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Mahabharata: महाभारत में अर्जुन को पाशुपतास्त्र कैसे प्राप्त हुआ? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata Katha: पौराणिक कथा के अनुसार अर्जुन इंद्रकील पर्वत पहुंचे, जिसे भगवान शिव की तपोभूमि माना जाता है। वहां उन्होंने एकांत स्थान पर भगवान शिव का स्मरण करते हुए कठोर तप आरंभ किया। 

अर्जुन को पाशुपतास्त्र कैसे प्राप्त हुआ?
Mahabharata Mythological Story: महाभारत में अर्जुन को केवल एक महान धनुर्धर ही नहीं, बल्कि दिव्य अस्त्रों का अधिकारी भी माना गया है। कुरुक्षेत्र के महायुद्ध से पहले अर्जुन ने अनेक देवताओं से दिव्य अस्त्र प्राप्त किए थे, जिनमें भगवान शिव का पाशुपतास्त्र सबसे अधिक शक्तिशाली और दुर्लभ माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यह अस्त्र इतना प्रचंड था कि इसके प्रयोग से संपूर्ण सृष्टि तक संकट में पड़ सकती थी। यही कारण था कि भगवान शिव यह अस्त्र किसी सामान्य योद्धा को नहीं देते थे। अर्जुन को भी इसे प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करनी पड़ी और स्वयं भगवान शिव ने उनकी परीक्षा ली। यह कथा महाभारत के वनपर्व तथा विभिन्न पुराणों में विस्तार से वर्णित मिलती है। आइए जानते हैं कि अर्जुन को पाशुपतास्त्र कैसे प्राप्त हुआ और इसके पीछे की पूरी पौराणिक कथा क्या है।

अर्जुन को मिली दिव्य अस्त्र प्राप्त करने की प्रेरणा

जब पांडव द्यूत क्रीड़ा में अपना राज्य हारकर वनवास भोग रहे थे, तब महर्षि व्यास ने पांडवों को भविष्य में होने वाले महायुद्ध के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि कौरवों की विशाल सेना और भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा जैसे महायोद्धाओं का सामना केवल सामान्य अस्त्र-शस्त्रों से संभव नहीं होगा, इसलिए अर्जुन को देवताओं से दिव्य अस्त्र प्राप्त करने चाहिए। महर्षि व्यास के निर्देश पर अर्जुन अपने भाइयों और द्रौपदी से विदा लेकर उत्तर दिशा की ओर हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में तपस्या करने के लिए निकल पड़े। उनका लक्ष्य केवल भगवान शिव को प्रसन्न कर उनका परम दिव्य अस्त्र पाशुपतास्त्र प्राप्त करना था।

इंद्रकील पर्वत पर अर्जुन की कठोर तपस्या

पौराणिक कथा के अनुसार अर्जुन इंद्रकील पर्वत पहुंचे, जिसे भगवान शिव की तपोभूमि माना जाता है। वहां उन्होंने एकांत स्थान पर भगवान शिव का स्मरण करते हुए कठोर तप आरंभ किया। प्रारंभ में अर्जुन केवल फल खाकर जीवन व्यतीत करते रहे। कुछ समय बाद उन्होंने फल भी छोड़ दिए और केवल जल पर निर्भर रहने लगे। अंत में उन्होंने भोजन और जल दोनों का त्याग कर केवल वायु के सहारे तप करना प्रारंभ किया। वे एक पैर पर खड़े होकर भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र का निरंतर जप करते रहे। अर्जुन की तपस्या दिन-प्रतिदिन इतनी कठोर होती गई कि उसका प्रभाव तीनों लोकों तक पहुंचने लगा। उनके तप के तेज से देवता, ऋषि और गंधर्व भी आश्चर्यचकित हो गए।

देवताओं ने भगवान शिव से की प्रार्थना

अर्जुन की कठोर तपस्या देखकर अनेक ऋषि-मुनि भगवान शिव के पास पहुंचे। उन्होंने महादेव से कहा कि पांडुपुत्र अर्जुन आपकी आराधना में लीन हैं और उनका तप अत्यंत प्रबल हो चुका है। यदि वे सफल हो गए तो निश्चित रूप से वे आपके महान भक्तों में गिने जाएंगे। भगवान शिव सब कुछ जानते थे। वे अर्जुन की भक्ति, धैर्य और युद्ध कौशल की परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने निश्चय किया कि पहले अर्जुन की परीक्षा ली जाएगी, उसके बाद ही उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान किया जाएगा।

दुर्योधन ने भेजा राक्षस मूक

उधर जब दुर्योधन को यह समाचार मिला कि अर्जुन भगवान शिव की आराधना कर रहे हैं, तब वह चिंतित हो उठा। उसने मूक नामक एक शक्तिशाली राक्षस को अर्जुन की तपस्या भंग करने और उनका वध करने के लिए भेजा। पौराणिक कथा के अनुसार मूक ने विशाल जंगली वराह (सूअर) का रूप धारण किया और अत्यंत वेग से अर्जुन की ओर दौड़ा। उसका उद्देश्य अर्जुन को अचानक आक्रमण कर मार डालना था।

भगवान शिव ने किरात का रूप धारण किया

उसी समय भगवान शिव भी अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए किरात अर्थात वनवासी शिकारी का रूप धारण कर वहां पहुंचे। उनके साथ माता पार्वती भी किरातिनी के वेश में थीं और अनेक गण भी शिकारी दल के रूप में उनके साथ उपस्थित थे। जैसे ही विशाल वराह अर्जुन के समीप पहुंचा, अर्जुन ने तत्काल अपना गांडीव उठाया और उस पर बाण चला दिया। ठीक उसी क्षण किरात रूपधारी भगवान शिव ने भी अपने धनुष से उसी वराह पर बाण छोड़ा। दोनों बाण एक साथ जाकर वराह के शरीर में लगे और वह तत्काल धराशायी हो गया।

वराह के वध को लेकर हुआ विवाद

जब अर्जुन मृत वराह के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उसी समय एक वनवासी शिकारी भी वहां आ पहुंचा है। किरात ने कहा कि इस वराह का वध उसने किया है, क्योंकि उसका बाण पहले लगा था। अर्जुन ने इसका विरोध किया और कहा कि उन्होंने पहले लक्ष्य साधा था, इसलिए शिकार उन्हीं का है। दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। अर्जुन को यह ज्ञात नहीं था कि सामने खड़े साधारण दिखाई देने वाले शिकारी स्वयं भगवान शिव हैं।

अर्जुन और किरात के बीच भयंकर युद्ध

विवाद इतना बढ़ गया कि अर्जुन ने किरात को युद्ध की चुनौती दे दी। इसके बाद दोनों के बीच भीषण युद्ध आरंभ हुआ। अर्जुन ने अपने गांडीव से एक के बाद एक असंख्य बाण चलाए, लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि किरात पर उन बाणों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। भगवान शिव सहज भाव से अर्जुन के सभी आक्रमणों को विफल करते रहे। अर्जुन ने दिव्य अस्त्रों का भी प्रयोग किया, किंतु किरात रूपधारी महादेव के सामने वे सभी निष्प्रभावी सिद्ध हुए। जब धनुष-बाण से सफलता नहीं मिली तो अर्जुन तलवार लेकर युद्ध करने लगे। उनकी तलवार भी क्षणभर में टूट गई। इसके बाद उन्होंने गदा और बड़े-बड़े पत्थरों से प्रहार किया, लेकिन किरात अडिग रहे। अंत में दोनों के बीच मल्लयुद्ध हुआ। अर्जुन ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, परंतु वे उस वनवासी शिकारी को पराजित नहीं कर सके। कुछ समय बाद वे स्वयं मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।

