Mahabharata: महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि इसमें अनेक ऐसे प्रसंग भी वर्णित हैं जिन्होंने आगे चलकर पूरे कुरुवंश के इतिहास की दिशा बदल दी। इन्हीं महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है महाराज धृतराष्ट्र का जन्म। महाभारत के अनुसार धृतराष्ट्र जन्म से ही नेत्रहीन थे और इसके पीछे एक अत्यंत रोचक तथा पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि यह स्थिति माता अंबिका द्वारा एक विशेष क्षण में की गई भूल के कारण उत्पन्न हुई थी। यह प्रसंग महाभारत के आदि पर्व में इसका वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं कि आखिर वह कौन-सी घटना थी, जिसके कारण धृतराष्ट्र जन्म से ही नेत्रहीन हुए।
कुरुवंश पर आया उत्तराधिकारी का संकट
हस्तिनापुर के राजा शांतनु के दो पुत्र थे- चित्रांगद और विचित्रवीर्य। चित्रांगद का निधन युद्ध में हो गया। इसके बाद विचित्रवीर्य हस्तिनापुर के राजा बने। भीष्म पितामह काशी नरेश की तीन पुत्रियों- अंबा, अंबिका और अंबालिका का स्वयंवर से हरण कर उन्हें हस्तिनापुर ले आए। अंबा ने शाल्वराज से प्रेम होने की बात कही, इसलिए उन्हें जाने दिया गया, जबकि अंबिका और अंबालिका का विवाह विचित्रवीर्य से संपन्न हुआ। कुछ समय बाद राजा विचित्रवीर्य का असमय निधन हो गया। उनकी कोई संतान नहीं थी। इससे पूरे कुरुवंश पर उत्तराधिकारी का संकट उत्पन्न हो गया। हस्तिनापुर जैसे विशाल साम्राज्य के लिए यह अत्यंत गंभीर स्थिति थी।
सत्यवती की चिंता बढ़ी
राजवंश को संतानहीन होते देखकर महारानी सत्यवती अत्यंत चिंतित हुईं। उन्होंने सबसे पहले भीष्म से आग्रह किया कि वे अपनी प्रतिज्ञा त्यागकर वंश वृद्धि करें, लेकिन भीष्म ने अपने आजीवन ब्रह्मचर्य के व्रत का पालन करते हुए इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, तब सत्यवती ने अपने पुत्र महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास को स्मरण किया। महर्षि वेदव्यास, महर्षि पराशर और सत्यवती के पुत्र थे। सत्यवती ने उन्हें हस्तिनापुर बुलाकर कुरुवंश की स्थिति बताई और नियोग की प्रथा के अनुसार विचित्रवीर्य की रानियों से संतान उत्पन्न करने का आग्रह किया।
महर्षि वेदव्यास ने माता की आज्ञा स्वीकार कर ली, लेकिन उन्होंने पहले ही बता दिया कि वे वर्षों की कठोर तपस्या से आए हैं। उनका स्वरूप सामान्य राजपुरुषों जैसा नहीं था। उनके शरीर पर वृक्ष की छाल के वस्त्र, बड़ी जटाएं, लंबी दाढ़ी और कठोर तप का तेज था। उन्होंने कहा कि जो भी रानी उनके सामने आए, उसे बिना भय और बिना विकार के उनका सामना करना होगा।
महर्षि वेदव्यास के पास सबसे पहले अंबिका पहुंचीं
सत्यवती ने सबसे पहले बड़ी रानी अंबिका को महर्षि वेदव्यास के पास भेजा। जब अंबिका ने महर्षि का तेजस्वी और तपस्वी स्वरूप देखा तो वे अत्यंत भयभीत हो गईं। उन्होंने ऐसा व्यक्तित्व पहले कभी नहीं देखा था। भय के कारण उन्होंने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं। महर्षि वेदव्यास के सामने रहते हुए भी उन्होंने अपनी आंखें नहीं खोलीं। महर्षि वेदव्यास ने बिना कुछ कहे उस समय ही समझ लिया कि अंबिका भय और संकोच से भर गई हैं।
महर्षि वेदव्यास ने क्या भविष्यवाणी की?
अंबिका के लौटने के बाद सत्यवती ने महर्षि वेदव्यास से होने वाली संतान के विषय में पूछा। महर्षि ने कहा कि अंबिका ने भयवश अपनी आंखें बंद कर ली थीं, इसलिए उनके गर्भ से जो पुत्र जन्म लेगा, वह अत्यंत पराक्रमी और बलवान होगा, लेकिन जन्म से नेत्रहीन रहेगा, क्योंकि उसकी माता ने उनके दर्शन नहीं किए। महर्षि के यह वचन सुनकर सत्यवती चिंतित हो गईं। उन्हें लगा कि हस्तिनापुर के भावी उत्तराधिकारी का नेत्रहीन होना राज्य के लिए कठिनाई का कारण बन सकता है।
धृतराष्ट्र का जन्म
समय आने पर अंबिका ने एक पुत्र को जन्म दिया। वही आगे चलकर धृतराष्ट्र कहलाए। महाभारत में धृतराष्ट्र का वर्णन अत्यंत बलशाली राजकुमार के रूप में मिलता है। कहा गया है कि उनमें हजार हाथियों के समान बल था। वे शास्त्रों के ज्ञाता भी थे, लेकिन जन्म से नेत्रहीन होने के कारण उनके जीवन की दिशा अन्य राजकुमारों से भिन्न रही।
अंबालिका के पास गए महर्षि वेदव्यास
धृतराष्ट्र के जन्म के संबंध में भविष्यवाणी सुनने के बाद सत्यवती ने चाहा कि कुरुवंश को एक ऐसा उत्तराधिकारी भी मिले जो पूर्णतः स्वस्थ हो, इसलिए उन्होंने महर्षि वेदव्यास से अंबालिका के पास जाने का अनुरोध किया। जब अंबालिका ने भी महर्षि वेदव्यास का तपस्वी स्वरूप देखा तो वे भय से कांप उठीं। हालांकि उन्होंने आंखें बंद नहीं कीं, लेकिन उनका चेहरा भय के कारण पीला पड़ गया। महर्षि वेदव्यास ने सत्यवती से कहा कि इस रानी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र का वर्ण पीला होगा। समय आने पर अंबालिका ने पांडु को जन्म दिया। उनके शरीर का वर्ण पीला होने के कारण उनका नाम पांडु पड़ा।
अंबिका ने स्वयं जाने के स्थान पर दासी को भेज दिया