Mahabharata: महाभारत युद्ध के अनेक प्रसंग ऐसे हैं, जो पहली बार सुनने पर आश्चर्य में डाल देते हैं। उन्हीं में से एक प्रसंग है राक्षसराज घटोत्कच के वीरगति प्राप्त करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण का प्रसन्न होना। जब कौरवों के महारथी कर्ण ने अपनी अमोघ शक्ति का प्रयोग कर भीमपुत्र घटोत्कच का वध किया, तब पांडव शोक में डूब गए। भीम अपने पुत्र के वियोग से व्याकुल हो उठे, जबकि युधिष्ठिर और अन्य पांडव भी गहरे दुख में थे, लेकिन उसी समय श्रीकृष्ण प्रसन्न दिखाई दिए। यह देखकर अर्जुन भी आश्चर्यचकित हो गए और उन्होंने श्रीकृष्ण से इसका कारण पूछा। आइए जानते हैं इस रहस्य को कि आखिर क्यों घटोत्कच के वध पर श्रीकृष्ण ने प्रसन्नता दिखाई थी?
कौन थे घटोत्कच?
घटोत्कच महाबली भीम और राक्षसी हिडिंबा के पुत्र थे। जब पांडव वनवास के दौरान हिडिंब वन पहुंचे थे, तब भीम का सामना राक्षस हिडिंब से हुआ। भीम ने युद्ध में हिडिंब का वध कर दिया। इसके बाद हिडिंबा ने भीम से विवाह किया और कुछ समय बाद उनके पुत्र घटोत्कच का जन्म हुआ। घटोत्कच ने अपने माता-पिता दोनों के गुण प्राप्त किए थे। उनमें भीम जैसा अद्भुत बल और राक्षस कुल की मायावी शक्तियां थीं। वे आकाश में उड़ सकते थे, अपना आकार बदल सकते थे और युद्धभूमि में ऐसी मायाएं रच सकते थे कि बड़े-बड़े योद्धा भी भ्रमित हो जाते थे। बाल्यकाल से ही घटोत्कच ने अपने पिता भीम और पांडवों के प्रति अटूट श्रद्धा रखी। उन्होंने वचन दिया था कि जब भी पांडव उन्हें स्मरण करेंगे, वे उनकी सहायता के लिए तत्काल उपस्थित होंगे।
महाभारत युद्ध में कब उतरे घटोत्कच?
महाभारत युद्ध के आरंभिक दिनों में घटोत्कच लगातार युद्ध में सक्रिय नहीं रहे। समय-समय पर उन्होंने पांडवों की सहायता की, लेकिन उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान युद्ध के चौदहवें दिन सामने आया। उस दिन अर्जुन ने जयद्रथ वध की प्रतिज्ञा पूरी की थी। युद्ध रात तक चलता रहा, जो महाभारत में अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। रात का समय राक्षसों की शक्ति बढ़ने का समय माना जाता था। ऐसे में श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को युद्धभूमि में उतरने का संकेत दिया।
रात के युद्ध में घटोत्कच की बढ़ गई थी शक्ति
रात्रि होते ही घटोत्कच का पराक्रम कई गुना बढ़ गया। उन्होंने अपनी मायावी शक्तियों से कौरव सेना में ऐसा आतंक फैला दिया कि हाथी, घोड़े और रथों की पंक्तियां अस्त-व्यस्त हो गईं। कभी वे पर्वत के समान विशाल रूप धारण कर लेते, तो कभी अचानक अदृश्य हो जाते। कभी आकाश से शिलाओं की वर्षा होती दिखाई देती, तो कभी अग्नि की ज्वालाएं उठती प्रतीत होतीं। कौरव सेना समझ ही नहीं पा रही थी कि वास्तविक शत्रु कहां है। घटोत्कच के प्रहारों से हजारों सैनिक मारे गए। अनेक महारथी घायल हो गए और पूरी कौरव सेना भयभीत होकर पीछे हटने लगी।
दुर्योधन को होने लगी हार की आशंका
घटोत्कच के भीषण आक्रमण को देखकर दुर्योधन अत्यंत चिंतित हो उठा। उसे लगा कि यदि इसी प्रकार युद्ध चलता रहा, तो पूरी कौरव सेना रात में ही नष्ट हो जाएगी। दुर्योधन ने कर्ण से कहा कि अब केवल वही घटोत्कच को रोक सकता है। उसने कर्ण से आग्रह किया कि किसी भी प्रकार इस राक्षस का अंत किया जाए, अन्यथा कौरव सेना का बचना कठिन होगा।
कर्ण के पास थी इंद्र की अमोघ शक्ति
पौराणिक कथा के अनुसार कर्ण के पास देवराज इंद्र द्वारा दी गई एक दिव्य शक्ति थी। यह वही शक्ति थी, जिसे 'वासवी शक्ति' कहा जाता है। जब कर्ण जन्मजात कवच और कुंडल धारण किए हुए था, तब देवराज इंद्र ब्राह्मण का वेश धारण कर उसके पास पहुंचे। दानवीर कर्ण ने बिना संकोच अपने कवच और कुंडल दान में दे दिए। उनके इस महान दान से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें वासवी शक्ति प्रदान की, लेकिन इस दिव्य अस्त्र के साथ एक शर्त भी थी। यह शक्ति केवल एक बार ही प्रयोग की जा सकती थी। जिस पर इसका प्रहार होता, उसका बचना लगभग असंभव माना जाता था। कर्ण ने उसी समय निश्चय कर लिया था कि वह इस शक्ति का प्रयोग केवल अर्जुन के विरुद्ध करेगा।
