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Mahabharata: महाभारत में किसने की थी चक्रव्यूह की रचना? जो बना अभिमन्यु के वध की वजह

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata: महाभारत के अनुसार चक्रव्यूह की रचना के प्रमुख ज्ञाता और निर्माता आचार्य द्रोणाचार्य थे। वे केवल कौरवों के सेनापति ही नहीं, बल्कि उस समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्विद्या आचार्य और युद्धनीति के महान विशेषज्ञ भी थे। 

Mahabharata
Mahabharata: महाभारत का युद्ध केवल अस्त्र-शस्त्रों का संघर्ष नहीं था, बल्कि युद्धनीति, रणनीति और दिव्य सैन्य-व्यूहों का भी अद्भुत संग्राम था। इन्हीं युद्धनीतियों में सबसे रहस्यमयी और कठिन मानी जाने वाली रचना थी चक्रव्यूह। महाभारत में चक्रव्यूह का नाम आते ही सबसे पहले अभिमन्यु का स्मरण होता है, जिन्होंने कम आयु में अद्भुत वीरता का परिचय देते हुए इस दुर्जेय व्यूह में प्रवेश किया था। हालांकि, चक्रव्यूह की कथा केवल अभिमन्यु तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक लंबा पौराणिक प्रसंग, महान आचार्यों की युद्धविद्या और कुरुक्षेत्र के युद्ध की जटिल रणनीति जुड़ी हुई है।

महाभारत के अनुसार चक्रव्यूह का निर्माण किसी साधारण योद्धा के वश की बात नहीं थी। यह ऐसी युद्धरचना थी, जिसे केवल कुछ ही महायोद्धा बनाना और भेदना जानते थे। आखिर इस चक्रव्यूह की रचना किसने की थी, इसे बनाने का उद्देश्य क्या था और कैसे यह महाभारत के सबसे मार्मिक प्रसंग का कारण बना, आइए जानते हैं इस पौराणिक कथा को...

क्या था चक्रव्यूह?

चक्रव्यूह एक अत्यंत जटिल और गतिशील युद्धरचना थी। इसका आकार घूमते हुए चक्र की भांति माना गया है। इसमें सैनिकों, रथों, हाथियों और घुड़सवारों को कई परतों में इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता था कि जैसे-जैसे कोई योद्धा भीतर प्रवेश करता, व्यूह की बाहरी परतें पुनः बंद हो जाती थीं। परिणामस्वरूप भीतर पहुंचने वाला योद्धा अकेला पड़ जाता और चारों ओर से शत्रुओं से घिर जाता।

महाभारत में वर्णित है कि इस व्यूह की प्रत्येक परत में अलग-अलग महारथियों को नियुक्त किया जाता था। वे लगातार अपनी स्थिति बदलते रहते थे, जिससे व्यूह को भेदना अत्यंत कठिन हो जाता था। केवल प्रवेश करना ही पर्याप्त नहीं था, बल्कि प्रत्येक परत को पार करते हुए अंत तक पहुंचना और फिर सुरक्षित बाहर निकलना भी उतना ही कठिन कार्य माना जाता था।

चक्रव्यूह की रचना किसने की थी?

महाभारत के अनुसार चक्रव्यूह की रचना के प्रमुख ज्ञाता और निर्माता आचार्य द्रोणाचार्य थे। वे केवल कौरवों के सेनापति ही नहीं, बल्कि उस समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्विद्या आचार्य और युद्धनीति के महान विशेषज्ञ भी थे। अनेक दिव्य अस्त्रों के साथ-साथ जटिल सैन्य-व्यूहों की रचना और संचालन में भी उन्हें अद्वितीय महारत प्राप्त थी।

जब भी युद्ध में विशेष परिस्थिति उत्पन्न होती, द्रोणाचार्य अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर विभिन्न प्रकार के व्यूहों का निर्माण करते थे। इनमें गरुड़ व्यूह, मकर व्यूह, पद्म व्यूह, सर्प व्यूह और चक्रव्यूह प्रमुख माने गए हैं। इनमें सबसे कठिन और दुर्जेय चक्रव्यूह को माना जाता था। महाभारत के युद्ध के तेरहवें दिन द्रोणाचार्य ने इसी चक्रव्यूह की रचना की थी। उनका उद्देश्य था कि पांडव सेना को भ्रमित कर उसे अलग-अलग भागों में बांट दिया जाए और उस दिन किसी एक प्रमुख पांडव योद्धा को बंदी बनाया जा सके।

द्रोणाचार्य ने तेरहवें दिन ही चक्रव्यूह क्यों बनाया?