अर्जुन को हुआ भगवान शिव का आभास

जब अर्जुन को चेतना लौटी तो उन्होंने युद्ध छोड़कर भगवान शिव की पूजा करने का निश्चय किया। उन्होंने पास की मिट्टी से शिवलिंग बनाया और वन के पुष्प अर्पित कर महादेव का स्मरण करने लगे। पौराणिक कथा के अनुसार अर्जुन ने जो पुष्प शिवलिंग पर चढ़ाए थे, वे कुछ ही क्षणों बाद सामने खड़े किरात के मस्तक पर दिखाई देने लगे। यह अद्भुत दृश्य देखकर अर्जुन तुरंत समझ गए कि जिनसे वे युद्ध कर रहे थे, वे कोई साधारण शिकारी नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव हैं। वे तत्काल उनके चरणों में गिर पड़े और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगने लगे।

भगवान शिव ने प्रकट किया अपना दिव्य स्वरूप

अर्जुन की भक्ति, विनम्रता और पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपना वास्तविक दिव्य स्वरूप प्रकट किया। उनके साथ माता पार्वती भी अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुईं। भगवान शिव ने अर्जुन से कहा कि उन्होंने उनकी परीक्षा ली थी। युद्ध के दौरान अर्जुन ने अद्भुत साहस, धैर्य और युद्धकौशल का परिचय दिया। साथ ही पराजय के बाद भी उन्होंने अहंकार नहीं किया और अंततः भगवान की शरण ग्रहण की। इसी कारण वे पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के योग्य सिद्ध हुए।

भगवान शिव ने अर्जुन को प्रदान किया पाशुपतास्त्र

भगवान शिव ने अर्जुन को अपना परम दिव्य अस्त्र पाशुपतास्त्र प्रदान किया। उन्होंने अर्जुन को इसके प्रयोग, संचालन और वापस बुलाने की संपूर्ण विधि भी सिखाई। पौराणिक मान्यता के अनुसार पाशुपतास्त्र भगवान शिव का सबसे शक्तिशाली अस्त्र था। यह मन, वचन, दृष्टि अथवा धनुष के माध्यम से भी संचालित किया जा सकता था। इसकी शक्ति इतनी प्रचंड मानी गई है कि इसका प्रयोग केवल अत्यंत विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता था। महादेव ने अर्जुन को यह भी निर्देश दिया कि बिना अत्यंत आवश्यक कारण के इस अस्त्र का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसकी शक्ति सामान्य युद्ध के लिए उपयुक्त नहीं है।

अन्य देवताओं से भी अर्जुन को मिले दिव्य अस्त्र

भगवान शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के बाद अर्जुन को अनेक अन्य देवताओं का भी आशीर्वाद प्राप्त हुआ। इसके बाद देवराज इंद्र ने उन्हें स्वर्ग बुलाया, जहां उन्होंने दिव्य शस्त्रों का अभ्यास किया। वहीं वरुण, यम, कुबेर तथा अन्य देवताओं ने भी अर्जुन को अपने-अपने दिव्य अस्त्र प्रदान किए। इस प्रकार अर्जुन महाभारत के सबसे अधिक दिव्य अस्त्रों से संपन्न योद्धाओं में शामिल हो गए।

क्या महाभारत के युद्ध में पाशुपतास्त्र का प्रयोग हुआ था?

महाभारत की पौराणिक कथा के अनुसार अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्राप्त अवश्य हुआ था, लेकिन उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध में इसका प्रयोग नहीं किया। इसका कारण इसकी अत्यंत विनाशकारी शक्ति बताई जाती है। भगवान शिव के निर्देश के अनुसार इस अस्त्र का उपयोग केवल ऐसी स्थिति में किया जाना था, जब इसके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय शेष न रहे। इसी कारण अर्जुन ने महाभारत के युद्ध में अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन पाशुपतास्त्र को सुरक्षित रखा और उसका प्रयोग नहीं किया।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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