श्रीकृष्ण को पहले से था इस संकट का आभास
श्रीकृष्ण भली-भांति जानते थे कि कर्ण की सबसे बड़ी सामर्थ्य यही वासवी शक्ति है। वे यह भी जानते थे कि यदि यह अस्त्र अर्जुन पर चल गया, तो उसका प्रतिकार संभव नहीं होगा। इसी कारण श्रीकृष्ण पूरे युद्ध के दौरान इस बात का ध्यान रखते रहे कि कर्ण को ऐसी परिस्थिति न मिले, जिसमें वह इस दिव्य अस्त्र का प्रयोग अर्जुन पर कर सके, लेकिन चौदहवें दिन की रात्रि में घटोत्कच का विकराल रूप देखकर परिस्थितियां बदल गईं।
जब कर्ण को चलानी पड़ी वासवी शक्ति
घटोत्कच लगातार अपनी मायावी शक्तियों से कौरव सेना का विनाश कर रहे थे। उनकी गति इतनी तीव्र थी कि कौरव पक्ष के बड़े-बड़े योद्धा भी उन्हें रोक नहीं पा रहे थे। दुर्योधन ने बार-बार कर्ण से कहा कि यदि अब भी वह अपनी दिव्य शक्ति का उपयोग नहीं करेगा, तो पूरी सेना समाप्त हो जाएगी।
कर्ण कठिन दुविधा में पड़ गया। वह जानता था कि यदि आज वासवी शक्ति चला दी, तो अर्जुन के विरुद्ध उसका सबसे बड़ा अस्त्र समाप्त हो जाएगा। लेकिन दूसरी ओर यदि वह ऐसा नहीं करता, तो दुर्योधन की विशाल सेना उसी रात नष्ट हो सकती थी। अंततः कर्ण ने परिस्थिति को देखते हुए वासवी शक्ति का प्रयोग करने का निर्णय लिया।
घटोत्कच ने बलिदान से पहले बढ़ा लिया अपना विशाल रूप
जैसे ही कर्ण ने वासवी शक्ति छोड़ी, वह सीधे घटोत्कच की ओर बढ़ी। घटोत्कच समझ गए कि यह साधारण अस्त्र नहीं है और इससे बचना संभव नहीं। कथा के अनुसार मृत्यु का आभास होते ही घटोत्कच ने अपना शरीर अत्यंत विशाल बना लिया। वे आकाश में ऊंचे उठ गए और फिर विशाल पर्वत के समान कौरव सेना के बीच आकर गिरे। उनके विशाल शरीर के नीचे दबकर कौरव सेना के असंख्य सैनिक, रथ, घोड़े और हाथी नष्ट हो गए। इस प्रकार मृत्यु के अंतिम क्षण में भी घटोत्कच ने पांडवों के लिए युद्ध में बड़ा लाभ पहुंचाया।
घटोत्कच की मृत्यु के बाद क्यों प्रसन्न हुए श्रीकृष्ण?
घटोत्कच के वीरगति प्राप्त करते ही भीम शोक में डूब गए। पांडवों की आंखों में आंसू थे। लेकिन उसी समय श्रीकृष्ण ने राहत की सांस ली और प्रसन्न दिखाई दिए। अर्जुन ने उनसे पूछा कि जब भीम का पुत्र युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ है, तब आप प्रसन्न क्यों हैं? तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि कर्ण की वासवी शक्ति ही उनके लिए सबसे बड़ा संकट थी। यदि यह शक्ति सुरक्षित रहती तो कर्ण निश्चित रूप से उसका प्रयोग अर्जुन पर करता और उस स्थिति में अर्जुन का जीवन बचाना अत्यंत कठिन हो जाता। अब कर्ण ने अपनी वह एकमात्र अमोघ शक्ति घटोत्कच पर चला दी है। इसके बाद वह अर्जुन के विरुद्ध उस दिव्य अस्त्र का प्रयोग कभी नहीं कर सकेगा। इसलिए आज घटोत्कच का बलिदान केवल एक वीर की मृत्यु नहीं, बल्कि अर्जुन के जीवन की रक्षा का कारण भी बन गया।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्या बताया?
महाभारत के अनुसार श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यदि आज घटोत्कच यह बलिदान न देते, तो कर्ण अपनी अमोघ शक्ति तुम्हारे लिए सुरक्षित रखता। उस अस्त्र के सामने तुम्हारी रक्षा करना अत्यंत कठिन हो जाता। उन्होंने स्पष्ट किया कि घटोत्कच ने अपने प्राण देकर पांडव पक्ष के सबसे बड़े योद्धा अर्जुन को सुरक्षित कर दिया। यही कारण है कि वे इस घटना को युद्ध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मान रहे थे।
कर्ण के लिए क्या बदल गया?