भीष्म पितामह के शरशय्या पर चले जाने के बाद कौरव सेना की कमान द्रोणाचार्य को सौंपी गई। सेनापति बनने के बाद दुर्योधन ने उनसे स्पष्ट कहा कि वे किसी भी प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर को बंदी बनाकर उसके सामने प्रस्तुत करें। दुर्योधन का विश्वास था कि यदि युधिष्ठिर बंदी बना लिए गए, तो पांडवों की सेना का मनोबल टूट जाएगा और युद्ध समाप्त हो जाएगा। द्रोणाचार्य जानते थे कि जब तक अर्जुन युद्धभूमि में उपस्थित हैं, तब तक युधिष्ठिर को पकड़ना लगभग असंभव है। इसलिए उन्होंने एक योजना बनाई।

उसी दिन त्रिगर्त देश के राजा सुशर्मा और उनके सहयोगी अर्जुन को युद्धभूमि से दूर ले जाने के लिए युद्ध का आह्वान करते हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ उनका सामना करने चले जाते हैं। इसी अवसर का लाभ उठाकर द्रोणाचार्य चक्रव्यूह की रचना करते हैं। उनका विचार था कि अर्जुन के अभाव में पांडव सेना इस व्यूह को नहीं भेद पाएगी और युधिष्ठिर तक पहुंचना आसान हो जाएगा।

चक्रव्यूह को भेदने की विद्या किन-किन को ज्ञात थी?

महाभारत में उल्लेख मिलता है कि चक्रव्यूह का संपूर्ण ज्ञान बहुत कम योद्धाओं को था। सबसे पहले स्वयं द्रोणाचार्य इस विद्या के पूर्ण ज्ञाता थे। उनके अतिरिक्त अर्जुन इस व्यूह में प्रवेश करने और सुरक्षित बाहर निकलने की पूरी विधि जानते थे। श्रीकृष्ण भी इस युद्धरचना के रहस्यों से परिचित थे।

महाभारत के कुछ वर्णनों में भीष्म पितामह और कर्ण को भी जटिल व्यूहों का ज्ञान प्राप्त बताया गया है, किंतु युद्ध के तेरहवें दिन भीष्म युद्ध से बाहर हो चुके थे और चक्रव्यूह का संचालन पूरी तरह द्रोणाचार्य के हाथों में था। पांडव पक्ष में अर्जुन के अतिरिक्त ऐसा कोई योद्धा नहीं था जो इस व्यूह को पूर्ण रूप से भेदने की कला जानता हो।

अभिमन्यु को चक्रव्यूह का ज्ञान कैसे मिला?

महाभारत की सबसे प्रसिद्ध कथा अभिमन्यु और चक्रव्यूह से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार जब सुभद्रा गर्भवती थीं, तब एक दिन अर्जुन उन्हें विभिन्न युद्धव्यूहों का रहस्य बता रहे थे। उसी समय गर्भ में स्थित अभिमन्यु भी इन बातों को सुन रहे थे। अर्जुन ने चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि विस्तार से बताई। अभिमन्यु ने गर्भ में रहते हुए वह ज्ञान ग्रहण कर लिया, लेकिन जैसे ही अर्जुन व्यूह से बाहर निकलने की प्रक्रिया समझाने लगे, उसी समय सुभद्रा को नींद आ गई। अर्जुन ने समझा कि सुभद्रा सो चुकी हैं, इसलिए उन्होंने आगे का वर्णन बंद कर दिया। इस प्रकार अभिमन्यु को चक्रव्यूह में प्रवेश करने का ज्ञान तो प्राप्त हुआ, लेकिन उससे बाहर निकलने की विधि ज्ञात नहीं हो सकी।

