक फल के भीतर तक्षक अत्यंत छोटे कीट का रूप धारण करके छिपा हुआ था।

जब राजा परीक्षित ने उस फल को हाथ में लिया और उसे काटा, तभी उसमें से छोटा कीट बाहर निकला। देखते ही देखते उसने अपना वास्तविक स्वरूप धारण कर लिया। वह स्वयं नागराज तक्षक था। तक्षक ने तत्काल राजा परीक्षित को डस लिया। उसके विष का प्रभाव इतना प्रबल था कि कुछ ही क्षणों में राजा का शरीर अग्नि के समान जल उठा और उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार श्रृंगी ऋषि का सातवें दिन तक्षक के दंश से मृत्यु का श्राप पूर्ण हुआ।

 
यह भी पढ़ें:- 

Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 

Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 

Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel