Mahabharata Mythological Story: महाभारत के महान युद्ध के बाद जब पांडवों ने अपना राजपाट त्यागकर हिमालय की ओर प्रस्थान किया, तब हस्तिनापुर के सिंहासन की जिम्मेदारी अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित को सौंपी गई। राजा परीक्षित अपने समय के पराक्रमी, धर्मनिष्ठ और प्रजावत्सल शासकों में गिने जाते थे। उनके शासनकाल में राज्य समृद्ध था और प्रजा सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही थी, लेकिन एक दिन हुई एक छोटी-सी भूल उनके जीवन की सबसे बड़ी घटना बन गई। इसी भूल के कारण उन्हें सात दिन के भीतर तक्षक नाग के डंसने से मृत्यु का श्राप मिला। महाभारत और श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित यह कथा राजा परीक्षित के जीवन की अंतिम सात दिनों की घटनाओं का वर्णन करती है। आइए जानते हैं कि आखिर वह कौन-सी गलती थी, जिसके कारण एक महान राजा को ऐसा कठोर श्राप मिला।
कौन थे राजा परीक्षित?
राजा परीक्षित, महाभारत के वीर योद्धा अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे। जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चलाकर अभिमन्यु के गर्भस्थ पुत्र को भी नष्ट करने का प्रयास किया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से गर्भ में ही उनकी रक्षा की थी। इसी कारण उनका जन्म हुआ और उनका नाम "परीक्षित" रखा गया। पांडवों के महाप्रस्थान के बाद परीक्षित हस्तिनापुर के राजा बने। उन्होंने वर्षों तक धर्म के अनुसार शासन किया और अपने राज्य में न्याय एवं व्यवस्था बनाए रखी। कहा जाता है कि उन्होंने कलियुग के प्रभाव को भी सीमित रखने का प्रयास किया था।
क्या थी राजा परीक्षित की गलती?
एक दिन राजा परीक्षित शिकार के लिए वन में गए। लंबे समय तक वन में भटकने के कारण उन्हें अत्यधिक प्यास और थकान महसूस होने लगी। जल की तलाश करते-करते वे एक आश्रम में पहुंचे, जहां महान तपस्वी ऋषि शमीक गहन ध्यान में लीन बैठे थे। राजा ने आश्रम में पहुंचकर ऋषि से जल की याचना की और उनसे कुछ प्रश्न भी पूछे, लेकिन ध्यान में लीन होने के कारण ऋषि शमीक ने राजा की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। न उन्होंने आंखें खोलीं और न ही किसी प्रकार की प्रतिक्रिया दी।
राजा परीक्षित को लगा कि ऋषि जानबूझकर उनका अपमान कर रहे हैं। क्षणिक क्रोध और अहंकार में उन्होंने एक मृत सर्प को धनुष की नोक से उठाया और ऋषि शमीक के गले में डाल दिया। इसके बाद वे वहां से चले गए। यही वह गलती थी जिसने आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बदल दी।
ऋषि शमीक ने नहीं किया क्रोध
जब कुछ समय बाद ऋषि शमीक का ध्यान समाप्त हुआ तो उन्हें अपने गले में मृत सर्प दिखाई दिया। आश्रम के शिष्यों ने पूरी घटना बताई कि राजा परीक्षित यहां आए थे और उन्होंने ही यह कार्य किया। ऋषि शमीक ने इस घटना पर क्रोध नहीं किया। वे जानते थे कि राजा अत्यधिक प्यास और थकान के कारण मानसिक रूप से विचलित हो गए होंगे। उन्होंने राजा के इस व्यवहार को अनुचित तो माना, लेकिन उनके प्रति किसी प्रकार की प्रतिशोध की भावना नहीं रखी, लेकिन यह बात यहीं समाप्त नहीं हुई।
ऋषि के पुत्र श्रृंगी को जब पता चली घटना
ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी स्वयं भी तेजस्वी और तपस्वी ब्राह्मण थे। जब वे आश्रम लौटे तो उन्होंने अपने पिता के गले में मृत सर्प देखा। अन्य ऋषिकुमारों से पूरी घटना सुनने के बाद वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। श्रृंगी ने इसे केवल अपने पिता का नहीं बल्कि समस्त ब्राह्मण समाज और तपस्या का अपमान माना। क्रोध में उन्होंने अपने तपबल से जल लेकर संकल्प किया और राजा परीक्षित को श्राप दे दिया। उन्होंने कहा कि जिसने मेरे निर्दोष पिता का इस प्रकार अपमान किया है, उसे आज से सातवें दिन तक्षक नामक महान नाग डसेगा और उसी के विष से उसकी मृत्यु होगी। इस प्रकार सात दिन में मृत्यु का श्राप राजा परीक्षित को प्राप्त हुआ।
जब ऋषि शमीक को श्राप का पता चला
श्रृंगी द्वारा श्राप दिए जाने के बाद जब ऋषि शमीक को इसकी जानकारी मिली तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि राजा से भूल अवश्य हुई थी, लेकिन इतने कठोर श्राप की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने समझाया कि राजा प्रजा के रक्षक होते हैं और उनका सम्मान करना चाहिए। किसी क्षणिक भूल के कारण इतना बड़ा दंड देना उचित नहीं था। ऋषि शमीक जानते थे कि ब्राह्मण के मुख से निकला श्राप अब वापस नहीं लिया जा सकता, इसलिए उन्होंने तुरंत अपने शिष्य गौरमुख को हस्तिनापुर भेजा, ताकि राजा परीक्षित को श्राप की सूचना मिल सके और वे आने वाले समय के लिए तैयार हो जाएं।
राजा परीक्षित को जब मिला श्राप का समाचार
जब गौरमुख ने हस्तिनापुर पहुंचकर राजा परीक्षित को पूरी घटना सुनाई, तब राजा को अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। उन्होंने स्वीकार किया कि उनसे क्रोधवश एक बड़ा अपराध हो गया था। उन्होंने श्राप को बदलने या समाप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया। राजा ने यह मान लिया कि यह उनके कर्म का फल है और अब उन्हें इसे स्वीकार करना चाहिए। राजा ने अपने पुत्र जनमेजय को राज्य की जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय लिया और स्वयं सांसारिक कार्यों से अलग होकर अपने अंतिम समय को धर्मश्रवण में बिताने का निश्चय किया।
गंगा तट पर पहुंचे राजा परीक्षित
श्राप मिलने के बाद राजा परीक्षित गंगा के तट पर पहुंचे। वहां उन्होंने कुश का आसन बिछाकर आमरण उपवास का संकल्प लिया। देशभर के अनेक ऋषि, मुनि और महात्मा वहां एकत्र हुए। सभी इस बात पर विचार करने लगे कि मृत्यु निश्चित होने पर मनुष्य को क्या करना चाहिए और किस प्रकार भगवान का स्मरण करना चाहिए। इसी समय महान ब्रह्मज्ञानी महर्षि शुकदेव वहां पहुंचे। सभी ऋषियों ने उनका सम्मान किया और राजा परीक्षित ने उनसे प्रार्थना की कि वे उन्हें ऐसा ज्ञान प्रदान करें जिससे जीवन के अंतिम समय का सदुपयोग हो सके।
सात दिनों तक सुनाई गई श्रीमद्भागवत कथा
महर्षि शुकदेव ने राजा परीक्षित को सात दिनों तक श्रीमद्भागवत महापुराण का विस्तृत श्रवण कराया। इस दौरान भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों, भक्तों की कथाओं तथा भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया गया। इन सात दिनों तक राजा परीक्षित ने न भोजन किया और न ही किसी सांसारिक विषय की चिंता की। वे पूर्ण एकाग्रता के साथ कथा सुनते रहे। इसी सात दिवसीय भागवत श्रवण का उल्लेख आगे चलकर श्रीमद्भागवत महापुराण की परंपरा का आधार माना गया।
राजा परीक्षित तक कैसे पहुंचा तक्षक नाग?