जब पांडवों के सामने खड़ी हुई सबसे बड़ी चुनौती

तेरहवें दिन जब द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की, तब पांडव सेना के सामने गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। युधिष्ठिर ने देखा कि अर्जुन युद्धभूमि में उपस्थित नहीं हैं और यदि चक्रव्यूह को नहीं तोड़ा गया तो कौरव सेना भारी विनाश कर सकती है। ऐसी स्थिति में अभिमन्यु आगे आए। उन्होंने बताया कि वे चक्रव्यूह में प्रवेश करना जानते हैं, किंतु बाहर निकलने की विधि उन्हें ज्ञात नहीं है। युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव और अन्य महारथियों ने आश्वासन दिया कि वे अभिमन्यु के पीछे-पीछे व्यूह में प्रवेश करेंगे और उन्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे।

जयद्रथ ने कैसे बदल दी पूरी युद्धस्थिति?

जैसे ही अभिमन्यु ने चक्रव्यूह का पहला द्वार भेदा, पांडव सेना उनके पीछे बढ़ी। लेकिन उसी समय सिंधु नरेश जयद्रथ ने मार्ग रोक लिया। महाभारत में वर्णित है कि जयद्रथ को भगवान शिव से ऐसा वरदान प्राप्त था कि वह एक दिन के लिए अर्जुन को छोड़कर शेष सभी पांडवों को रोक सकता था। उसी वरदान के प्रभाव से उसने भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव और अन्य योद्धाओं को व्यूह में प्रवेश नहीं करने दिया। फलस्वरूप अभिमन्यु अकेले ही चक्रव्यूह के भीतर पहुंच गए।

चक्रव्यूह के भीतर अभिमन्यु का अद्भुत पराक्रम

व्यूह के भीतर पहुंचने के बाद अभिमन्यु ने अप्रतिम वीरता दिखाई। उन्होंने अनेक महारथियों का सामना किया और कौरव सेना में भारी हाहाकार मचा दिया। महाभारत के अनुसार उन्होंने अनेक राजाओं, रथियों और योद्धाओं को परास्त किया। उनके पराक्रम से दुर्योधन स्वयं भी संकट में पड़ गया। कई बार कौरव सेना की व्यवस्था पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई। अभिमन्यु अकेले होते हुए भी द्रोणाचार्य, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, दुर्योधन और अन्य महारथियों के बीच निर्भीक होकर युद्ध करते रहे।

कैसे टूटा अभिमन्यु का रथ?

लगातार युद्ध करते-करते अभिमन्यु का रथ क्षतिग्रस्त हो गया। उनके घोड़े मारे गए, सारथी गिर पड़ा और धनुष भी काट दिया गया। इसके बाद उन्होंने तलवार और ढाल से युद्ध किया। जब तलवार भी टूट गई तो उन्होंने रथ का पहिया उठाकर शत्रुओं का सामना किया। अंत में गदा लेकर भी उन्होंने युद्ध जारी रखा। महाभारत के अनुसार अनेक महारथियों ने एक साथ मिलकर उन पर आक्रमण किया। अंततः वे वीरगति को प्राप्त हुए।

चक्रव्यूह की रचना ने युद्ध की दिशा कैसे बदल दी?

अभिमन्यु की वीरगति के बाद पांडवों में गहरा शोक और आक्रोश फैल गया। जब अर्जुन को इस घटना का समाचार मिला तो उन्होंने प्रतिज्ञा की कि अगले दिन सूर्यास्त से पहले वे जयद्रथ का वध करेंगे, अन्यथा स्वयं अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग देंगे। इसके बाद महाभारत का युद्ध और भी अधिक उग्र हो गया। चौदहवें दिन अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए जयद्रथ का वध किया। इस घटना ने युद्ध की दिशा बदल दी और कौरव सेना पर लगातार दबाव बढ़ने लगा।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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