Mahabharata Mythological Story: महाभारत का युद्ध केवल दो राजवंशों के बीच सत्ता का संघर्ष नहीं था, बल्कि धर्म और अधर्म के मध्य होने वाला ऐसा महासंग्राम था, जिसने मानव इतिहास और सनातन परंपरा को गहराई से प्रभावित किया। इस युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। वे स्वयं नारायण के अवतार थे और यदि चाहते तो अकेले ही युद्ध का परिणाम बदल सकते थे। फिर भी उन्होंने कुरुक्षेत्र में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब भगवान स्वयं युद्धभूमि में उपस्थित थे, तब उन्होंने हथियार न उठाने का संकल्प क्यों किया? आइए जानते हैं इसके पीछे का रहस्य
श्रीकृष्ण के समक्ष दुर्योधन और अर्जुन का आगमन
महाभारत युद्ध आरंभ होने से पूर्व दोनों पक्षों ने मित्र राजाओं और सहयोगियों का समर्थन प्राप्त करना शुरू कर दिया था। उसी समय कौरवों की ओर से दुर्योधन और पांडवों की ओर से अर्जुन, दोनों द्वारका पहुंचे। उनका उद्देश्य था कि भगवान श्रीकृष्ण युद्ध में उनका साथ दें। जब दोनों श्रीकृष्ण के महल में पहुंचे, तब भगवान विश्राम कर रहे थे। दुर्योधन जाकर उनके सिरहाने बैठ गया, जबकि अर्जुन विनम्रता से उनके चरणों के पास खड़े हो गए। जब श्रीकृष्ण की निद्रा खुली तो उनकी दृष्टि सबसे पहले अर्जुन पर पड़ी। इसके बाद उन्होंने दुर्योधन को भी देखा।
दोनों ने युद्ध में सहायता की प्रार्थना की, तब श्रीकृष्ण ने निष्पक्षता का पालन करते हुए कहा कि एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना होगी और दूसरी ओर वे स्वयं रहेंगे, लेकिन युद्ध में शस्त्र धारण नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे किसी पर अस्त्र-शस्त्र नहीं चलाएंगे और केवल युद्ध में उपस्थित रहेंगे। आयु में छोटे होने के कारण पहले चयन का अधिकार अर्जुन को दिया गया। अर्जुन ने बिना किसी संकोच के श्रीकृष्ण को चुना, जबकि दुर्योधन प्रसन्न होकर नारायणी सेना लेकर लौट गया।
श्रीकृष्ण ने शस्त्र न उठाने का संकल्प क्यों लिया?
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण इस युद्ध में स्वयं योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि धर्म के मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित होना चाहते थे। वे यह सिद्ध करना चाहते थे कि धर्म की विजय केवल बल और शस्त्रों से नहीं, बल्कि सत्य, नीति और उचित मार्गदर्शन से भी होती है। यदि स्वयं भगवान शस्त्र उठाकर युद्ध करते, तो महाभारत का परिणाम सीधे उनके पराक्रम से जुड़ जाता।
ऐसी स्थिति में पांडवों की विजय का श्रेय उनके पुरुषार्थ और धर्मनिष्ठा को नहीं मिल पाता।, इसलिए उन्होंने स्वयं को युद्ध में सक्रिय योद्धा के रूप में प्रस्तुत न कर सारथी का दायित्व स्वीकार किया। इसी कारण भगवान ने अर्जुन के रथ का संचालन किया और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें धर्म, कर्म और मोक्ष का उपदेश दिया, जिसे आज श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में जाना जाता है।
सारथी बनकर निभाई सबसे महत्वपूर्ण भूमिका
युद्धभूमि में अर्जुन अपने ही गुरुजनों, संबंधियों और बंधु-बांधवों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो गए थे। उन्होंने गांडीव नीचे रख दिया और युद्ध करने से इनकार कर दिया। ऐसे समय में श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मा, धर्म, कर्मयोग और भक्ति का उपदेश दिया। यही उपदेश आगे चलकर भगवद्गीता कहलाया। यदि श्रीकृष्ण स्वयं योद्धा बनकर युद्ध करते, तो संभवतः गीता का वह दिव्य उपदेश संसार को प्राप्त न होता। इस प्रकार उनका शस्त्र न उठाना केवल एक प्रतिज्ञा नहीं था, बल्कि धर्मस्थापना की एक व्यापक योजना का भाग माना जाता है।
निष्पक्षता बनाए रखने का भी था कारण
श्रीकृष्ण दोनों पक्षों से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए थे। पांडव उनके प्रिय थे, वहीं कौरवों से भी पारिवारिक संबंध थे। ऐसी स्थिति में यदि वे शस्त्र उठाकर किसी एक पक्ष की ओर से युद्ध करते, तो निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े हो सकते थे। इसी कारण उन्होंने घोषणा की कि वे युद्ध में हथियार नहीं उठाएंगे। इससे दोनों पक्षों को यह स्पष्ट संदेश मिला कि भगवान किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए उपस्थित हैं। उनका उद्देश्य युद्ध करना नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा करना था।
क्या श्रीकृष्ण ने कभी अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी थी?
महाभारत में एक ऐसा प्रसंग भी आता है, जब ऐसा प्रतीत हुआ कि श्रीकृष्ण अपनी प्रतिज्ञा भंग कर देंगे। युद्ध के नौवें दिन भीष्म पितामह अत्यंत प्रचंड वेग से युद्ध कर रहे थे। उनके बाणों से पांडव सेना को भारी क्षति पहुंच रही थी। अर्जुन भी पूरे सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहे थे।
यह देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने रथ से उतरकर टूटा हुआ रथचक्र उठा लिया और भीष्म की ओर दौड़ पड़े। ऐसा लगा मानो वे अपनी प्रतिज्ञा त्यागकर युद्ध करने जा रहे हों। भीष्म पितामह ने भगवान को अपनी ओर आते देखा तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि यदि भगवान के हाथों मृत्यु प्राप्त हो जाए तो इससे बड़ा सौभाग्य कोई नहीं।
उसी समय अर्जुन ने आगे बढ़कर श्रीकृष्ण को रोक लिया और उनसे अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण कराया, तब भगवान शांत हुए और पुनः रथ पर लौट आए। पौराणिक मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने उस समय भी वास्तविक रूप से शस्त्र का प्रयोग नहीं किया था। उन्होंने केवल अपने भक्त अर्जुन को उसके कर्तव्य का स्मरण कराने के लिए यह लीला की थी।
नारायणी सेना देने के पीछे क्या था रहस्य?